Shadi Vivah Muhurt 2026: ज्योतिषीय गणना के अनुसार, मंगलवार सुबह 11:45 बजे भगवान सूर्य मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करेंगे. इसी के साथ खरमास की अवधि समाप्त हो जाएगी. सनातन धर्म में खरमास को मांगलिक कार्यों के लिए शुभ नहीं माना जाता, इसलिए इसके समाप्त होते ही विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाती है. हालांकि वैवाहिक लग्न 20 अप्रैल से आरंभ होंगे, यानी अभी छह दिन का अंतराल रहेगा.
मांगलिक कार्यों की शुरुआत और विवाह मुहूर्त
खरमास समाप्त होने के बाद अब सभी मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाएगी. शुभ लग्न 20 अप्रैल से शुरू होने के बाद शादी-विवाह और अन्य शुभ कार्यों की धूम देखने को मिलेगी.
अप्रैल 2026 में शादी विवाह के 7 मुहूर्त
- सोमवार, 20 अप्रैल 2026
- मंगलवार, 21 अप्रैल 2026
- शनिवार, 25 अप्रैल 2026
- रविवार, 26 अप्रैल 2026
- सोमवार, 27 अप्रैल 2026
- मंगलवार, 28 अप्रैल 2026
- बुधवार, 29 अप्रैल 2026
मई 2026 में शादी विवाह के 8 मुहूर्त
- शुक्रवार, 1 मई 2026
- रविवार, 3 मई 2026
- मंगलवार, 5 मई 2026
- बुधवार, 6 मई 2026
- गुरुवार, 7 मई 2026
- शुक्रवार, 8 मई 2026
- बुधवार, 13 मई 2026
- गुरुवार, 14 मई 2026
जून 2026 में शादी विवाह के 8 मुहूर्त
- रविवार, 21 जून 2026
- सोमवार, 22 जून 2026
- मंगलवार, 23 जून 2026
- बुधवार, 24 जून 2026
- गुरुवार, 25 जून 2026
- शुक्रवार, 26 जून 2026
- शनिवार, 27 जून 2026
- सोमवार, 29 जून 2026
जुलाई 2026 में शादी विवाह के 8 मुहूर्त
- बुधवार, 1 जुलाई 2026
- सोमवार, 6 जुलाई 2026
- मंगलवार, 7 जुलाई 2026
- शनिवार, 8 जुलाई 2026
सतुआ संक्रांति का धार्मिक महत्व
मेष संक्रांति को कई स्थानों पर सतुआ संक्रांति या सतुआन के रूप में मनाया जाता है. इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व माना गया है. मान्यता है कि इस पावन अवसर पर स्नान, दान और पितरों के निमित्त तर्पण करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है. इस दौरान सत्तू, गुड़, पंखा, जल से भरा घड़ा या सुराही आदि का दान करने की परंपरा है. माना जाता है कि इन वस्तुओं के दान से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है.
काशी में विशेष धार्मिक आयोजन
काशी में मेष संक्रांति के अवसर पर श्रद्धालु गंगा तटों पर स्नान कर पितरों को तर्पण अर्पित करते हैं और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं. इस दिन मणिकर्णिका घाट स्थित सतुआ बाबा आश्रम में विशेष आयोजन होता है. मान्यता है कि इसी दिन बाबा श्रीकाशी विश्वनाथ के आदेश से प्रथम सतुआ बाबा, श्रीमहंत रणछोड़दास महाराज ने सतुआ दान की परंपरा की शुरुआत की थी. आज भी श्रद्धालु इस परंपरा को पूरी आस्था के साथ निभाते हैं.
ये भी पढ़ें: मेष संक्रांति पर भारत में रंग-बिरंगे त्योहार, जानें बैसाखी से बिहू तक की परंपराएं
बैसाखी का उल्लास और ऐतिहासिक महत्व
इसी दिन सिख समुदाय भी बैसाखी पर्व को बड़े उत्साह के साथ मनाता है. यह पर्व फसल कटाई की खुशी का प्रतीक है और नए वर्ष की शुरुआत के रूप में भी मनाया जाता है. बैसाखी का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह सिख धर्म के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना की याद दिलाता है. इस दिन लोग नए वस्त्र धारण कर गुरुद्वारों में मत्था टेकते हैं और उत्सव का आनंद लेते हैं. इस प्रकार मेष संक्रांति, सतुआन और बैसाखी जैसे पर्व आस्था, परंपरा और उल्लास का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हैं.
