Vikata Sankashti Chaturthi Vrat Katha: विकट संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है. हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक माह की चतुर्थी तिथि को यह व्रत रखा जाता है. वैशाख मास में पड़ने वाली इस चतुर्थी को विकट संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है. मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से आराधना करने और व्रत रखने से जीवन के सभी विकट, यानी बाधाएँ और संकट दूर हो जाते हैं.
विकट संकष्टी व्रत कथा
प्राचीन काल में धर्मकेतु नाम का एक ब्राह्मण रहता था. उसकी दो पत्नियां थीं- सुशीला और चंचला. सुशीला स्वभाव से अत्यंत धार्मिक और सरल थी, जो अपना अधिकतर समय व्रत और उपवास में व्यतीत करती थी, जबकि चंचला का धर्म-कर्म में कोई मन नहीं था और वह सांसारिक सुखों में मग्न रहती थी.
समय के साथ सुशीला को एक पुत्री और चंचला को एक पुत्र प्राप्त हुआ. इस पर चंचला ने सुशीला को ताना देते हुए कहा कि इतने व्रत करने के बाद भी उसे केवल एक पुत्री मिली, जबकि बिना किसी पूजा-पाठ के उसे पुत्र की प्राप्ति हुई है. चंचला की कड़वी बातें सुनकर सुशीला को बुरा लगा, लेकिन उसने पूरे श्रद्धा भाव से विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया. उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने उसे एक तेजस्वी पुत्र का वरदान दिया.
कुछ समय बाद पति की मृत्यु हो जाने पर दोनों पत्नियां अलग-अलग रहने लगीं. सुशीला का पुत्र बड़ा होकर अत्यंत विद्वान बना, जिससे उनके घर में सुख-समृद्धि आ गई. इसके विपरीत, चंचला का पुत्र आलसी और गुणहीन निकला. सुशीला की उन्नति देखकर चंचला के मन में जलन उत्पन्न हो गई. एक दिन अवसर पाकर उसने सुशीला के पुत्र को कुएँ में धकेल दिया. लेकिन सुशीला की भक्ति और व्रत के प्रभाव से स्वयं भगवान गणेश ने उसके पुत्र के प्राणों की रक्षा की.
जब चंचला ने देखा कि भगवान स्वयं सुशीला के परिवार की रक्षा कर रहे हैं, तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. उसने सुशीला से माफी मांगी. सुशीला के मार्गदर्शन में चंचला ने भी संकष्टी चतुर्थी का व्रत करना शुरू किया, जिससे उसका जीवन सुधर गया और उसके पुत्र को भी सद्बुद्धि प्राप्त हुई.
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