Jagannath Rath Yatra 2026: आज पूरे देश में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का उत्साह चरम पर है. विश्व प्रसिद्ध पुरी रथयात्रा में शामिल होने के लिए देशभर से लाखों श्रद्धालु ओडिशा पहुंचे हैं. आज से शुरू हुआ यह भव्य महापर्व 27 जुलाई को नीलाद्री बीजे की पारंपरिक रस्म के साथ संपन्न होगा.
श्रीजगन्नाथ स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर भक्तों के बीच आएंगे
श्रीजगन्नाथ रथयात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वर्षभर जिन भगवान के विग्रहों को स्पर्श करने की अनुमति नहीं होती, वे रथयात्रा के दिन स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर भक्तों के बीच आते हैं. यही कारण है कि यह महापर्व सामाजिक समरसता, समानता और सेवा का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है. परंपरा के अनुसार रथयात्रा के दौरान जाति, धर्म, वर्ग या सामाजिक स्थिति का कोई भेदभाव नहीं रहता और प्रत्येक श्रद्धालु भगवान के रथ की रस्सी खींचकर दर्शन का पुण्य प्राप्त कर सकता है.
हर वर्ष नए बनते हैं भगवान के भव्य रथ
रथयात्रा का एक अनोखा पक्ष यह है कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के तीनों रथ हर वर्ष नए बनाए जाते हैं. रथ निर्माण का कार्य अक्षय तृतीया से शुरू होता है और महाराणा विश्वकर्मा समुदाय के कारीगर पीढ़ियों से पारंपरिक विधि से इसे पूरा करते आ रहे हैं. विशेष प्रकार की लकड़ियों, रंग-बिरंगे वस्त्रों और पारंपरिक शिल्पकला से सजे ये रथ भारतीय संस्कृति की उत्कृष्ट कारीगरी का अद्भुत उदाहरण हैं.
तीनों रथों की अपनी अलग पहचान
रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ लगभग 45 फीट ऊंचा और 16 पहियों वाला होता है. भगवान बलभद्र का तालध्वज रथ करीब 44 फीट ऊंचा तथा 14 पहियों से सुसज्जित रहता है. वहीं देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ लगभग 43 फीट ऊंचा और 12 पहियों वाला होता है. प्रत्येक रथ का अपना ध्वज, सारथी और द्वारपाल निर्धारित होता है, जबकि लाखों श्रद्धालु नारियल की मजबूत रस्सियों से इन रथों को खींचते हैं.
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रथयात्रा से पहले निभाई जाती हैं कई पवित्र परंपराएं
यह महापर्व केवल एक दिन की यात्रा नहीं बल्कि कई धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम है. ज्येष्ठ पूर्णिमा पर भगवान का 108 कलशों से स्नान कराया जाता है, जिसे स्नान यात्रा कहा जाता है. इसके बाद भगवान 15 दिनों तक अनासर अवधि में विश्राम करते हैं और मंदिर के पट बंद रहते हैं. आषाढ़ अमावस्या पर नवयौवन दर्शन के बाद आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भव्य रथयात्रा आरंभ होती है. इस अवसर पर पुरी के गजपति महाराजा स्वर्ण झाड़ू से छेरा पहरा की परंपरा निभाते हैं, जो यह संदेश देती है कि भगवान के सामने राजा भी केवल एक सेवक है.
विश्व की सबसे बड़ी मंदिर रसोई का अद्भुत रहस्य
रथयात्रा के सात दिन बाद बहुड़ा यात्रा के साथ भगवान पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं. इसके बाद रथों की लकड़ी का उपयोग मंदिर की विशाल रसोई में किया जाता है. श्रीजगन्नाथ मंदिर की रसोई विश्व की सबसे बड़ी मंदिर रसोई मानी जाती है, जहां प्रतिदिन 56 प्रकार के भोग तैयार किए जाते हैं. मिट्टी की हांडियों में बनने वाले महाप्रसाद की सबसे अनोखी मान्यता यह है कि सबसे ऊपर रखी हांडी का भोजन सबसे पहले पक जाता है, जिसे श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ का दिव्य चमत्कार मानते हैं.
पुरी की रथयात्रा क्यों है विश्व में अद्वितीय?
आज भारत ही नहीं, दुनिया के अनेक देशों में भी जगन्नाथ रथयात्रा का आयोजन होता है. फिर भी पुरी की रथयात्रा अपनी आध्यात्मिक गरिमा, प्राचीन परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समरसता के संदेश के कारण सबसे विशेष मानी जाती है. यह महापर्व केवल धार्मिक आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि मानवता, सेवा, समानता और सनातन संस्कृति की अमूल्य विरासत का जीवंत प्रतीक भी है.
