Vitthoba Story: सच्चा भक्त कभी अहंकारी नहीं होता, लेकिन उसमें स्वाभिमान अवश्य होता है. अहंकार व्यक्ति को स्वयं तक सीमित कर देता है, जबकि स्वाभिमान उसे धर्म, कर्तव्य और सत्य के मार्ग पर अडिग रखता है. इसलिए भक्त भगवान से भी सहजता और आत्मीयता से बात कर सकता है. यह संबंध भय का नहीं, बल्कि प्रेम और विश्वास का होता है.
मां की सेवा बनी सर्वोच्च पूजा
महाराष्ट्र के प्रसिद्ध विठोबा मंदिर से जुड़ी कथा के अनुसार एक भक्त अपनी वृद्ध मां के चरण दबा रहा था. उसी समय भगवान श्रीकृष्ण उसे दर्शन देने पहुंचे. उन्होंने द्वार पर आकर अपनी उपस्थिति बताई, लेकिन भक्त ने बिना विचलित हुए कहा कि पहले वह अपनी मां की सेवा पूरी करेगा. उसने पास पड़ी एक ईंट भगवान की ओर सरकाते हुए विनम्रता से कहा कि वे उस पर खड़े होकर प्रतीक्षा करें.
अटूट श्रद्धा का अद्भुत संदेश
भक्त पूरी रात मां की सेवा में लगा रहा और भगवान उसी ईंट पर खड़े रहे. मान्यता है कि यही स्वरूप आगे चलकर विठोबा की मूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित हुआ. यह कथा सिखाती है कि जहां निस्वार्थ सेवा, अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण होता है, वहां भगवान स्वयं भक्त के प्रेम के आगे ठहर जाते हैं. सच्चे भक्त को विश्वास होता है कि भगवान कभी उसे छोड़कर नहीं जाएंगे.
