सावन सोमवार व्रत कथा: शिव-पार्वती की कृपा से कैसे मिला भक्त के अल्पायु पुत्र को नया जीवन?

सावन माह की शुरुआत हो चुकी है और यह भगवान शिव को समर्पित है. इस पावन अवसर पर पढ़ें सावन सोमवार की पौराणिक व्रत कथा. यह कथा अटूट भक्ति और भगवान शिव की असीम कृपा का संदेश देती है.

Sawan 2026: 30 जुलाई से सावन माह का शुभारंभ हो चुका है. भगवान शिव को समर्पित यह पावन महीना भक्तों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि सावन के प्रत्येक सोमवार का व्रत रखने, विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने और व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. आइए सावन माह के इस पावन अवसर पर पढ़ें सावन सोमवार की यह पौराणिक व्रत कथा, जो अटूट भक्ति, अडिग विश्वास और भगवान शिव की असीम कृपा का संदेश देती है.

पौराणिक कथा

सेठ की भक्ति और पुत्र प्राप्ति की कामना

प्राचीन समय में अमरपुर नामक नगर में एक अत्यंत धनी सेठ रहता था. उसका व्यापार दूर-दूर तक फैला हुआ था और समाज में उसका बड़ा मान-सम्मान था. अपार धन-संपत्ति होने के बावजूद वह मन ही मन दुखी रहता था, क्योंकि उसकी कोई संतान नहीं थी. उसे हमेशा इस बात की चिंता सताती रहती थी कि उसके बाद उसके व्यापार और संपत्ति का उत्तराधिकारी कौन होगा. पुत्र प्राप्ति की कामना से वह प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव का व्रत रखता था. सायंकाल वह शिव मंदिर जाकर घी का दीपक जलाता और पूरे श्रद्धाभाव से भोलेनाथ की आराधना करता था.

माता पार्वती का आग्रह और भगवान शिव का वरदान

व्यापारी की निष्काम भक्ति देखकर एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा, "हे प्राणनाथ! यह व्यापारी आपका अनन्य भक्त है. वर्षों से श्रद्धापूर्वक सोमवार का व्रत और पूजन कर रहा है. इसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण कीजिए." भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "हे पार्वती! इस संसार में प्रत्येक प्राणी को उसके कर्मों के अनुसार ही फल प्राप्त होता है."

लेकिन माता पार्वती ने पुनः आग्रह किया. तब भगवान शिव बोले, "मैं इसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूँ, किंतु इसका पुत्र केवल 16 वर्ष की आयु तक ही जीवित रहेगा."उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी को स्वप्न में दर्शन देकर पुत्र-प्राप्ति का वरदान और उसके पुत्र की अल्पायु का रहस्य बता दिया.

बालक अमर का जन्म

समय आने पर व्यापारी के घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ. विद्वान ब्राह्मणों ने उसका नाम 'अमर' रखा. पुत्र जन्म से व्यापारी अत्यंत प्रसन्न हुआ, लेकिन पुत्र की अल्पायु का रहस्य जानने के कारण वह भीतर ही भीतर चिंतित रहता था. उसने यह बात अपने परिवार के किसी सदस्य को नहीं बताई.

जब अमर 12 वर्ष का हुआ, तब उसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए वाराणसी भेजने का निर्णय लिया गया. व्यापारी ने अमर के मामा दीपचंद को उसके साथ भेजा. यात्रा के दौरान वे जहाँ भी रुकते, वहाँ यज्ञ करवाते तथा ब्राह्मणों को भोजन और दान-दक्षिणा देते.

राजकुमारी चंद्रिका से विवाह और सत्य का संदेश

यात्रा के दौरान अमर और उसके मामा एक ऐसे नगर पहुँचे, जहाँ राजा की पुत्री राजकुमारी चंद्रिका का विवाह होने वाला था. लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह तय हुआ था, वह एक आँख से काना था. बदनामी के भय से दूल्हे के पिता ने अमर को देखकर उसके मामा से अनुरोध किया कि कुछ समय के लिए अमर को दूल्हा बनाकर विवाह की रस्म पूरी करवा दी जाए. इसके बदले उसने उन्हें पर्याप्त धन देने का वचन दिया.

मामा के सहमत होने पर अमर का विवाह राजकुमारी चंद्रिका से करा दिया गया. किंतु अमर सत्यवादी और ईमानदार था. विदा होने से पहले उसने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया "राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है, लेकिन मैं शिक्षा प्राप्त करने वाराणसी जा रहा हूँ. जिस युवक के साथ तुम्हें भेजा जा रहा है, वह वास्तविक वर नहीं है और एक आंख से काना है." जब राजकुमारी ने यह संदेश पढ़ा, तो उसने उस युवक के साथ जाने से स्पष्ट इंकार कर दिया. राजा ने पूरी सच्चाई जानने के बाद अपनी पुत्री को महल में ही रोक लिया.

16वें वर्ष में संकट और जीवनदान

अमर वाराणसी पहुँचकर गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने लगा. जब उसकी आयु 16 वर्ष पूरी हुई, तब उसने एक विशाल यज्ञ का आयोजन कराया और ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र तथा दक्षिणा का दान दिया.रात्रि में जब वह विश्राम करने गया, तभी भगवान शिव के वरदान के अनुसार शयनावस्था में ही उसके प्राण निकल गए.

सुबह जब उसके मामा ने अमर को मृत देखा, तो वे विलाप करने लगे. उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती अदृश्य रूप में वहां से गुजर रहे थे. माता पार्वती से मामा का विलाप देखा नहीं गया. उन्होंने भगवान शिव से अमर को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की. भगवान शिव ने कहा, "पार्वती! यह उसी व्यापारी का पुत्र है, जिसकी आयु मैंने 16 वर्ष निर्धारित की थी."

माता पार्वती ने पुनः विनती करते हुए कहा, "हे नाथ! इसके पिता वर्षों से श्रद्धापूर्वक आपका सोमवार व्रत कर रहे हैं. यदि यह बालक जीवित नहीं हुआ, तो उसके माता-पिता भी शोक में प्राण त्याग देंगे. कृपया इसे जीवनदान दें." माता पार्वती के करुण आग्रह से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अमर को पुनर्जीवित कर दिया. अमर तुरंत उठकर बैठ गया.

घर वापसी और शिव कृपा का फल

शिक्षा पूर्ण होने के बाद अमर अपने मामा के साथ घर लौटने लगा. मार्ग में वे उसी नगर पहुँचे, जहाँ अमर का विवाह हुआ था. राजा ने अमर को पहचान लिया और अत्यंत सम्मान के साथ अपनी पुत्री चंद्रिका का विधिवत विदा कर दिया. साथ ही उसने धन-धान्य और सैनिक भी उनके साथ भेजे.

उधर अमरपुर में व्यापारी और उसकी पत्नी ने संकल्प लिया था कि यदि पुत्र की मृत्यु का समाचार मिला, तो वे भी अपने प्राण त्याग देंगे. लेकिन जब उन्हें अमर के सकुशल लौटने और उसके विवाह का समाचार मिला, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी को स्वप्न में दर्शन देकर कहा, "हे श्रेष्ठी! तुम्हारे नियमपूर्वक सोमवार व्रत रखने और श्रद्धापूर्वक कथा सुनने से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ. इसी कारण मैंने तुम्हारे पुत्र को दीर्घायु का वरदान प्रदान किया है."

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लेखक के बारे में

By Neha Kumari

नेहा कुमारी वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में धर्म बीट पर कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. वह व्रत-त्योहार, राशिफल, पंचांग, ज्योतिष, शुभ मुहूर्त, पौराणिक कथाओं और भारतीय संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेख लिखती हैं. उन्होंने वेस्ट बंगाल स्टेट यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन की डिग्री प्राप्त की है.

डिजिटल पत्रकारिता में उन्होंने धर्म, ज्योतिष और भारतीय परंपराओं से जुड़े विषयों पर विशेष अनुभव हासिल किया है. उनका उद्देश्य पाठकों तक सरल भाषा में सटीक, विश्वसनीय और उपयोगी जानकारी पहुंचाना है, ताकि वे धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों को आसानी से समझ सकें.

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