Hindu Ritual: सनातन धर्म में मृत्यु को जीवन का अंत नहीं, बल्कि आत्मा के एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश का माध्यम माना गया है. हिंदू धर्मग्रंथों, विशेषकर गरुड़ पुराण में अंतिम संस्कार से जुड़े कई नियम और परंपराओं का उल्लेख मिलता है. अक्सर देखा जाता है कि जब किसी सुहागिन महिला का निधन होता है, तो उसके अंतिम संस्कार से पहले उसे दुल्हन की तरह सजाया जाता है. उसे लाल या पीली साड़ी पहनाई जाती है, हाथों में चूड़ियां, पैरों में आलता लगाया जाता है और माथे पर सिंदूर लगाकर उसका सोलह श्रृंगार किया जाता है. आखिर शोक की इस घड़ी में मृत महिला को इस प्रकार सजाने के पीछे क्या धार्मिक कारण हैं? आइए जानते हैं.
‘सधवा मृत्यु’ और अखंड सौभाग्य का सम्मान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि किसी महिला की मृत्यु उसके पति के जीवित रहते होती है, तो उसे ‘सधवा मृत्यु’ कहा जाता है. हिंदू धर्म में ऐसी मृत्यु को सौभाग्यशाली माना गया है. मान्यता है कि स्त्री का लाल जोड़ा, सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां और मंगलसूत्र इस बात का प्रतीक होते हैं कि उसने अपना जीवन सुहागिन के रूप में बिताया और अपने वैवाहिक संबंधों का निर्वाह किया. गरुड़ पुराण से जुड़ी लोकमान्यताओं के अनुसार, ऐसी महिला की अंतिम विदाई केवल शोक का अवसर नहीं होती, बल्कि उसके अखंड सौभाग्य और वैवाहिक पहचान के प्रति सम्मान प्रकट करने का भी प्रतीक मानी जाती है.
अगले जन्म में भी सुहागिन रहने की कामना
इससे जुड़ी एक मान्यता यह भी है कि व्यक्ति जिस मानसिक अवस्था और स्वरूप में इस संसार से विदा लेता है, उसका प्रभाव उसकी अगली यात्रा पर पड़ सकता है. इसी कारण सुहागिन महिला का अंतिम संस्कार से पूर्व सोलह श्रृंगार किया जाता है. माना जाता है कि इससे उसकी आत्मा को शांति मिलती है और उसे अगले जन्म में भी सुखी वैवाहिक जीवन तथा सुहाग का सौभाग्य प्राप्त हो.
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