प्रद्युम्न चतुर्थी पर करें इस व्रत कथा का पाठ, घर में रहेगा सुख-समृद्धि का वास

Pradyumna Chaturthi 2026: प्रद्युम्न चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा के दौरान व्रत कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, व्रत कथा के श्रवण और पाठ से नकारात्मकता का नाश होता है तथा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है.

Pradyumna Chaturthi 2026: ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को सनातन धर्म में ‘प्रद्युम्न चतुर्थी’ के नाम से जाना जाता है. इस दिन भगवान गणेश की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और श्रद्धालु व्रत रखते हैं. धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ करता है, उसके जीवन से कष्ट, बाधाएं और विघ्न दूर होते हैं तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है. इस पावन अवसर पर पूजा के समय प्रद्युम्न चतुर्थी व्रत कथा का पाठ करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है. मान्यता है कि इससे भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में मंगलकारी परिणाम मिलते हैं.

राजा कर्दम और उनके भयंकर रोग की कथा

प्राचीन समय में आंध्र प्रदेश में शेषपुर नामक एक समृद्ध और सुंदर नगर था. वहां राजा कर्दम नाम के एक न्यायप्रिय, पराक्रमी और शक्तिशाली शासक राज्य करते थे. उनका साम्राज्य समुद्र तट तक फैला हुआ था और प्रजा भी सुखी थी.

एक दिन अचानक राजा कर्दम प्रमेह रोग से पीड़ित हो गए. इस रोग के कारण उनके पूरे शरीर में असहनीय जलन होने लगी. राज्य के साथ-साथ अन्य देशों के प्रसिद्ध वैद्यों को भी उपचार के लिए बुलाया गया, लेकिन कोई भी उन्हें स्वस्थ नहीं कर सका. जब पीड़ा असहनीय हो गई, तो निराश होकर राजा ने अपना राज-पाट छोड़ दिया और अपनी पत्नी के साथ वन की ओर प्रस्थान कर गए.

जंगल में ऋषि भारद्वाज से हुई भेंट

वन में भटकते हुए राजा कर्दम अपनी असहनीय पीड़ा से इतने व्याकुल हो गए कि उन्होंने जीवन त्यागने का विचार कर लिया. तभी वहां से महान तपस्वी ऋषि भारद्वाज गुजरे. राजा ने कांपते हाथों से ऋषि को प्रणाम किया, लेकिन पीड़ा इतनी अधिक थी कि वे तुरंत भूमि पर गिर पड़े. ऋषि भारद्वाज ने अपनी दिव्य दृष्टि से राजा की स्थिति का कारण जान लिया और कहा “हे राजन! शोक मत करो. तुम्हारे राज्य में भगवान गणेश के चतुर्थी व्रत का पालन बंद हो गया है. इसी दोष के कारण तुम्हें यह भयंकर रोग भोगना पड़ रहा है. यदि तुम अपनी प्रजा सहित श्रद्धा और भक्ति के साथ चतुर्थी व्रत का पुनः आरंभ करोगे, तो तुम्हें इस कष्ट से मुक्ति मिल जाएगी.”

ऋषि ने बताया चतुर्थी व्रत का महत्व

राजा कर्दम ने ऋषि से व्रत की विधि और महत्व के बारे में पूछा. तब ऋषि भारद्वाज ने उन्हें विस्तार से बताया:

  • कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जो जीवन के सभी संकटों और विघ्नों का नाश करती है.
  • शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी अथवा प्रद्युम्न चतुर्थी कहा जाता है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति कराती है.

राजा ने भगवान गणेश के स्वरूप के बारे में भी जानना चाहा. इस पर ऋषि ने कहा “हे राजन! भगवान गणेश का स्वरूप इतना विराट है कि वेद भी उसका पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते. ‘गणेश’ शब्द में ‘ग’ आत्मज्ञान का प्रतीक है और ‘ण’ आत्मयोग का. इन दोनों के स्वामी स्वयं गणपति हैं, जो साधक को ज्ञान, शांति और मोक्ष प्रदान करते हैं.”

व्रत का प्रभाव और राजा की मुक्ति

ऋषि के उपदेश से प्रेरित होकर राजा कर्दम अपने राज्य लौट आए. उन्होंने पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि सभी नागरिक श्रद्धापूर्वक चतुर्थी व्रत का पालन करें.

जब ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी आई, तब राजा ने अपने परिवार और प्रजा के साथ मिलकर पूर्ण श्रद्धा एवं विधि-विधान से प्रद्युम्न चतुर्थी व्रत किया. व्रत पूर्ण होते ही आश्चर्यजनक रूप से उनका भयंकर रोग समाप्त हो गया और वे पूर्णतः स्वस्थ हो गए.

राजा कर्दम ने कई वर्षों तक धर्मपूर्वक राज्य किया. बाद में उन्होंने अपने पुत्र को राजगद्दी सौंप दी और अपनी पत्नी के साथ वन में जाकर भगवान गणेश की भक्ति में लीन हो गए. अंततः गणेश जी की कृपा से उन्हें परम पद की प्राप्ति हुई.

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Published by: Neha Kumari

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