मधु कांकरिया और डॉ माधव हाड़ा ‘बिहारी पुरस्कार’ से सम्मानित, उदयपुर में मिला सम्मान

पुरस्कार स्वरूप दोनों साहित्यकारों को ढाई लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिह्न प्रदान किया गया. यह पुरस्कार मधु कांकरिया को उनके उपन्यास ’हम यहां थे’ एवं डॉ माधव हाड़ा को उनकी आलोचनात्मक कृति ’पचरंग चोला पहर सखी री ’ के लिए दिया गया है.

हिंदी के चर्चित साहित्यकार मधु कांकरिया एवं डॉ माधव हाड़ा को क्रमशः 2021 एवं 2022 का 31वां एवं 32वां बिहारी पुरस्कार दिया गया. यह कार्यक्रम उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के बप्पा रावल सभागार में आयोजित किया गया था.

ढाई लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिह्न प्रदान किया गया

पुरस्कार स्वरूप दोनों साहित्यकारों को ढाई लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिह्न प्रदान किया गया. यह पुरस्कार मधु कांकरिया को उनके उपन्यास ’हम यहां थे’ एवं डॉ माधव हाड़ा को उनकी आलोचनात्मक कृति ’पचरंग चोला पहर सखी री ’ के लिए दिया गया है. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो इंद्रवर्धन त्रिवेदी, कुलपति, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय ने साहित्यकारों को सम्मानित किया.

प्रतिष्ठित है बिहारी पुस्कार

इस अवसर पर केके बिरला फाउंडेशन के निदेशक डॉ सुरेश ऋतुपर्ण ने कहा कि केके बिरला ने शिक्षा, संस्कृति और शिक्षाविदों जैसे क्षेत्रों में काम करने के उद्देश्य से फाउंडेशन की स्थापना की थी. बिहारी पुरस्कार 1991 में फाउंडेशन द्वारा स्थापित तीन साहित्यिक पुरस्कारों में से एक है. महाकवि बिहारी के नाम पर हर वर्ष राजस्थान के हिंदी या राजस्थानी में लिखने वाले लेखकों को यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है. पुरस्कार का निर्णय एक निर्णायक समिति करती है जिसके अध्यक्ष वर्तमान में हेमंत शेष हैं.

‘पचरंग चोला पहर सखी री’ मीरा पर अनोखी रचना

कार्यक्रम में हेमंत शेष ने रचनाकारों मधु कांकरिया और माधव हाड़ा का परिचय दिया, साथ ही उनकी रचनाओं पर भी प्रकाश डाला. माधव हाड़ा की पुस्तक ‘पचरंग चोला पहर सखी री’ पर प्रकाश डालते उन्होंने कहा कि माधव हाड़ा की यह पुस्तक मीरा पर उपलब्ध आलोचनाओं से अलग है और इसकी आख्या अद्भुत है.

शब्द और संवेदना को बचाये रखना चुनौती

पुरस्कृत लेखिका मधु कांकरिया ने इस समारोह में कहा कि आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती शब्द और संवेदना को बचाये रखना है. उन्होंने अपने पुरस्कृत उपन्यास ‘हम यहां थे’ की रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए झारखंड के आदिवासी जीवन के संघर्षों को उद्घाटित किया. भूमंडलीकरण के दुष्प्रभावों का आदिवासी जीवन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, उसे भी अपने अनुभवों के माध्यम से साझा किया. स्थानीय उत्पादों और उद्योगों के नष्ट होने के कारण आदिवासी जीवन पर आ रहे पर उन्होंने अपनी चिंता जतायी.

छोटे कस्बे के संघर्ष

फाउंडेशन के वर्ष 2022 के बिहारी पुरस्कार से पुरस्कृत प्रो माधव हाड़ा ने अपनी रचना प्रक्रिया पर कहा कि छोटे कस्बे के अपने संघर्ष हैं. उन्होंने कहा कि मीरा से हम बचपन से ही परिचित हो जाते हैं. कभी किताबों के माध्यम से तो कभी मंदिरों आदि के द्वारा, यही इस पुस्तक का प्रस्थान बिंदु भी है. उन्होंने कहा कि मध्यकालीन संत-भक्तों पर अध्ययन करते समय हमें उस समय की स्थानिक संस्कृति को ध्यान में रखना चाहिए. कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति ने मानवीय संवेदनाओं के प्रसार में साहित्य की भूमिका पर प्रकाश डाला. उन्होंने दोनों पुस्तकों में निहित मानवीय मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान भी किया.

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लेखक के बारे में

Published by: Rajneesh anand

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राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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