बिहार में शराबबंदी के 10 साल पूरे होने के बीच NCAER की एक स्टडी ने राज्य में शराबबंदी खत्म करने की सिफारिश की है. रिपोर्ट में शराबबंदी से होने वाले भारी राजस्व नुकसान और महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर अंकुश लगाने में जितनी उम्मीद थी, उतनी सफलता नहीं मिलने का हवाला दिया गया है. इससे अलावा कई मीडिया रिपोर्टों में अवैध शराब के कारोबार और इसकी जगह दूसरे नशीले पदार्थों के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं.
ऐसे में सवाल ये है कि आखिर 2016 में लागू हुई शराबबंदी के बाद बिहार में क्या बदला? इसके क्या फायदे और नुकसान सामने आए? और अब इसे खत्म करने की मांग क्यों उठ रही है?
शराबबंदी खत्म करने की सिफारिश क्यों?
- बिहार में शराबबंदी की नीति एक बार फिर बहस के केंद्र में है. राज्य में अप्रैल 2016 में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई थी, इसके पीछे तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बड़ा तर्क महिलाओं की सुरक्षा, घरेलू हिंसा और शराब से जुड़े सामाजिक नुकसान को कम करना था.
- लेकिन करीब एक दशक बाद अब नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की एक स्टडी ने शराबबंदी को वापस लेने की सिफारिश की है. स्टडी का तर्क है कि शराबबंदी अपने मूल मकसद, महिलाओं के खिलाफ अपराध कम करने में अपेक्षित सफलता नहीं दे सकी.
- NCAER की स्टडी में कहा गया है कि शराबबंदी के कारण राज्य को भारी राजस्व नुकसान हो रहा है. उसके मुताबिक अगर शराब की बिक्री दोबारा नियंत्रित और टैक्स आधारित व्यवस्था के तहत शुरू होती है तो राज्य के राजस्व में करीब 14 से 15 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है.
- इसके साथ साथ दावा ये भी है कि शराब की कानूनी बिक्री बंद होने के बावजूद राज्य में शराब की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, इसके बजाय अवैध शराब, तस्करी और दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी हुई.
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खजाने पर कितना असर पड़ा?
- शराब राज्य सरकार के लिए एक्साइज ड्यूटी का एक महत्वपूर्ण स्रोत थी, शराबबंदी के बाद इस स्रोत से मिलने वाला राजस्व लगभग खत्म हो गया.
- बिहार सरकार के आधिकारिक बजट दस्तावेजों पर आधारित पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च (PRS India) की रिपोर्ट के मुताबिक 2015-16 में बिहार को राज्य उत्पाद शुल्क से करीब ₹3,142 करोड़ मिले थे, जो 2016-17 में घटकर करीब ₹30 करोड़ रह गए.
- यानी बहस सिर्फ शराब बेचने या रोकने की नहीं है. सवाल यह भी है कि सरकार जिस राजस्व को शराब की बिक्री पर टैक्स के जरिए हासिल कर सकती थी, वह पैसा अब कहां से आएगा और उसकी जगह कौन-से संसाधन इस्तेमाल होंगे.
- NCAER का सुझाव है कि अगर नियंत्रित बिक्री और एक्साइज ड्यूटी की व्यवस्था वापस आती है तो इससे मिलने वाले अतिरिक्त संसाधनों का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है.
तो क्या शराब का बाजार खत्म हो गया?
यहीं से इस कहानी का दूसरा और ज्यादा दिलचस्प पहलू सामने आता है.
- शराब की कानूनी बिक्री बंद हुई, लेकिन शराब की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई. नतीजा यह हुआ कि अवैध शराब का कारोबार जारी रहा. 2016 के बाद पुलिस ने बड़ी मात्रा में अवैध शराब जब्त की और 2024 तथा 2025 में भी लाखों लीटर शराब की जब्ती हुई.
- NCAER ने भी शराबबंदी के साथ bootlegging और illicit liquor trade के बढ़ने की बात कही है. वहीं मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कानूनी शराब की जगह अवैध शराब और दूसरे intoxicants का इस्तेमाल बढ़ा.
- इसका मतलब यह नहीं कि शराबबंदी ने कोई असर ही नहीं डाला. शराब की खुली और कानूनी उपलब्धता खत्म हुई. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या मांग को खत्म किए बिना सिर्फ सप्लाई को प्रतिबंधित करने से नशे की समस्या खत्म हो सकती है?
फिर शराब की जगह कौन-से नशे का चलन बढ़ा?
शराबबंदी की बहस का सबसे अहम नया पहलू सिर्फ अवैध शराब नहीं, बल्कि alternative intoxicants का बढ़ता इस्तेमाल है.
- अलग-अलग स्टडी के हवाले से कहा गया है कि शराब की जगह दूसरे नशीले पदार्थों का बाजार तेजी से उभरा. इसमें codeine-based cough syrups का इस्तेमाल भी शामिल है.
- अलग अलग मीडिया चैनलों द्वारा बिहार में खासकर युवाओं और ग्रामीण इलाकों में codeine cough syrup के बढ़ते इस्तेमाल को शराब के विकल्प के रूप में उपयोग किए जाने की खबरें रिपोर्ट की जाती रही.
यानी अब कहानी सिर्फ शराब की तस्करी तक सीमित नहीं है. एक तरफ अवैध शराब का नेटवर्क है, तो दूसरी तरफ दवाओं के गलत इस्तेमाल और नशीले पदार्थों की तस्करी का नया नेटवर्क सामने आ रहा है.
तो शराबबंदी सफल या असफल?
इसका जवाब एकतरफा नहीं है, शराबबंदी के समर्थकों का तर्क है कि शराब की खुली उपलब्धता बंद होने से परिवारों और समाज पर सकारात्मक असर पड़ा. वहीं आलोचकों का कहना है कि अगर शराब की मांग बनी हुई है और अवैध शराब तथा दूसरे नशे का बाजार बढ़ रहा है, तो मौजूदा नीति की समीक्षा जरूरी है.
बिहार में घरेलू हिंसा और कुछ स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार के संकेत भी मिले हैं. इसलिए शराबबंदी के प्रभाव का आकलन सिर्फ कितना राजस्व गया या कितनी शराब जब्त हुई से करना पर्याप्त नहीं होगा. इसके लिए इन प्वाइंट को समझना होगा.
- क्या शराबबंदी ने सामाजिक नुकसान कम किया?
- क्या इसने शराब की मांग को वास्तव में कम किया?
- अगर मांग बनी रही, तो क्या उसका फायदा अवैध शराब और दूसरे नशे के कारोबारियों को मिला?
आगे बिहार के सामने कौन-से विकल्प हैं?
NCAER की सिफारिश पूरी तरह शराब को खुला छोड़ने की बात नहीं करती. इसका सुझाव regulated sales और excise taxation की ओर लौटने का है.
- यानी संभावित मॉडल में सरकार शराब की बिक्री को नियंत्रित कर सकती है, उस पर टैक्स लगा सकती है और मिलने वाले राजस्व को सामाजिक क्षेत्रों में लगाने की कोशिश कर सकती है
- दूसरी तरफ यह भी चुनौती होगी कि अगर शराबबंदी हटती है तो शराब की उपलब्धता बढ़ने से स्वास्थ्य और सामाजिक नुकसान न हो.
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