माउंट एवरेस्ट विजेता : जिससे थी एलर्जी, उससे जोड़ा नाता व बन गये एवरेस्ट विजेता

संघर्ष इनसान को कुछ भी बना सकता है माउंट एवरेस्ट पर चढ़ कर फतह हासिल करनेवाले स्वरूप सिद्धांत वह शख्स हैं, जिन्होंने संघर्ष को अपना जीवन बना लिया. वही काम करते रहे, जिससे उन्हें एलर्जी थी. सांस लेने में दिक्कतें होती थी. इनहेलर का इस्तेमाल करते थे, पर ऊंचाइयों में चढ़ने का प्रैक्टिस करते रहे. […]

संघर्ष इनसान को कुछ भी बना सकता है
माउंट एवरेस्ट पर चढ़ कर फतह हासिल करनेवाले स्वरूप सिद्धांत वह शख्स हैं, जिन्होंने संघर्ष को अपना जीवन बना लिया. वही काम करते रहे, जिससे उन्हें एलर्जी थी. सांस लेने में दिक्कतें होती थी. इनहेलर का इस्तेमाल करते थे, पर ऊंचाइयों में चढ़ने का प्रैक्टिस करते रहे. अंडा आदि से उन्हें एलर्जी थी. पूरे शरीर में खुजली होती थी, लेकिन इन डिश को छोड़ा नहीं. शुरू में एंटी एलर्जिक दवा लेनी पड़ी, फिर भी उन्होंने इन डिश को अपने दिनचर्या में शामिल कर लिया.
धीरे-धीरे यही एलर्जी उनकी जिंदगी बन गयी. अब कुछ भी खा लें, एलर्जी नहीं होती. इसी तरह सांस की समस्या के कारण वह सामान्य बच्चों की तरह खेलकूद नहीं पाते थे. दौड़ने में भी दिक्कत होती. थोड़े बड़े हुए, तो दिक्कतें और बढ़ी. 2008 में बेंगलुरु में नौकरी (इंजीनियर) के दौरान उनके करीबी प्रेम कुमार रमालिंगन ने तमिलनाडु के छोटे पहाड़ पर्वतोमल्लई की 800 मीटर ऊंचाई पर ले गये. सिद्धांत इस ऊंचाई पर इनहेलर का इस्तेमाल करते रहे. इस तरह उनकी हिम्मत बढ़ती गयी.
फिर उन्होंने ऊंचाईयों पर चढ़ना शुरू किया. धीरे-धीरे सांस लेने की तकलीफ उनकी कम होती गयी. इनहेलर की जरूरत भी कम पड़ने लगी. अंतत: 2010 में स्वरूप सिद्धांत हिमालय के बेस कैंप पहुंच गये. यहां से उनकी यात्रा शुरू हुई. प्रयास करते-करते 21 मई 2016 को वह माउट एवरेस्ट पर चढ़ कर सफल हुए. तब इनहेलर की जरूरत तक नहीं पड़ी. श्री सिद्धांत अभी 34 साल के हैं.
वह अभी बेंगलुर में ब्रेडी व केसल रॉक कंपनी के लिए काम करते हैं. वह सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं. पश्चिम बंगाल के बहारमपुर में जन्मे सिद्धांत ने सिक्किम मणिपाल इंस्टीट्यूट अॉफ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की है. वह द इंस्टीट्यूशन अॉफ इंजीनियर्स (इंडिया) झारखंड चैप्टर के फाउंडेशन डे पर यहां आये हुए थे.

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