रोंगाली बिहू का त्योहार आज से शुरू, जानें कैसे मनाया जाता है 7 दिनों का यह पावन पर्व

Rongali Bihu 2026: रोंगाली बिहू असम के प्रमुख त्योहारों में से एक है. यह पर्व 7 दिनों तक मनाया जाता है. आइए जानते हैं इन सात दिनों को क्या कहते हैं. इसके साथ ही इन सभी दिनों के महत्व के बारे में विस्तार से.

Rongali Bihu 2026: 14 अप्रैल, मंगलवार से असम में मनाए जाने वाले ‘रोंगाली बिहू’ पर्व की शुरुआत हो चुकी है. इसे ‘बोहाग बिहू’ के नाम से भी जाना जाता है. यह त्योहार असमिया नववर्ष का प्रतीक है. हिंदू पंचांग के अनुसार, जब सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करता है, तभी से नए वर्ष की शुरुआत मानी जाती है.

रोंगाली बिहू का संदेश

रोंगाली बिहू नई उम्मीदों, खुशियों और जीवन में सकारात्मक बदलाव का संदेश लेकर आता है. यह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि इसका गहरा धार्मिक महत्व भी है. इस दिन लोग पुराने विवादों को भुलाकर एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान व्यक्त करते हैं, साथ ही सुख-शांति की कामना करते हैं.

रोंगाली बिहू: सात दिनों का महाउत्सव

14 अप्रैल से शुरू हुआ यह पर्व 20 अप्रैल को समाप्त होगा. इन सातों दिनों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है:

  • पहला दिन – गोरु बिहू
  • दूसरा दिन – मानुह बिहू
  • तीसरा दिन – गोसाई बिहू
  • चौथा दिन – कुटुम बिहू
  • पांचवां दिन – तांत या नांगल बिहू
  • छठा दिन – चेनेह बिहू
  • सातवां दिन – चेरा बिहू

गोरु बिहू

उत्सव का पहला दिन मवेशियों को समर्पित होता है. इस दिन गायों और बैलों को पवित्र नदियों या तालाबों में नहलाया जाता है. उन्हें काली दाल और हल्दी (माह-हलोधी) का लेप लगाया जाता है. साथ ही उन्हें लौकी और बैंगन खिलाकर उनके अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना की जाती है.

मानुह बिहू

यह असमिया कैलेंडर का पहला दिन होता है. लोग सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और नए वस्त्र धारण करते हैं. इस दिन अपने से बड़ों को ‘गमोसा’ (पारंपरिक कपड़ा) भेंट कर उनका आशीर्वाद लेने की परंपरा है.

गोसाई बिहू

यह दिन आध्यात्मिकता और ईश्वर को समर्पित है. लोग मंदिरों और नामघरों में जाकर पूजा-अर्चना करते हैं. लोग सामूहिक रूप से प्रार्थना करते हैं और आने वाले साल के लिए सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.

कुटुम बिहू

‘कुटुम’ का अर्थ होता है रिश्तेदार. इस दिन लोग अपने रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों के घर जाते हैं. परिवार के सदस्य एक साथ मिलकर पारंपरिक पकवान बनाते और खाते हैं. साथ ही एक-दूसरे को उपहार देते हैं. यह आपसी बंधनों को मजबूत करने का दिन है.

तांत या नांगल बिहू

यह दिन खेती के उपकरणों और हथकरघे को समर्पित है. असमिया संस्कृति में खेती और बुनाई का बहुत महत्व है. इस दिन किसान अपने हल (नांगल) और महिलाएं अपने करघे की सफाई करती हैं और उनकी पूजा करती हैं. यह दिन नई फसल की तैयारी और श्रम के प्रति सम्मान का प्रतीक है.

चेनेह बिहू

‘चेनेह’ का अर्थ होता है प्रेम या स्नेह. यह दिन मुख्य रूप से प्रेमी-प्रेमिकाओं और दोस्तों के लिए होता है. इस दिन लोग एक-दूसरे को उपहार देते हैं. साथ ही बिहू गीतों और नृत्य के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं.

चेरा बिहू

यह उत्सव का अंतिम दिन है. ‘चेरा’ का अर्थ है समाप्त होना. इस दिन लोग भविष्य के लिए संकल्प लेते हैं और सात दिनों के उत्सव का समापन करते हैं. अगले साल बिहू के फिर से आने की उम्मीद और नई ऊर्जा के साथ लोग अपने दैनिक कार्यों में लग जाते हैं.

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लेखक के बारे में

By Neha Kumari

प्रभात खबर डिजिटल के जरिए मैंने पत्रकारिता की दुनिया में अपना पहला कदम रखा है. यहां मैं धर्म और राशिफल बीट पर बतौर जूनियर कंटेंट राइटर के तौर पर काम कर रही हूं. इसके अलावा मुझे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े विषयों पर लिखने में रुचि है.

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