Mahashivratri Katha: जब प्रेम केवल भावना न रहकर तप, त्याग और आत्मबलिदान बन जाए, तब जन्म लेती है शिव और शक्ति की अमर गाथा. यह कथा है उस दिव्य प्रेम की, जिसमें अपमान की अग्नि में भी आस्था अडिग रही और ‘सती’ ने अपने आत्मसम्मान और प्रेम की रक्षा के लिए स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया. महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि उसी अनंत प्रेम, विरह और पुनर्मिलन की स्मृति है, जिसने सृष्टि को हिला दिया और शिव को समाधि से तांडव तक ले आया.
मां आद्या शक्ति थी राजा दक्ष की पुत्री
राजा दक्ष प्रजापति ने कठोर तपस्या कर मां आद्या शक्ति को अपनी पुत्री ‘सती’ के रूप में प्राप्त किया. समय आने पर ब्रह्मा जी के परामर्श से सती का विवाह आदि पुरुष भगवान शिव से संपन्न हुआ. एक राजसभा में जब भगवान शिव ने औपचारिक रूप से खड़े होकर दक्ष का सम्मान नहीं किया, तो अहंकार से भरे दक्ष ने इसे अपना घोर अपमान समझ लिया. उसी क्षण उनके मन में शिव के प्रति वैर और विरोध की अग्नि प्रज्वलित हो उठी, जिसने आगे चलकर एक महाविनाशकारी घटना को जन्म दिया.
दक्ष का महायज्ञ और सती का हठ
एक बार राजा दक्ष ने कनखल में एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया. आकाश मार्ग से जाते देवताओं को देख सती ने शिव से वहां जाने का हठ किया. शिव ने बहुत समझाया कि “बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए”, पर सती नहीं मानीं. शिव ने उन्हें वीरभद्र के साथ भेज दिया.
अपमान की अग्नि
दक्ष के घर पहुंचकर सती को घोर अपमान का सामना करना पड़ा. दक्ष ने शिव के लिए कटु शब्द कहे. “तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक है” सती ने यज्ञमंडप में देखा कि सभी देवताओं का भाग है, पर उनके स्वामी शिव का नहीं.
सती का आत्मदाह
पति का यह अपमान सती से सहन नहीं हुआ. उन्होंने क्रोधित होकर कहा- “जो नारी अपने पति के लिए अपमानजनक शब्द सुनती है, उसे नरक मिलता है. मैं अब एक क्षण भी जीवित नहीं रहना चाहती और सती ने योगाग्नि से स्वयं को भस्म कर लिया.
शिव का तांडव और शक्तिपीठों का निर्माण
इस घटना की जानकारी मिलते ही भगवान शिव प्रलयंकार रूप में वहां पहुंचे. वीरभद्र ने दक्ष का वध किया. सती के जले हुए शरीर को देखकर शिव अपनी सुध-बुध खो बैठे. वे सती के शव को कंधे पर उठाकर तीनों लोकों में घूमने लगे. सृष्टि थम गई. भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के अंगों को काटा. जहां-जहां सती के अंग गिरे, वहां 51 शक्तिपीठ स्थापित हुए.
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