Vat Savitri 2026: भारतीय संस्कृति में पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए किए जाने वाले प्रमुख व्रतों में से एक है वट सावित्री व्रत. यह व्रत हर वर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को रखा जाता है. यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सती सावित्री के अटूट प्रेम, दृढ़ संकल्प और बुद्धिमानी की विजय का प्रतीक भी है. मान्यता है कि इसी दिन सती सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज के पाश से मुक्त कराए थे.
पौराणिक कथा
राजा अश्वपति की कठिन तपस्या
प्राचीन काल में मद्र देश में अश्वपति नाम के एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे. उनकी कोई संतान नहीं थी, जिसके कारण वे सदैव चिंतित रहते थे. संतान प्राप्ति की कामना से राजा ने मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियां देना प्रारंभ किया. अठारह वर्षों तक उन्होंने यह कठिन तपस्या जारी रखी. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी सावित्री साक्षात प्रकट हुईं और राजा को वरदान दिया “हे राजन! तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें एक तेजस्वी कन्या का वरदान देती हूं.”
देवी सावित्री की कृपा से जन्म लेने के कारण उस कन्या का नाम ‘सावित्री’ रखा गया. सावित्री बड़ी होकर अत्यंत रूपवान और गुणवान हुईं. जब वह विवाह योग्य हुईं, तो उनके योग्य कोई वर न मिलने के कारण राजा अश्वपति दुखी रहने लगे. तब उन्होंने सावित्री को स्वयं अपना वर तलाशने का आदेश दिया.
सावित्री अपने मंत्रियों के साथ तपोवन में भ्रमण करने लगीं. वहाँ उन्होंने साल्व देश के राजा द्युमत्सेन को देखा, जो अंधे होने और राज्य छिन जाने के कारण अपनी पत्नी और पुत्र के साथ वन में कुटिया बनाकर रह रहे थे. उनके पुत्र सत्यवान को देखते ही सावित्री ने उन्हें अपने पति के रूप में चुन लिया.
नारद जी की भविष्यवाणी
जब सावित्री वापस लौटीं, तब वहाँ देवर्षि नारद उपस्थित थे. सावित्री द्वारा सत्यवान का चयन करने की बात सुनकर नारद जी चिंतित हो गए और बोले “हे राजन! यह क्या अनर्थ हुआ? सत्यवान भले ही सर्वगुण संपन्न, धर्मात्मा और बलवान हैं, किंतु वे अल्पायु हैं. आज से ठीक एक वर्ष पश्चात उनकी मृत्यु निश्चित है.”
सावित्री का अटूट निश्चय
नारद जी की बात सुनकर राजा अश्वपति घोर चिंता में डूब गए. उन्होंने सावित्री को समझाते हुए कहा—
“पुत्री! सत्यवान अल्पायु हैं, तुम किसी और को अपना जीवनसाथी चुन लो.”
परंतु सावित्री अपने निश्चय पर अडिग रहीं. उन्होंने सत्यवान को ही अपना पति माना. सावित्री के हठ के आगे राजा को झुकना पड़ा और उन्होंने धूमधाम से सावित्री का विवाह सत्यवान से कर दिया.
सावित्री की कठिन साधना
विवाह के बाद सावित्री अपने ससुराल पहुँचीं और राजमहल के सुख त्यागकर वनवासी सास-ससुर और पति की सेवा में लीन हो गईं. समय बीतता गया, लेकिन नारद जी द्वारा बताया गया वह दुखद दिन सावित्री को सदैव याद रहा. जब सत्यवान की मृत्यु में केवल तीन दिन शेष रह गए, तब सावित्री ने ‘त्रिरात्रि व्रत’ शुरू किया और अन्न-जल का त्याग कर दिया.
निश्चित तिथि पर सावित्री ने पितरों का पूजन किया. उस दिन सत्यवान लकड़ी काटने जंगल जाने लगे, तो सावित्री ने भी उनके साथ जाने की जिद की. सत्यवान के मना करने के बावजूद, सास-ससुर की आज्ञा लेकर सावित्री उनके साथ चल दीं.
यमराज का आगमन और सावित्री का पीछा
जंगल में लकड़ी काटते समय अचानक सत्यवान के सिर में तेज दर्द हुआ. वे व्याकुल होकर नीचे उतरे और सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए. तभी सावित्री ने देखा कि साक्षात यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए हैं. यमराज ने सत्यवान के प्राणों को अपने पाश में बाँधा और दक्षिण दिशा की ओर चल दिए.
सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगीं. यमराज ने उन्हें बहुत समझाया कि मृत्यु अटल है और यही विधि का विधान है, अतः वे वापस लौट जाएँ. लेकिन सावित्री ने कहा—
“भगवन! जहाँ मेरे पति जाएंगे, वहाँ जाना मेरा धर्म है. पतिव्रता का यही मार्ग है.”
यमराज से तीन वरदान
सावित्री की निष्ठा और बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें पति के प्राणों को छोड़कर तीन वरदान माँगने को कहा.
प्रथम वरदान: सावित्री ने मांगा “मेरे सास-ससुर वनवासी और अंधे हैं, उन्हें पुनः दिव्य ज्योति अर्थात आँखों की रोशनी प्राप्त हो जाए.” यमराज ने कहा “तथास्तु! ऐसा ही होगा.”
द्वितीय वरदान: जब सावित्री फिर भी पीछे चलती रहीं, तो उन्होंने दूसरा वर माँगा “मेरे ससुर का खोया हुआ राज्य उन्हें वापस मिल जाए.” यमराज ने “तथास्तु” कहते हुए उन्हें वापस लौट जाने को कहा.
तृतीय वरदान: सावित्री फिर भी नहीं रुकीं. तब यमराज ने तीसरा वर माँगने को कहा. सावित्री ने चतुराई से कहा “प्रभु! मैं सौ पुत्रों की माता बनूँ और मेरा सौभाग्य अखंड रहे.”इस पर यमराज ने बिना सोचे-समझे “तथास्तु” कह दिया.
सत्यवान को मिला पुनर्जीवन दान
वरदान देने के बाद जब यमराज आगे बढ़े, तो सावित्री ने उन्हें रोककर विनम्रता से कहा “प्रभु! आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है, किंतु पति के बिना मैं पुत्रवती कैसे हो सकती हूँ? अतः अपने वचन की रक्षा के लिए आपको मेरे पति के प्राण लौटाने होंगे.”
सावित्री की तर्कशक्ति और पतिभक्ति देखकर यमराज अत्यंत प्रसन्न हुए. उन्होंने सहर्ष सत्यवान के प्राण मुक्त कर दिए और अंतर्ध्यान हो गए. सावित्री उसी वट वृक्ष (बरगद) के नीचे लौटीं, जहाँ सत्यवान का निर्जीव शरीर पड़ा था. सावित्री के स्पर्श से सत्यवान पुनः जीवित हो उठे. जब वे घर पहुँचे, तो देखा कि माता-पिता की आँखों की रोशनी वापस आ गई थी और उनका खोया हुआ राज्य भी उन्हें पुनः प्राप्त हो गया था.
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