FIFA World Cup 2026: अमेरिका के मेन (Maine) राज्य के पोर्टलैंड शहर स्थित केनेडी पार्क इसका जीता जागता उदाहरण बन गया है. यहां हर सप्ताह प्रवासी (Immigrants) और शरणार्थी (Refugees) एक साथ फुटबॉल खेलते हैं. अलग-अलग देशों से आए ये लोग मैदान पर एक परिवार की तरह नजर आते हैं, जहां उनकी पहचान केवल एक फुटबॉल खिलाड़ी की होती है.
सख्त इमिग्रेशन नीतियों के बीच फुटबॉल बना उम्मीद की किरण
अमेरिका में कड़े इमिग्रेशन नियमों और अनिश्चितता के माहौल में बहुत से प्रवासी और शरणार्थी मानसिक तनाव और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं. ऐसे में केनेडी पार्क का यह फुटबॉल मैदान उनके लिए सिर्फ एक खेल का स्थान नहीं, बल्कि मानसिक शांति और राहत पाने का एक जरिया बन गया है. यहां आने पर वे अपने डर और चिंताओं को कुछ देर के लिए पीछे छोड़ पाते हैं, जहां उन्हें अपने जैसे लोगों का साथ और अपनापन मिलता है. यह मैदान न केवल उनके मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है, बल्कि आपस में मजबूत दोस्ती और आत्मविश्वास जगाकर उन्हें इस कठिन दौर से लड़ने का हौसला भी देता है.
फुटबॉल ने बदल दी जिंदगी
19 वर्षीय जॉर्ज लुसोलो वर्ष 2018 में अपनी मां के साथ डीआर कांगो से अमेरिका आए थे, जहां उन्होंने शरणार्थी के रूप में एक नई शुरुआत की. अमेरिका में शुरुआती दौर उनके लिए काफी कठिन रहा, क्योंकि उन्हें भाषा, नई संस्कृति और अनजान माहौल जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. उन्हें पहले टेक्सास के एक डिटेंशन सेंटर और फिर न्यूयॉर्क के एक शेल्टर में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा, लेकिन आखिरकार पोर्टलैंड में बसने के बाद उन्हें शरण मिल गई. इस कठिन सफर के दौरान फुटबॉल उनके लिए उम्मीद की किरण बनकर आया. सोशल मीडिया के जरिए उन्हें पोर्टलैंड के केनेडी पार्क में होने वाले मैचों के बारे में पता चला, जहां जाकर उन्हें पहली बार अपने जैसे संघर्षों से गुजरे लोगों का साथ मिला. जॉर्ज के लिए फुटबॉल महज एक खेल नहीं, बल्कि एक 'थेरेपी' की तरह है, जो उन्हें मानसिक सुकून देता है और कठिन समय में भी अपनों के बीच होने का एहसास कराता है.
छोटी शुरुआत से बना बड़ा समुदाय
साल 2021 में केनेडी पार्क के पास सड़क किनारे शुरू हुआ एक छोटा सा फुटबॉल मैच आज एक बड़े समुदाय का रूप ले चुका है. अब यहां दुनिया भर के दर्जनों देशों से आए प्रवासी और शरणार्थी नियमित रूप से एक साथ खेलते हैं. सबसे खास बात यह है कि अलग-अलग भाषाएं बोलने के बावजूद, मैदान पर उन्हें एक-दूसरे को समझने के लिए किसी अनुवादक (Translator) की ज़रूरत नहीं पड़ती; वे खेल की भाषा के माध्यम से ही एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़ जाते हैं.
"फुटबॉल की भाषा सबको समझ आती है"
अंगोला से अमेरिका आए 18 वर्षीय डेजी कुरिबांजा का मानना है कि फुटबॉल दुनिया की सबसे सरल और सहज भाषा है. उनके अनुसार, खेल के मैदान पर एक-दूसरे को समझने के लिए शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती; साथी खिलाड़ी केवल इशारों और आपसी तालमेल से ही यह समझ जाते हैं कि गेंद किसे और कहां पास करनी है. यही खूबी फुटबॉल को इतना खास बनाती है कि यह अलग-अलग भाषाओं वाले लोगों को भी एक साथ में जोड़ देती है.
अमेरिकी नागरिकों की सोच भी बदल रहा है यह मैदान
डेजी का मानना है कि पार्क में फुटबॉल खेलते हुए लोगों को देखकर स्थानीय अमेरिकी नागरिकों की सोच भी बदल रही है. वे कहते हैं कि अक्सर लोग प्रवासियों को केवल बोझ या समस्या के रूप में देखते हैं, लेकिन जब वे उन्हें खुशी से खेलते, हंसते और एक-दूसरे की मदद करते देखते हैं तो उनकी धारणा बदलती है. इस तरह फुटबॉल केवल खिलाड़ियों को नहीं जोड़ रहा, बल्कि समाज में भी सकारात्मक संदेश पहुंचा रहा है.
विश्व कप ने जगाए नए सपने
इस बार फीफा वर्ल्ड कप के कुछ मुकाबले अमेरिका में आयोजित होने से केनेडी पार्क के खिलाड़ियों में खास उत्साह है. डेजी कहते हैं कि उनके घर से कुछ ही राज्यों की दूरी पर विश्व कप के मुकाबले होना उनके लिए किसी सपने से कम नहीं है. वे कहते हैं कि उनके भीतर भी एक दिन विश्व मंच पर खेलने की आग जल रही है.
डीआर कांगो के लिए खेलना
जॉर्ज लुसोलो भी अन्य खिलाड़ियों की तरह एक पेशेवर फुटबॉलर बनने का सपना देखते हैं और उनका लक्ष्य अपने देश, डीआर कांगो (DR Congo) की राष्ट्रीय टीम के लिए खेलना है. केनेडी पार्क में खेलने वाले इन खिलाड़ियों के लिए डीआर कांगो का लंबे अंतराल के बाद फीफा वर्ल्ड कप के अंतिम-32 में पहुंचना बहुत खुशी की बात है. वे अपने देश की इस शानदार सफलता को एक बड़ी प्रेरणा मानते हैं, जो उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिए और अधिक मेहनत करने का हौसला देती है.
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