शंकर जालान
Tarakeshwar Mahadev Temple: देश में भगवान शिव के कई प्रसिद्ध मंदिर और तीर्थस्थल हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में हुगली जिले का तारकेश्वर महादेव मंदिर विशेष आस्था का केंद्र माना जाता है. खासकर सावन के महीने में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु और कांवड़िये पहुंचते हैं. कोलकाता के भूतनाथ मंदिर, उत्तर 24 परगना के बारह महादेव, काशी विश्वनाथ, जबरेश्वर महादेव, दक्षिण कोलकाता के भू-कैलाश और बर्दवान के 108 महादेव मंदिरों में भी सावन के दौरान भक्तों की भीड़ रहती है, लेकिन तारकेश्वर धाम की अपनी अलग पहचान है.
कपिला गाय से जुड़ी है मंदिर की पौराणिक कथा
तारकेश्वर मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, तारकेश्वर से करीब तीन मील दूर रामनगर में राजा विष्णु दास के भाई भारमल राव का महल था. उनके पास कपिला नाम की एक गाय थी, जिसे मुकुंद नाम का ग्वाला जंगल में चराने ले जाता था. अचानक कपिला का दूध कम होने लगा. जब ग्वाले ने जंगल में जाकर देखा, तो एक स्थान पर शिवलिंग के आकार के पत्थर के ऊपर खड़ी कपिला स्वयं दूध अर्पित कर रही थी.
दिव्य संकेत के बाद हुआ मंदिर निर्माण
मुकुंद ने यह अद्भुत घटना भारमल राव को बताई. उन्होंने स्वयं मौके पर पहुंचकर उस स्थान को देखा और शिवलिंग को महल ले जाने के लिए खुदाई शुरू करवाई. मान्यता है कि काफी गहराई तक खुदाई करने के बावजूद उस पत्थर का अंत नहीं मिला. उसी रात भगवान तारकनाथ ने भारमल को स्वप्न में दर्शन देकर उसी स्थान पर मंदिर बनवाने का निर्देश दिया. इसके बाद वहां मंदिर निर्माण कराया गया और धीरे-धीरे यह स्थान तारकेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हो गया.
सावन और शिवरात्रि में उमड़ते हैं लाखों श्रद्धालु
आज तारकेश्वर धाम सावन और महाशिवरात्रि के दौरान विशेष रूप से भक्तों से गुलजार रहता है. श्रद्धालु बाबा तारकनाथ का दर्शन और पूजन कर आशीर्वाद लेते हैं. कोलकाता से करीब 60 किलोमीटर दूर हुगली जिले में स्थित तारकेश्वर रेलवे स्टेशन भी इस तीर्थ की पहचान से जुड़ा है. यह मंदिर भगवान शिव के तारकनाथ स्वरूप को समर्पित है.
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आस्था के साथ जुड़ी है स्थानीय पहचान
तारकेश्वर महादेव केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की शिवभक्ति और तीर्थ परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है. सावन में यहां आने वाले कांवड़िये और श्रद्धालु इस धाम को अपनी धार्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव मानते हैं. मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा और सदियों से चली आ रही पूजा परंपराएं इसकी धार्मिक महत्ता को और विशेष बनाती हैं.
