Dhumavati Jayanti: आज 22 जून सोमवार को मां धूमावती की जयंती मनाई जा रही है. सनातन परंपरा में जहां अन्य देवियों के सौम्य और सुहागन रूप की पूजा होती है, वहीं मां धूमावती का स्वरूप सबसे अलग विधवा, श्वेत वस्त्रधारी और संकटों को हरने वाली उग्र शक्ति के रूप में पूजनीय है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मां का प्राकट्य हुआ था. आइए इस पावन अवसर पर जानते हैं मां के इस अनोखे स्वरूप की वह पौराणिक कथा, जब तीव्र भूख से व्याकुल होकर माता पार्वती ने स्वयं भगवान शिव को निगल लिया था.
पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार माता पार्वती को तीव्र भूख लगी. उस समय कैलाश पर्वत पर भोजन का कोई प्रबंध नहीं था. अपनी भूख शांत करने के लिए वे भगवान शिव के पास पहुंचीं और उनसे भोजन की मांग करने लगीं. किंतु उस समय महादेव गहरी समाधि में लीन थे. माता पार्वती ने उन्हें जगाने का बार-बार प्रयास किया, लेकिन शिव जी अपनी ध्यानमुद्रा से नहीं उठे. समय बीतने के साथ माता पार्वती की भूख इतनी असहनीय हो गई कि वे पूरी तरह व्याकुल हो उठीं. जब उन्हें खाने के लिए कुछ नहीं मिला, तो उन्होंने एक गहरी सांस ली और ध्यान में बैठे भगवान शिव को ही निगल लिया.
चूंकि भगवान शिव के कंठ में हलाहल विष था, इसलिए जैसे ही माता पार्वती ने उन्हें निगला, विष के प्रभाव से उनके शरीर से तीव्र धुआं (धूम) निकलने लगा. उनका रूप श्रृंगारविहीन, श्वेत और विकृत हो गया. इसके बाद भगवान शिव अपनी माया से माता पार्वती के शरीर से बाहर आए. उन्होंने पार्वती जी के इस धुएं से घिरे स्वरूप को देखा और कहा—“देवी! भूख के कारण आपका यह स्वरूप धुएं से व्याप्त हो गया है, इसलिए आज से संसार में आप ‘धूमावती’ के नाम से जानी जाएंगी. इस रूप में भी आपकी पूजा की जाएगी.”
मां धूमावती का स्वरूप कैसा है?
मां धूमावती का स्वरूप अन्य देवियों से बिल्कुल भिन्न और अलौकिक है:
- दो भुजाएं: मां की दो भुजाएं हैं, जिनमें एक हाथ में वे सूप धारण करती हैं और दूसरा हाथ वरदान (या ज्ञान प्रदान) मुद्रा में रहता है.
- बिना घोड़ों का रथ: मां धूमावती एक ऐसे रथ पर सवार हैं, जिसमें घोड़े नहीं जुड़े होते.
- कौआ प्रतीक: इस रथ के शीर्ष पर एक ध्वज होता है, जिस पर मां का प्रतीक कौआ विराजमान रहता है.
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