Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है. यह पर्व मां दुर्गा को समर्पित होता है. हर साल पूरे देश में इस पर्व को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है. नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है. कई भक्त पूरे नौ दिनों तक व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग केवल पहला और अंतिम व्रत रखकर मां दुर्गा की आराधना करते हैं.कहा जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से नौ दिनों तक माता की आराधना करता है, मां उसके सारे दुख-दर्द दूर कर देती हैं.
कब से शुरू होगी चैत्र नवरात्रि
ज्योतिषाचार्य आचार्य विनोद त्रिपाठी के अनुसार, साल 2026 में चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च 2026 तक रहेगी. इसी दिन से हिंदू नववर्ष और विक्रम संवत 2083 की भी शुरुआत होगी. इस वर्ष संवत्सर का नाम “रौद्र” होगा. साथ ही इस बार राजा गुरु देव और मंत्री मंगल देव रहेंगे, जिसे धार्मिक दृष्टि से शुभ माना जाता है.
इस बार पालकी होगी मां दुर्गा की सवारी
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब नवरात्रि गुरुवार से शुरू होती है तो मां दुर्गा की सवारी पालकी (डोली) मानी जाती है. शास्त्रों में मां दुर्गा का पालकी पर आगमन गंभीर संकेत माना जाता है. मान्यता है कि इसका प्रभाव देश-विदेश की परिस्थितियों और प्राकृतिक घटनाओं पर भी पड़ सकता है.
अष्टमी-नवमी के संधिकाल का महत्व
चैत्र नवरात्रि में अष्टमी और नवमी के संधिकाल का विशेष महत्व होता है. इस समय मां भगवती अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाती हैं.
शास्त्रों में कहा गया है- “कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति”. अर्थात पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं हो सकती.
किन राशियों पर पड़ेगा प्रभाव?
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस संयोग का शुभ प्रभाव मिथुन, तुला, धनु और कुंभ राशि के जातकों पर पड़ सकता है. इन राशियों के लोगों को मां भगवती की कृपा से पद, प्रतिष्ठा और सुख-समृद्धि मिलने की संभावना है.
घटस्थापना का शुभ मुहूर्त
तिथि: 19 मार्च 2026 (गुरुवार) प्रतिपदा तिथि
पहला शुभ मुहूर्त: सुबह 7:01 बजे से 10:44 बजे तक
दूसरा शुभ मुहूर्त: सुबह 11:56 बजे से दोपहर 3:47 बजे तक
नवरात्रि में घटस्थापना की पूजा विधि
- नवरात्रि के पहले दिन घर में घटस्थापना (कलश स्थापना) की जाती है.
- इसके लिए सबसे पहले एक चौड़े बर्तन में मिट्टी रखें और उसमें सप्त धान्य (सात प्रकार के अनाज) बोएं. इसके बाद अखंड दीपक जलाएं.
- फिर श्री गणेश-गौरी पीठ, वरुण कलश, सप्तघृत मातृका, षोडश मातृका, चौसठ योगिनी पीठ और सर्वतोभद्र मंडल की स्थापना की जाती है.
- इसके साथ ही सूर्य सहित नवग्रहों का आह्वान किया जाता है. इसके बाद विधि-विधान से मां दुर्गा का आवाहन कर पूजा की जाती है.
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