India CWG 2026 vs Olympics 2028: भारत ने स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए 39 पदक जीतकर पदक तालिका में चौथा स्थान हासिल किया. भारतीय दल ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य पदक अपने नाम किए. यह प्रदर्शन निश्चित रूप से भारतीय खेलों के लिए उत्साह बढ़ाने वाला है. हालांकि, यदि इन आंकड़ों को भारत के ओलंपिक इतिहास के साथ रखा जाए तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है. पिछले 100 से अधिक वर्षों में भारत ने ओलंपिक में कुल 41 पदक जीते हैं. ऐसे में पहली नजर में यह लग सकता है कि भारत अब ओलंपिक स्तर की ताकत बन चुका है, लेकिन वास्तविकता इससे काफी अलग है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि कॉमनवेल्थ गेम्स की सफलता को सीधे लॉस एंजिलिस ओलंपिक 2028 के संभावित प्रदर्शन का पैमाना नहीं माना जा सकता.
इतिहास क्या बताता है
भारत के पिछले प्रदर्शन इस बात की पुष्टि करते हैं.
- कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 (नई दिल्ली) – 101 पदक
- लंदन ओलंपिक 2012 – केवल 6 पदक
इसी तरह,
- ग्लासगो 2014 – 64 पदक
- रियो ओलंपिक 2016 – केवल 2 पदक
इसके बाद,
- गोल्ड कोस्ट 2018 – 66 पदक
- टोक्यो ओलंपिक 2020 – 7 पदक
और
- बर्मिंघम 2022 – 61 पदक
- पेरिस ओलंपिक 2024 – 6 पदक
इन आंकड़ों से साफ है कि कॉमनवेल्थ गेम्स में बड़ी पदक संख्या कभी भी सीधे ओलंपिक सफलता में नहीं बदली.
कॉमनवेल्थ गेम्स और ओलंपिक में सबसे बड़ा अंतर क्या है?
इसका सबसे बड़ा कारण प्रतिस्पर्धा का स्तर है. कॉमनवेल्थ गेम्स में केवल 74 राष्ट्र और क्षेत्र हिस्सा लेते हैं, जबकि ओलंपिक में दुनिया के लगभग सभी शीर्ष खेल राष्ट्र उतरते हैं. कॉमनवेल्थ गेम्स में अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी, फ्रांस, इटली, ईरान, दक्षिण कोरिया जैसे देश भाग नहीं लेते. इसी तरह एथलेटिक्स में इथियोपिया और युगांडा जैसे लंबी दूरी के दिग्गज देश भी प्रतियोगिता में नहीं होते. यानी कॉमनवेल्थ में पदक जीतने वाला खिलाड़ी ओलंपिक में कई ऐसे विश्वस्तरीय खिलाड़ियों से भिड़ेगा जिनका सामना उसे ग्लासगो में नहीं करना पड़ा.
भारत के सबसे सफल ओलंपिक खेल इस बार कॉमनवेल्थ में थे ही नहीं
भारत के ओलंपिक इतिहास पर नजर डालें तो देश के कुल 41 पदकों में से आए हैं-
- 13 पदक हॉकी
- 8 पदक कुश्ती
- 7 पदक शूटिंग
- 3 पदक बैडमिंटन
यानी कुल 31 पदक केवल चार खेलों से मिले हैं. लेकिन ग्लासगो 2026 के कॉमनवेल्थ गेम्स के छोटे कार्यक्रम में ये खेल शामिल ही नहीं थे. इस कारण भारत की वास्तविक ओलंपिक ताकत का बड़ा हिस्सा इस प्रतियोगिता में दिखाई ही नहीं दिया.
बॉक्सिंग में सात गोल्ड, लेकिन ओलंपिक की राह अब भी कठिन
भारत ने ग्लासगो में बॉक्सिंग में सबसे शानदार प्रदर्शन किया. साक्षी चौधरी, प्रीति पवार, जैसमीन लांबोरिया, प्रिया घंघास, अरुंधति चौधरी, सचिन सिवाच और अंकुश पंघाल ने स्वर्ण पदक जीते. वहीं जादुमणि सिंह, लवलीना बोरगोहेन और नरेंद्र बरवाल ने रजत पदक हासिल किए. लेकिन ओलंपिक इतिहास देखें तो भारत अब तक बॉक्सिंग में केवल तीन पदक जीत पाया है और तीनों कांस्य रहे हैं. इनमें विजेंदर सिंह, एमसी मैरी कॉम और लवलीना बोरगोहेन शामिल हैं. इसलिए ग्लासगो की सफलता के बावजूद भारत को एशियन गेम्स और विश्व चैंपियनशिप में उज्बेकिस्तान, कजाखस्तान, चीन और क्यूबा जैसी ताकतों के खिलाफ खुद को साबित करना होगा.
एथलेटिक्स में पदक मिले
भारत ने ग्लासगो में एथलेटिक्स में 10 पदक जीते लेकिन एक भी स्वर्ण पदक नहीं आया. गुलवीर सिंह ने 10,000 मीटर में रजत और 5,000 मीटर में कांस्य जीतकर इतिहास बनाया. हालांकि ओलंपिक में उन्हें इथियोपिया, केन्या और युगांडा के विश्वस्तरीय धावकों का सामना करना होगा. जैवलिन थ्रो में नीरज चोपड़ा ने रजत और यशवीर सिंह ने कांस्य पदक जीता. लेकिन यहां भी आंकड़े बड़ा अंतर दिखाते हैं. ग्लासगो में नीरज का सर्वश्रेष्ठ थ्रो 85.83 मीटर रहा, जबकि पेरिस ओलंपिक 2024 में कांस्य पदक जीतने के लिए 88.54 मीटर का थ्रो जरूरी था. यानी ओलंपिक स्तर तक पहुंचने के लिए अभी प्रदर्शन में और सुधार की जरूरत है.
जूडो में ऐतिहासिक सफलता, लेकिन ओलंपिक पदक अभी सपना
अस्मिता डे और हर्ष सिंह भारत के पहले कॉमनवेल्थ जूडो चैंपियन बने. यामिनी मौर्य और उन्नति शर्मा ने भी पदक जीते. यह भारतीय जूडो के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि है. फिर भी भारत आज तक ओलंपिक जूडो में एक भी पदक नहीं जीत पाया है. ऐसे में यह सफलता भविष्य के लिए उम्मीद जरूर जगाती है, लेकिन इसे ओलंपिक सफलता मान लेना जल्दबाजी होगी.
वेटलिफ्टिंग में भी यही कहानी
भारत ने ग्लासगो में कई पदक जीते. मीराबाई चानू ने लगातार तीसरा कॉमनवेल्थ स्वर्ण जीतकर अपनी बादशाहत कायम रखी.
लेकिन ओलंपिक इतिहास देखें तो भारत को वेटलिफ्टिंग में केवल दो पदक मिले हैं-
- करनम मल्लेश्वरी (सिडनी 2000) – कांस्य
- मीराबाई चानू (टोक्यो) – रजत
ओलंपिक में चीन, उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया और अन्य देशों के खिलाड़ी कहीं अधिक भारी वजन उठाते हैं. इसलिए केवल कॉमनवेल्थ पदक जीतना ओलंपिक पदक की गारंटी नहीं है.
फिर भी ग्लासगो क्यों है महत्वपूर्ण?
कॉमनवेल्थ गेम्स का महत्व केवल पदकों में नहीं है. यह युवा खिलाड़ियों को बहु-खेल प्रतियोगिता का अनुभव देता है. एथलीट यहां खिलाड़ियों के गांव में रहना, लगातार मुकाबले खेलना, मीडिया का दबाव झेलना और बड़े मंच पर प्रदर्शन करना सीखते हैं.
ग्लासगो में-
- यशवीर सिंह ने दबाव में अपना सर्वश्रेष्ठ जैवलिन थ्रो किया.
- गुलवीर सिंह ने रणनीतिक दौड़ का शानदार प्रदर्शन किया.
- भारतीय महिला मुक्केबाजों ने सात स्वर्ण जीतकर भविष्य की मजबूत नींव रखी.
- जूडो में भारत ने नया इतिहास बनाया.
- पैरा खिलाड़ियों ने भी शानदार प्रदर्शन किया.
इन उपलब्धियों को भविष्य के ओलंपिक अभियान की मजबूत आधारशिला माना जा सकता है.
एशियन गेम्स देंगे असली तस्वीर
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लासगो का पदक तालिका भारत की संभावनाएं जरूर दिखाती है, लेकिन असली परीक्षा एशियन गेम्स और विश्व चैंपियनशिप में होगी. इन प्रतियोगिताओं में चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, उज्बेकिस्तान, कजाखस्तान और अन्य मजबूत देशों के खिलाड़ी मैदान में उतरेंगे. यदि भारतीय खिलाड़ी वहां भी लगातार पदक जीतते हैं, तभी उन्हें लॉस एंजिलिस ओलंपिक 2028 का मजबूत दावेदार माना जा सकेगा.
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