महामहोपाध्याय आचार्य डॉ सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय
पूर्व आईएएस, प्रयागराज
Chaitra Navratri 2026: भारत में समय की गणना यानी कालगणना की परंपरा बहुत प्राचीन है. हमारे वेदों और पुराणों में समय, वर्ष और ऋतुओं के बारे में विस्तार से बताया गया है. यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में नववर्ष की शुरुआत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से मानी जाती है. इसी दिन से चैत्र नवरात्रि का भी आरंभ होता है, जो शक्ति की आराधना का सबसे पवित्र समय माना जाता है.
भारतीय कालगणना की प्राचीन परंपरा
भारतीय ग्रंथों में “काल” शब्द का अर्थ समय से है. इसका सबसे पहला उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है. प्राचीन ऋषियों ने समय को समझने और मापने के लिए सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों का सहारा लिया. सूर्य सिद्धांत जैसे ग्रंथों में समय की गणना के वैज्ञानिक तरीके बताए गए हैं. समय की सबसे बड़ी इकाइयों में से एक संवत्सर है, जिसका सामान्य अर्थ वर्ष होता है. ऋग्वेद में भी संवत्सर शब्द का प्रयोग एक वर्ष के अर्थ में किया गया है. प्राचीन भारतीय मनीषियों ने बताया कि संवत्सर में अलग-अलग ऋतुएं होती हैं, जो प्रकृति के चक्र को पूरा करती हैं.
ऋतुएं और संवत्सर का संबंध
प्राचीन काल में पहले पांच ऋतुएं मानी जाती थीं, बाद में इनकी संख्या बढ़कर छह ऋतुएं हो गई.
ये छह ऋतुएं हैं:
- वसंत
- ग्रीष्म
- वर्षा
- शरद
- हेमंत
- शिशिर
सूर्य को इन ऋतुओं का नियामक माना गया है. मनुस्मृति में भी कहा गया है कि सूर्य ही मनुष्यों और देवताओं के दिन और रात का विभाजन करता है.
भारतीय कालगणना में सूर्य और चंद्रमा दोनों का महत्व है. एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक के समय को सावन दिन कहा जाता है.
विक्रम संवत की शुरुआत
भारत में आज भी जो पारंपरिक संवत्सर प्रचलित है, उसे विक्रम संवत कहा जाता है. इसकी शुरुआत उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त करने के बाद की थी. यह संवत ईसा से 57 वर्ष पहले शुरू हुआ था. इसलिए भारतीय पंचांग में विक्रम संवत का विशेष महत्व है.
क्यों खास है चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि का आरंभ माना जाता है. ब्रह्म पुराण में कहा गया है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना शुरू की थी. इसी कारण इस दिन को नव संवत्सर (भारतीय नववर्ष) का पहला दिन माना जाता है. इस तिथि को कल्पादि तिथि भी कहा जाता है, यानी सृष्टि की शुरुआत का दिन.
नवरात्रि से चैत्र मास का संबंध
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही चैत्र नवरात्रि शुरू होती है. इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है. शास्त्रों में कहा गया है कि इन दिनों में देवी शक्ति की उपासना करने से सुख, समृद्धि और शक्ति प्राप्त होती है. चैत्र शुक्ल पक्ष की कई तिथियां धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं:
- शुक्ल प्रतिपदा – नववर्ष और नवरात्रि की शुरुआत
- चैत्र शुक्ल तृतीया – मन्वादि तिथि
- चैत्र शुक्ल अष्टमी – दुर्गाष्टमी
- चैत्र शुक्ल नवमी – भगवान राम का जन्म (राम नवमी)
- चैत्र पूर्णिमा – हनुमान जयंती
भगवान राम के जन्म का उल्लेख
धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि चैत्र शुक्ल नवमी के दिन भगवान राम का जन्म हुआ था. अगस्त्य संहिता के अनुसार उस समय पुनर्वसु नक्षत्र था और कई ग्रह उच्च स्थिति में थे. इस शुभ समय में अयोध्या में माता कौशल्या के गर्भ से भगवान राम का अवतार हुआ.
चैत्र मास का आध्यात्मिक महत्व
चैत्र मास को धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत पवित्र माना गया है.
इस महीने में:
- नववर्ष की शुरुआत होती है
- नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है
- राम नवमी आती है
- हनुमान जयंती भी इसी मास में पड़ती है
यही कारण है कि कहा जाता है कि चैत्र शुक्ल पक्ष जितना महत्वपूर्ण है, उतना किसी अन्य मास का पक्ष नहीं.
