Vishwakarma Ji Ki Katha: हर साल कन्या संक्रांति के अवसर पर भगवान विश्वकर्मा की पूजा श्रद्धा और उत्साह के साथ की जाती है. इस दिन खासतौर पर कारीगर, शिल्पकार, इंजीनियर, मशीनों और औजारों से जुड़े लोग अपने कार्यस्थल, उपकरणों और मशीनों की पूजा करते हैं.हर साल की तरह इस साल भी आज 17 सितंबर 2026 को विश्वकर्मा पूजा मनाई जा रही है.
धार्मिक मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा सृष्टि के प्रथम शिल्पकार और दिव्य वास्तुकार हैं. उन्होंने देवताओं के लिए कई अद्भुत भवनों, नगरों और अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया था. इसलिए विश्वकर्मा पूजा के दिन औजारों की पूजा करने के साथ भगवान की कथा सुनने और पढ़ने की भी परंपरा बताई गई है. इस अवसर पर आइए जानते हैं भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी दो प्रचलित पौराणिक कथाएं.
पहली कथा: ऐसे हुआ भगवान विश्वकर्मा का जन्म
भगवान विश्वकर्मा को भारतीय धार्मिक परंपरा में देवताओं के शिल्पकार, वास्तुकार और निर्माण-कला के आचार्य के रूप में माना जाता है. उनके जन्म और वंश को लेकर अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में अलग विवरण मिलता है. इसलिए विश्वकर्मा जी की जन्मकथा बताते समय विभिन्न शास्त्रीय संदर्भों को अलग-अलग समझना जरूरी है.
श्रीमद्भागवत महापुराण के छठे स्कंध, छठे अध्याय के 15वें श्लोक में भगवान विश्वकर्मा के संबंध में स्पष्ट उल्लेख मिलता है. श्लोक में कहा गया है कि वास्तु नामक वसु की पत्नी अंगिरसी से विश्वकर्मा का जन्म हुआ और वे महान वास्तुकार बने. ऋग्वेद के दशम मंडल के 82वें सूक्त में 'विश्वकर्मा' नाम से सूक्त मिलता है. यहां विश्वकर्मा को व्यापक सृष्टि से जुड़े दिव्य तत्व और धाता के रूप में संबोधित किया गया है. सूक्त में उन्हें ऐसा जानने वाला बताया गया है जो सभी लोकों और उनके धामों को जानता है.
बाद की पुराणिक परंपराओं में विश्वकर्मा को देवताओं के भवन, नगर, आभूषण और विभिन्न दिव्य निर्माणों से जोड़ा गया है. विष्णु पुराण से संबंधित परंपरा में उन्हें वसु प्रभास का पुत्र बताया गया है. इससे स्पष्ट होता है कि विश्वकर्मा के जन्म की कथा अलग-अलग ग्रंथों में अलग रूपों में मिलती है. इस तरह शास्त्रीय परंपरा में भगवान विश्वकर्मा केवल एक शिल्पकार के रूप में नहीं, बल्कि वास्तुकला, निर्माण-कौशल और दिव्य शिल्पविद्या के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित हैं. यही कारण है कि विश्वकर्मा पूजा के दिन औजारों, मशीनों और निर्माण से जुड़े उपकरणों की पूजा करने की परंपरा प्रचलित है.
ये भी पढ़ें: Vishwakarma Puja 2026: आज 17 सितंबर को इस समय करें भगवान विश्वकर्मा की पूजा, जानें शुभ मुहूर्त और विधि
काशी के रथकार दंपती की पूरी हुई मनोकामना
भगवान विश्वकर्मा की पूजा से जुड़ी एक लोकप्रिय कथा काशी के एक रथकार दंपती की है. इस कथा में भगवान विश्वकर्मा की आराधना और उनकी कृपा से दंपती की मनोकामना पूरी होने का प्रसंग मिलता है. कथा के अनुसार, प्राचीन काशी में एक रथकार अपनी पत्नी के साथ रहता था. वह अपने शिल्प और काम में कुशल था, लेकिन मेहनत के बावजूद परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. इसके अलावा, दंपती संतान न होने के कारण भी चिंतित रहता था. संतान की इच्छा से दोनों साधु-संतों के पास जाते और उनसे उपाय पूछते थे. वे श्रद्धा के साथ प्रार्थना करते, लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी उनकी मनोकामना पूरी नहीं हुई.
