Bhom Pradosh Vrat: आज, 8 सितंबर 2026, मंगलवार को भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जा रहा है. शास्त्रों के अनुसार, जब त्रयोदशी तिथि मंगलवार के दिन पड़ती है, तो इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है. यह दिन भगवान शिव के साथ-साथ हनुमान जी और मंगल देव की कृपा प्राप्त करने के लिए विशेष फलदायी माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से व्रत और पूजा करने से जीवन के सभी दोषों का नाश होता है, सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है और मंगल दोष का अशुभ प्रभाव कम होता है.
भौम प्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त एवं तिथि
त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: आज, 8 सितंबर 2026, दोपहर 02:42 बजे से
त्रयोदशी तिथि समाप्त: 9 सितंबर 2026, दोपहर 12:30 बजे तक
प्रदोष काल पूजा मुहूर्त: शाम 06:35 बजे से रात 08:52 बजे तक (अवधि: लगभग 2 घंटे 17 मिनट)
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:54 बजे से दोपहर 12:44 बजे तक
भौम प्रदोष व्रत पूजन विधि
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, साफ वस्त्र पहनें और महादेव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें.
- पूजा स्थल को साफ करके भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग स्थापित करें.
- प्रदोष काल से पहले पुनः स्नान करें या हाथ-पैर धोकर साफ वस्त्र धारण करें.
- मंदिर या घर के पूजा स्थान पर शिवलिंग का गंगाजल, शुद्ध जल, कच्चे दूध और दही से अभिषेक करें.
- महादेव को बेलपत्र, धतूरा, अक्षत, सफेद चंदन, भांग, आंकड़ा और पुष्प अर्पित करें.
- भगवान शिव को फल और मिठाइयों का भोग लगाएं.
- इसके बाद भगवान शिव के सामने दीप और अगरबत्ती जलाएं.
- "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करें और भौम प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें या सुनें.
- चूंकि आज मंगलवार है, इसलिए हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ करें और हनुमान जी को गुड़-चने का भोग लगाएं. ऐसा करना बेहद शुभ माना जाता है.
- अंत में दीप या कपूर जलाकर भगवान शिव की आरती करें और अगले दिन शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करें.
भगवान शिव के मंत्र
ॐ नमः शिवाय।
ॐ नमो भगवते रुद्राय।
ॐ पशुपतये नमः।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
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भगवान शिव की आरती
॥ शिवजी की आरती ॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे। हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज, दस भुज अति सोहे। त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी। त्रिपुरारी कंसारी, कर माला धारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर, बाघम्बर अंगे। सनकादिक गरुड़ादिक, भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डलु, चक्र त्रिशूलधारी। सुखकारी दुखहारी, जगपालन कारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका। मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
लक्ष्मी व सावित्री, पार्वती संगा। पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा। भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला। शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी। नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
भगवान शिव चालीसा
॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
॥ श्री शिव चालीसा पाठ ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥
मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद माहि महिमा तुम गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥
कीन्ही दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहँ सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट ते मोहि आन उबारो॥
मात-पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र होन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहीं रहै कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म-जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥
॥ दोहा ॥
नित्त नेम उठि प्रातः ही, पाठ करो चालीसा। तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसिर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान। स्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥
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