Aja Ekadashi 2026: अजा एकादशी हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है. इस दिन भक्त भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं. धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से अजा एकादशी का व्रत करने से पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है. पद्म पुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को अजा एकादशी का महत्व बताते हुए सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की कथा सुनाई थी.
सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा हरिश्चंद्र बहुत ही ईमानदार और सत्यवादी थे. वे किसी भी परिस्थिति में झूठ नहीं बोलते थे. उनकी सत्यनिष्ठा की चर्चा दूर-दूर तक होती थी. एक समय राजा हरिश्चंद्र के जीवन में ऐसी कठिन परिस्थितियां आईं कि उन्हें अपना राजपाट छोड़ना पड़ा. हालात इतने खराब हो गए कि उन्हें अपनी पत्नी और बेटे के साथ खुद को भी बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा.
राजा हरिश्चंद्र को एक चांडाल ने खरीदा. वह श्मशान घाट पर काम करता था. राजा को भी वहीं काम करना पड़ा. उनका काम था कि जो लोग अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करने आते थे, उनसे कर लेना. राजा ने अपना राजपाट, धन और सम्मान सब खो दिया था, लेकिन उन्होंने फिर भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा. वह ईमानदारी से अपना काम करते रहे.
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महर्षि गौतम ने बताया उपाय
राजा हरिश्चंद्र अपने परिवार की हालत देखकर बहुत दुखी रहते थे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इन परेशानियों से कैसे बाहर निकलें. एक दिन वह इसी चिंता में बैठे थे. तभी वहां महर्षि गौतम आए. राजा ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी पूरी परेशानी बताई. उन्होंने महर्षि से दुखों से बाहर निकलने का उपाय पूछा.
महर्षि गौतम ने कहा, "राजन, आप चिंता न करें. सात दिन बाद भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी है. उस दिन भगवान विष्णु का व्रत रखें और पूरे मन से उनकी पूजा करें. इससे आपके कष्ट दूर होंगे."
राजा ने रखा अजा एकादशी का व्रत
महर्षि की बात मानकर राजा हरिश्चंद्र ने अजा एकादशी का व्रत रखा. उन्होंने पूरे दिन भगवान विष्णु की पूजा की और रात में जागकर भगवान का स्मरण किया. अगले दिन पूजा करने के बाद उन्होंने व्रत का पारण किया.
मान्यता है कि अजा एकादशी का व्रत पूरा होते ही भगवान विष्णु की कृपा से राजा हरिश्चंद्र के जीवन में बड़ा बदलाव आया. उनके बेटे को जीवनदान मिला और उनकी पत्नी को भी उनका पुराना स्वरूप वापस मिल गया.इसके बाद राजा हरिश्चंद्र को उनका खोया हुआ राजपाट और सम्मान भी वापस मिल गया. उनके जीवन के सभी दुख दूर हो गए. कथा के अंत में राजा हरिश्चंद्र अपने परिवार के साथ सुखपूर्वक रहने लगे और जीवन के अंत में परमधाम को प्राप्त हुए.
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