Hindu Tradition: भारत अपनी विविध परंपराओं और रीति-रिवाजों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है. इन्हीं परंपराओं में से एक है महिलाओं द्वारा पैरों में आलता यानी महावर लगाना. अक्सर हम शादियों, पूजा-पाठ या शास्त्रीय नृत्य के दौरान महिलाओं के पैरों पर लाल रंग की रेखाएं देखते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह केवल सौंदर्य बढ़ाने का साधन नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण छिपे हैं?
धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आलता को देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है. लाल रंग ऊर्जा, शक्ति और समृद्धि का प्रतीक है. माना जाता है कि जिस घर की महिलाएं अपने पैरों को आलता से सजाती हैं, वहां मां लक्ष्मी का वास होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है.
हिंदू धर्म में आलता को महिलाओं के ‘सोलह श्रृंगार’ में शामिल किया गया है. मान्यता है कि यह सुहाग की लंबी उम्र और वैवाहिक सुख का आशीर्वाद देता है. विशेष रूप से छठ, करवा चौथ, दिवाली और बंगाल की दुर्गा पूजा जैसे त्योहारों में आलता के बिना श्रृंगार अधूरा माना जाता है.
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्वास्थ्य लाभ
पुराने समय में आलता प्राकृतिक तत्वों जैसे कुमकुम, पान के पत्तों और औषधीय अर्क से तैयार किया जाता था, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद होता था.
- शीतलता: यह शरीर के तापमान को नियंत्रित कर पैरों को ठंडक पहुंचाता है.
- त्वचा की सुरक्षा: इसके एंटी-बैक्टीरियल गुण एड़ियों को फटने से बचाते हैं और पैरों को संक्रमण से सुरक्षित रखते हैं.
सांस्कृतिक विरासत
आलता को उत्तर भारत में ‘महावर’ और दक्षिण भारत में ‘परानी’ के नाम से जाना जाता है. भारत के पूर्वी राज्यों जैसे बिहार, बंगाल और ओडिशा में इसका सबसे अधिक उपयोग किया जाता है. इसके अलावा, भगवान कृष्ण द्वारा राधा के पैरों में आलता लगाने की पौराणिक कथाएं भी इस परंपरा की प्राचीनता को दर्शाती हैं.
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