Festivals Without Roti: भारतीय सनातन परंपरा में हर त्योहार का अपना अलग महत्व होता है. पूजा-पाठ से लेकर खान-पान तक कई नियम और मान्यताएं प्रचलित हैं. इन्हीं में एक मान्यता कुछ विशेष दिनों पर रोटी न बनाने से जुड़ी है. माना जाता है कि इन अवसरों पर सामान्य भोजन के बजाय विशेष पकवान बनाकर देवी-देवताओं को भोग लगाया जाता है. ज्योतिषाचार्य डॉ एन के बेरा से आइए जानते हैं किन त्योहारों और खास मौकों पर कई परिवारों में रोटी बनाने से परहेज किया जाता है.
दीपावली पर क्यों नहीं बनाते रोटी?
दीपावली का पर्व माता लक्ष्मी की पूजा और घर में सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुछ परिवारों में इस दिन रोटी बनाने के बजाय पूड़ी, खीर, मिठाई और अन्य पकवान तैयार किए जाते हैं. इन्हीं व्यंजनों से माता लक्ष्मी को भोग लगाया जाता है.
शरद पूर्णिमा पर खीर का खास महत्व
शरद पूर्णिमा को चंद्रमा और मां लक्ष्मी की पूजा से भी जोड़कर देखा जाता है. इस दिन विशेष रूप से खीर बनाने और उसे चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा कई जगह प्रचलित है. कुछ परिवार इस कारण रोटी बनाने से परहेज करते हैं और विशेष प्रसाद को प्राथमिकता देते हैं.
नाग पंचमी पर नहीं चढ़ता तवा
नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा की जाती है. कई क्षेत्रों में इस दिन तवा चूल्हे पर नहीं चढ़ाया जाता और रोटी नहीं बनाई जाती. हालांकि, यह परंपरा पूरे देश में समान नहीं है और अलग-अलग क्षेत्रों में इसके नियम अलग हो सकते हैं.
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शीतला अष्टमी पर बनता है बासी भोजन
शीतला अष्टमी यानी बसौड़ा पर माता शीतला को बासी भोजन का भोग लगाने की परंपरा है. मान्यता के अनुसार इस दिन चूल्हा जलाने से बचा जाता है. इसलिए कई घरों में एक दिन पहले भोजन बनाकर रखा जाता है और शीतला माता को उसका भोग लगाया जाता है.
दाह संस्कार वाले दिन क्यों नहीं बनती रोटी?
किसी परिवार में दाह संस्कार होने के दिन भी कई परंपराओं में तवा नहीं चढ़ाया जाता और भोजन बनाने से परहेज किया जाता है. यह समय शोक और धार्मिक कर्मकांडों के लिए निर्धारित माना जाता है.
हर जगह एक जैसी नहीं होती परंपरा
रोटी न बनाने की ये मान्यताएं मुख्य रूप से धार्मिक परंपराओं और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों पर आधारित हैं. हर परिवार और क्षेत्र में इनके नियम अलग हो सकते हैं. इसलिए इन्हें अनिवार्य धार्मिक नियम के बजाय परंपरा और आस्था के रूप में समझना चाहिए.
