डॉ राकेश कुमार सिन्हा ‘रवि’
Purushottam Maas: सनातन परंपरा में पुरुषोत्तम मास (मलमास) को अत्यंत पवित्र और पुण्यकारी माना गया है. इस विशेष मास का समापन 15 जून को होने जा रहा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में किए गए स्नान, दान और पूजा-पाठ से कई गुना पुण्य प्राप्त होता है. इसी कारण भारत के कई तीर्थस्थलों पर इस समय विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं.
इस पावन मास का सबसे प्रमुख तीर्थ स्थल बिहार के नालंदा जिले का राजगीर है, जिसे पर्वतों की नगरी भी कहा जाता है. पांच पर्वतों से घिरी यह नगरी लगभग एक हजार वर्षों तक मगध साम्राज्य की राजधानी रही. यह स्थान भगवान बुद्ध और जैन तीर्थंकर महावीर के जीवन और उपदेशों का साक्षी रहा है. यहां आज भी सम्राट जरासंध, बिंबिसार और अजातशत्रु के ऐतिहासिक अवशेष और विश्व प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर मौजूद हैं.
राजगीर के सप्तकुंड और मलमास स्नान का महत्व
राजगीर में 52 कुंडों का उल्लेख मिलता है, लेकिन इनमें से सप्तकुंडों का विशेष धार्मिक महत्व है. मान्यता है कि मलमास के दौरान यहां देवी-देवताओं का वास होता है. इस समय देश-विदेश से श्रद्धालु यहां स्नान और दान के लिए पहुंचते हैं.
लोक मान्यता के अनुसार, सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने इसी स्थान पर मलमास मेले की शुरुआत की थी. जब राजगीर में ध्वजारोहण होता है, उसी समय मगध के अन्य पवित्र स्थल मधुश्रवा और तपोवन में भी धार्मिक अनुष्ठान आरंभ होते हैं.
मधुश्रवा तीर्थ: रामायण काल से जुड़ा पवित्र स्थल
अरवल जिले के कलेर प्रखंड में स्थित मधुश्रवा तीर्थ को प्राचीन काल में ‘मदसरवा’ कहा जाता था. यहां स्थित श्री मधेश्वरनाथ महादेव को मगध के नव नाथों में स्थान प्राप्त है. मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने गया में पिंडदान के लिए जाते समय यहां भगवान शिव की पूजा की थी और रात्रि विश्राम भी किया था.
तपोवन: चार मानस पुत्रों और पवित्र कुंडों का स्थल
गया जिले के अतरी प्रखंड में स्थित तपोवन तीर्थ राजगीर से लगभग 16 किलोमीटर दूर है. यहां ब्रह्मा जी के चार मानस पुत्रों—सनक, सनंदन, सनातन और सनत कुमार—के नाम पर चार गर्म जल कुंड हैं. यहां स्थित कपिलेश्वर नाथ महादेव मंदिर पालकालीन शिल्पकला का अद्भुत उदाहरण माना जाता है. मान्यता है कि इस पवित्र स्थल के दर्शन मात्र से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
त्रिकोणीय पवित्र धरोहर और आध्यात्मिक महत्व
राजगीर, मधुश्रवा और तपोवन मिलकर एक त्रिकोणीय धार्मिक क्षेत्र बनाते हैं, जो हर तीन वर्ष में आने वाले मलमास के दौरान विशेष रूप से सक्रिय होता है. यह त्रिवेणी भारतीय संस्कृति, आस्था और आध्यात्मिकता को जीवंत बनाए रखती है और श्रद्धालुओं को गहन पुण्य लाभ प्रदान करती है.
