चैत्र नवरात्रि 2026 कथा: माता दुर्गा ने महिषासुर का कैसे किया संहार?

Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि भारत के सबसे पवित्र और प्रमुख त्योहारों में से एक है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पर्व की नींव मां दुर्गा द्वारा महिषासुर नामक राक्षस के संहार से रखी गई थी? अगर नहीं, तो आइए आसान भाषा में जानें माता दुर्गा और महिषासुर के युद्ध की वह कथा, जिसके कारण यह पर्व मनाया जाता है.

Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ 19 मार्च 2026 से हो रहा है. यह माता दुर्गा की उपासना का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है. नवरात्रि के नौ दिनों में माता दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूप, यानी नवदुर्गा, घरों और मंदिरों में विधिपूर्वक पूजे जाते हैं. मान्यता है कि जो भी भक्त इस व्रत को सच्चे मन से करता है, उसके जीवन में सुख-समृद्धि आती है और कष्ट-दुःख दूर होते हैं. नवरात्रि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. आइए जानते हैं माता दुर्गा और महिषासुर के युद्ध की वह कथा, जिसके कारण यह पर्व मनाया जाता है.

महिषासुर का जन्म

देवी भागवत पुराण, मार्कण्डेय पुराण और दुर्गा सप्तशती (चंडी पाठ) में वर्णित कथा के अनुसार, बहुत समय पहले रम्भ नामक एक शक्तिशाली असुर राजा था. उसने महिषी (भैंस स्वरूपी राक्षसी) से विवाह किया. इन दोनों के मिलन से उनका पुत्र जन्मा, जिसका नाम महिषासुर रखा गया. ‘महिष’ का अर्थ है भैंस, और ‘असुर’ का अर्थ है राक्षस. महिषासुर आधा इंसान और आधा भैंस था, और उसके पास अद्भुत शक्तियां थीं, जिससे वह कभी भी अपना रूप बदल सकता था.

ब्रह्मा जी का वरदान

महिषासुर अत्यंत महत्वाकांक्षी था. उसने भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की. उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा. महिषासुर ने अमर होने का वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्मा जी ने कहा कि जन्मे हुए प्राणी की मृत्यु निश्चित है. तब चतुर महिषासुर ने वरदान मांगा “मेरी मृत्यु न किसी देवता, न किसी असुर या मानव के हाथों होगी, केवल एक स्त्री ही मुझे मार सकती है.” ब्रह्मा जी ने ‘तथास्तु’ कह दिया.

स्वर्ग पर अधिकार

वरदान पाकर महिषासुर अहंकारी हो गया. उसने अपनी विशाल सेना के साथ स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया. इंद्र देव और अन्य देवता उससे हार गए, और महिषासुर ने स्वर्ग के सिंहासन पर कब्जा कर लिया.

माता दुर्गा का अवतरण

दुखी देवता मदद के लिए भगवान विष्णु और भगवान शिव के पास पहुँचे. देवताओं की बात सुनकर विष्णु और शिव अत्यंत क्रोधित हो गए. उनके क्रोध से एक दिव्य तेज (प्रकाश) निकला. यह तेज़ सभी देवताओं की शक्तियों के साथ मिलकर एक महाशक्तिशाली देवी के रूप में प्रकट हुआ, जिन्हें माँ दुर्गा कहा गया.

देवताओं ने माता को अपने अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए:

  • शिव जी ने त्रिशूल दिया.
  • विष्णु जी ने चक्र दिया.
  • इंद्र देव ने वज्र और वरुण देव ने शंख दिया.
  • अन्य देवताओं ने भी अपने सबसे शक्तिशाली अस्त्र माता को सौंपे.

भीषण युद्ध और महिषासुर का वध

माँ दुर्गा सिंह पर सवार होकर महिषासुर की नगरी पहुँची और जोर से गर्जना की. महिषासुर ने पहले उसे कमतर समझा, लेकिन माँ ने अपनी शक्ति से उसकी सेना को पल भर में ध्वस्त कर दिया. फिर शुरू हुआ माँ दुर्गा और महिषासुर के बीच महायुद्ध, जो नौ दिनों तक चला. महिषासुर बार-बार अपना रूप बदलता रहा था. कभी हाथी, कभी शेर, तो कभी भैंस. अंत में, दसवें दिन जब वह फिर से भैंस का रूप धारण करके हमला करने लगा, मां दुर्गा ने अपने त्रिशूल से उसके सीने पर प्रहार किया और उसका वध कर दिया.

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By Neha Kumari

प्रभात खबर डिजिटल के जरिए मैंने पत्रकारिता की दुनिया में अपना पहला कदम रखा है. यहां मैं धर्म और राशिफल बीट पर बतौर जूनियर कंटेंट राइटर के तौर पर काम कर रही हूं. इसके अलावा मुझे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े विषयों पर लिखने में रुचि है.

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