Panchak March 2026: ज्योतिष शास्त्र में पंचक को एक विशेष समय माना जाता है. जब चंद्रमा धनिष्ठा (अंतिम चरण), शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्र में रहता है, तब पंचक लगता है. हिंदू धर्म में पंचक के दौरान शुभ कार्यों को करना वर्जित माना गया है. कहा जाता है कि इस समय मांगलिक कार्य करने से शुभ परिणाम नहीं मिलता है. साथ ही, कार्यों में अड़चनें आने की संभावना भी रहती है.
पंचक 2026: तिथि और मूर्हुत
पंचक की शुरुआत: 16 मार्च 2026 (सोमवार), शाम 06:14 बजे से.
पंचक की समाप्ति: 21 मार्च 2026 (शनिवार), सुबह 02:27 बजे तक.
चूंकि इस बार पंचक की शुरुआत सोमवार के दिन हो रही है, इसलिए इसे राज पंचक कहा जाता है. ज्योतिष में राज पंचक को सामान्य पंचक की तुलना में थोड़ा अलग प्रभाव वाला माना जाता है.
पंचक क्यों माना जाता है अशुभ
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब चंद्रमा धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब इसके प्रभाव से चंद्रमा की स्थिति अस्थिर और कमजोर मानी जाती है. चंद्रमा मानसिक शांति और चेतना का कारक माना जाता है. इसलिए पंचक के दौरान इसके अस्थिर होने के कारण इस समय शुभ कार्य करने से बचने की सलाह दी जाती है. हालांकि यह समय आध्यात्मिक कार्यों, आत्मचिंतन और शुद्धि के लिए सर्वोत्तम माना जाता है.
पंचक के दौरान किन कामों से बचना चाहिए
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पंचक के दौरान कुछ कार्य करने से बचना चाहिए, जैसे —
- नए काम की शुरुआत करना
- विवाह से जुड़ी बातचीत या रिश्ता तय करना
- घर की छत बनवाना या बड़ा निर्माण कार्य शुरू करना
- लकड़ी या घास इकट्ठा करना
- दक्षिण दिशा की यात्रा शुरू करना
अंतिम संस्कार में की जाती है पंचक शांति
यदि पंचक के दौरान किसी कारणवश अंतिम संस्कार करना पड़े, तो शास्त्रों में इसके लिए पंचक शांति कराने का उल्लेख मिलता है. कई स्थानों पर इस स्थिति में विशेष पूजा कराई जाती है, ताकि किसी प्रकार का दोष न लगे.
नवरात्रि के समय भी रहेगा पंचक
इस साल चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू हो रही है. उस समय पंचक पहले से चल रहे होंगे. इसलिए नवरात्रि के शुरुआती दिनों में लोग बड़े शुभ कार्यों से बचते हैं और पूजा-पाठ पर अधिक ध्यान देते हैं. राज पंचक को पूरी तरह अशुभ नहीं माना जाता, लेकिन परंपरा के अनुसार इस दौरान बड़े या स्थायी काम शुरू करने से पहले शुभ समय का इंतजार करना बेहतर माना जाता है.
— आचार्य विनोद त्रिपाठी
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