Bihar MLC Election 2026 बिहार विधान परिषद की पटना स्नातक निर्वाचन सीट के चुनाव से पहले जदयू के भीतर एक पुरानी राजनीतिक अदावत फिर खुलकर सामने आ गयी है. मोकामा के विधायक अनंत कुमार सिंह ने अपनी ही पार्टी के एमएलसी और मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. अनंत सिंह ने साफ कहा है कि वह नीरज कुमार के समर्थन में नहीं खड़े होंगे, बल्कि उनके खिलाफ चुनाव लड़ रहे डॉ. अनुज सिंह का समर्थन करेंगे.
मामला सिर्फ एक चुनाव में समर्थन और विरोध तक सीमित नहीं है. अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच मोकामा की राजनीति में लंबे समय से चली आ रही खींचतान का असर अब विधान परिषद चुनाव में दिखाई दे रहा है. दोनों नेताओं के बीच 2015 के विधानसभा चुनाव से शुरू हुआ राजनीतिक टकराव बाद के वर्षों में सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप तक पहुंचा. 2019 के AK-47 मामले ने इस विवाद को और गहरा किया. अब पटना स्नातक सीट के चुनाव ने दोनों के बीच पुरानी राजनीतिक दूरी को फिर चर्चा में ला दिया है.
नीरज के खिलाफ खुलकर मैदान में अनंत
जदयू के संभावित उम्मीदवार के रूप में नीरज कुमार का नाम सामने आने के बीच अनंत सिंह ने कहा है कि वह उन्हें चुनाव जीतने नहीं देंगे. उन्होंने नीरज कुमार पर अपने राजनीतिक जीवन में लगातार विरोध करने का आरोप लगाया. साथ ही 2019 के मामले में भी गंभीर आरोप लगाये और नार्को टेस्ट की चुनौती दी.
अनंत सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका विरोध जदयू के बजाय नीरज कुमार से व्यक्तिगत राजनीतिक मतभेद से जुड़ा है. उन्होंने पटना स्नातक सीट से डॉ. अनुज सिंह को समर्थन देने का ऐलान किया है. इससे मुकाबले में एक दिलचस्प राजनीतिक स्थिति बन गयी है.एक ही दल के विधायक का समर्थन पार्टी के संभावित उम्मीदवार के बजाय एक निर्दलीय दावेदार को मिलता दिख रहा है.
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नीरज कुमार ने आरोपों को किया खारिज
अनंत सिंह के आरोपों पर नीरज कुमार ने उन्हें खारिज किया है. उनका कहना है कि यदि अनंत सिंह के पास कोई प्रमाण है, तो उन्हें अदालत का रुख करना चाहिए. नार्को टेस्ट के सवाल पर भी नीरज कुमार ने कानूनी प्रक्रिया का हवाला दिया है. उन्होंने खुद को लंबे समय से नीतीश कुमार के साथ रहने वाला जदयू कार्यकर्ता बताया.
नीरज कुमार ने यह भी कहा कि पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता ही चुनाव में अंतिम फैसला करेंगे. यानी दोनों नेताओं की व्यक्तिगत राजनीतिक लड़ाई का अंतिम असर चुनावी मैदान में किस तरह दिखाई देता है, यह 88 हजार से अधिक पंजीकृत स्नातक मतदाताओं के मतदान से तय होगा.
2015 में पहली बड़ी सियासी भिड़ंत
अनंत सिंह और नीरज कुमार की राजनीतिक टकराहट को समझने के लिए 2015 का मोकामा विधानसभा चुनाव अहम पड़ाव माना जाता है. उस चुनाव में जदयू ने नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया था, जबकि अनंत सिंह ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा. परिणाम में अनंत सिंह को 54,005 और नीरज कुमार को 35,657 वोट मिले थे. अनंत सिंह 18,348 वोटों से विजयी हुए थे.
इस चुनाव के बाद दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक दूरी और स्पष्ट होती गयी. मोकामा की राजनीति में दोनों के प्रभाव क्षेत्र और राजनीतिक शैली को लेकर भी लगातार चर्चा होती रही.
2019 के AK-47 मामले ने बढ़ायी तल्खी
2019 में अनंत सिंह के लदमा स्थित पैतृक आवास पर पुलिस कार्रवाई के दौरान AK-47, कारतूस और हैंड ग्रेनेड बरामद होने का मामला सामने आया. इस मामले में अनंत सिंह को 2022 में निचली अदालत ने दोषी ठहराया था. बाद में अगस्त 2024 में पटना हाइकोर्ट ने उन्हें मामले में बरी कर दिया.
अनंत सिंह ने इस मामले में नीरज कुमार की भूमिका होने का आरोप लगाया था. हालांकि नीरज कुमार इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं. मौजूदा विवाद में यही पुराना मामला एक बार फिर राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा बन गया है.
एक सीट, दो दावेदार और जदयू के सामने राजनीतिक सवाल
पटना स्नातक सीट पर नीरज कुमार की संभावित उम्मीदवारी और डॉ. अनुज सिंह को अनंत सिंह के समर्थन ने मुकाबले को पार्टी के अंदरूनी समीकरणों से जोड़ दिया है. जदयू की ओर से चार सीटों पर चुनाव की तैयारी की खबरों में पटना स्नातक सीट से नीरज कुमार का नाम प्रमुखता से सामने आया है.
हालांकि, विधान परिषद का स्नातक निर्वाचन क्षेत्र विधानसभा चुनाव से अलग प्रकृति का चुनाव है. यहां सीधे आम मतदाता नहीं, बल्कि पंजीकृत स्नातक मतदाता मतदान करते हैं. इसलिए विधानसभा क्षेत्र में किसी नेता का प्रभाव अपने आप विधान परिषद चुनाव में उसी अनुपात में वोट में बदल जाए, यह जरूरी नहीं है.
यही वजह है कि अनंत सिंह के समर्थन को फिलहाल एक राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. इसका वास्तविक चुनावी असर कितना होगा, यह उम्मीदवारों के संगठन, पंजीकृत मतदाताओं के बीच पहुंच और चुनावी अभियान के बाद ही स्पष्ट होगा.
पुरानी लड़ाई का नया मंच
अनंत सिंह और नीरज कुमार की कहानी मोकामा की स्थानीय राजनीति से निकलकर अब पटना स्नातक विधान परिषद सीट तक पहुंच गयी है. 2015 की चुनावी टक्कर, उसके बाद की राजनीतिक बयानबाजी और 2019 के मामले को लेकर दोनों के बीच बने मतभेद अब 2026 के MLC चुनाव में फिर दिखाई दे रहे हैं.
दिलचस्प यह है कि दोनों नेता फिलहाल जदयू से जुड़े हैं, लेकिन चुनावी समर्थन को लेकर उनके रास्ते अलग-अलग नजर आ रहे हैं. ऐसे में पटना स्नातक सीट का चुनाव केवल उम्मीदवारों के बीच मुकाबला नहीं, बल्कि जदयू के भीतर मौजूद पुराने राजनीतिक समीकरणों की भी परीक्षा बन गया है.
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