Maa Kauleshwari Shaktipeeth: झारखंड के चतरा जिले के हंटरगंज प्रखंड में स्थित कौलेश्वरी पहाड़ पर माता कौलेश्वरी का प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. कोल्हुआ पहाड़ के नाम से प्रसिद्ध यह स्थल समुद्र तल से लगभग 1,575 फीट (करीब 450 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित है और इसे विंध्य पर्वतमाला का विस्तारित भाग माना जाता है. यहां वर्षभर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है.
संतान प्राप्ति की मन्नत के लिए प्रसिद्ध है यह शक्तिपीठ
माता कौलेश्वरी को कुल और संतान की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है. स्थानीय मान्यता के अनुसार संतान की इच्छा रखने वाले दंपत्ति यहां आकर माता से मन्नत मांगते हैं. इच्छा पूरी होने पर वे अपने बच्चे के साथ पुनः मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं. यही कारण है कि यह शक्तिपीठ संतान प्राप्ति की आस्था से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है.
शक्तिपीठ बनने की मान्यता
पौराणिक मान्यता के अनुसार माता सती के अंग 108 स्थानों पर गिरे थे, जो आगे चलकर शक्तिपीठ कहलाए. कोल्हुआ पहाड़ के बारे में विश्वास है कि यहां माता सती का गर्भ भाग गिरा था. इसी वजह से यहां देवी की पूजा माता कौलेश्वरी के रूप में होती है, जिनका अर्थ है—“कुल की रक्षा करने वाली देवी.”
इतिहास और मान्यताओं का संगम
मंदिर की स्थापना को लेकर कोई स्पष्ट पुरातात्विक या अभिलेखीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है. हालांकि स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यहां मूल मंदिर की स्थापना महाभारत काल में हुई थी, जिससे इसकी आयु 2,500 वर्ष से भी अधिक मानी जाती है. यह केवल धार्मिक विश्वास है, ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं. कहा जाता है कि भगवान बुद्ध भी इस पहाड़ी पर ध्यान करने आए थे. वहीं, यहां प्राप्त कुछ पत्थर की मूर्तियां और अवशेष सम्राट हर्षवर्धन काल (लगभग 645 ईस्वी) के बताए जाते हैं. वर्तमान ईंट और सीमेंट से निर्मित मंदिर का पुनर्निर्माण लगभग 150 वर्ष पहले कराया गया माना जाता है.
दानव कौल और माता कौलेश्वरी की कथा
स्थानीय लोककथाओं के अनुसार कौल नामक एक अत्याचारी दानव लोगों को परेशान करता था और धार्मिक अनुष्ठानों में बाधा डालता था. लोगों की प्रार्थना पर माता शक्ति ने उग्र रूप धारण कर उसका वध किया. तभी से देवी को कौलेश्वरी कहा जाने लगा.
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महाभारत से जुड़ी रोचक मान्यता
मंदिर के निकट स्थित मंडवा मंडई को लेकर स्थानीय मान्यता है कि यहां पांडवों और राजा विराट का मिलन हुआ था तथा अभिमन्यु और उत्तरा का विवाह भी यहीं संपन्न हुआ था. हालांकि इतिहासकारों के अनुसार अभिमन्यु-उत्तरा का विवाह मत्स्य राज्य की राजधानी विराटनगर (वर्तमान राजस्थान) में हुआ था, इसलिए यह कथा लोकविश्वास का हिस्सा मानी जाती है.
