Menstrual hygiene : पीरियड्स या माहवारी के दौरान साफ–सफाई की कमी से आज भी देश में लड़कियां संघर्ष कर रही हैं. पीरियड्स के दौरान होने वाले शारीरिक कष्ट को तो छोड़ दें, लड़कियों को स्कूलों, काॅलेजों यहां तक की वर्कप्लेस में भी सही सुविधा नहीं मिलती है, जिसकी वजह से उन्हें साफ–सफाई या कहें कि हाइजीन से समस्या से जूझना पड़ता है. कई बार उन्हें खतरनाक संक्रमण का भी शिकार होना पड़ता है, अगर संक्रमण का उचित इलाज ना हो, तो उन्हें बांझपन का शिकार भी होता है.
सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच जिसमें जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन शामिल थे, उन्होंने खासकर लड़कियों की माहवारी के दौरान साफ–सफाई पर विशेष टिप्पणी की है और कहा है कि लड़कियों को पीरियड्स के दौरान साफ–सफाई उपलब्ध कराना ना सिर्फ सोसाइटी की जिम्मेदारी है, बल्कि यह उन लड़कियों का संवैधानिक अधिकार भी है.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा है?
मेंस्ट्रुअल हाइजीन के मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पीरिड्यस के दौरान स्कूलों में चालू हालत में शौचालय का अभाव होना बहुत ही चिंताजनक है, क्योंकि इसकी वजह से लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं. सेनेटरी पैड की कमी की वजह से उन्हें लीकेज का भय सताता है, पैड बदलने और उसे डिस्पोज करने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने की वजह से मजाक का पात्र बनने का खौफ भी उन्हें स्कूल जाने से रोकता है. कोर्ट ने कहा है कि पीरियड्स की वजह से अगर कोई लड़की पढ़ाई छोड़ती है, तो यह उसकी गलती नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था की गलती है.
कोर्ट ने इस मामले को बहुत ही गंभीरता से लिया है और एक सतत परमादेश यानी Continuing Mandamus जारी किया है, जिसके तहत कोर्ट सिर्फ निर्णय ही नहीं सुनाता, बल्कि इस बात पर नजर भी रखता है कि उसके द्वारा दिए गए आदेशों का पालन हुआ है अथवा नहीं. अगर कोर्ट के आदेशों का पालन करने में कोताही बरती जाती है, तो कोर्ट अपना अगला आदेश भी जारी कर सकता है.
मेंस्ट्रुअल हाइजीन को कोर्ट ने क्यों बताया संवैधानिक अधिकार?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मेंस्ट्रुअल हाइजीन सिर्फ स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है. यह लड़कियों का संवैधानिक अधिकार भी है. कोर्ट ने कहा है कि समानता का अधिकार सबको प्राप्त है, लेकिन बाॅयोलाॅजिकल जरूरत के अनुसार अगर किसी को समानता के लिए विशेष सुविधा की जरूरत है, तो उसे वह उपलब्ध कराया जाना चाहिए, अन्यथा उसके साथ भेदभाव होगा. स्कूल में लड़कों के समान रहने के लिए लड़कियों को सेनेटरी पैड की जरूरत होती है, ताकि वे लीकेज की वजह से परेशान ना हो. उन्हें पक्के शौचालय की भी जरूरत होगी, ताकि वो अपना पैड बदल सकें और उसे डिस्पोज कर सकें. अगर यह सुविधाएं नहीं होंगी, तो वो लड़कों के बराबर में खड़ी नहीं हो पाएंगी.
यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है, इसलिए कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया है कि वे स्कूलों में मुफ्त सेनेटरी पैड और पक्के शौचालयों की व्यवस्था करवाए. कोर्ट ने पीरियड्स के स्वास्थ्य को संविधान के आर्टिकल 21 में दिए गए जीवन और निजी आजादी के अधिकार के अंदर रखा है. कोर्ट ने कहा कि जीवन के अधिकार में सम्मानपूर्वक जीवन भी शामिल है.
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पीरियड्स की वजह से देश में ड्राॅपआउट
NGO Dasra के अनुमान के अनुसार देश में लगभग दो करोड़ लड़कियां हर साल स्कूल जाना छोड़ देती हैं. इसकी वजह है शौचालयों और सेनेटरी पैड का अभाव. उनके पास ना तो सेनेटरी पैड होता है और ना ही उसे बदलने और डिस्पोज करने के लिए उचित व्यवस्था. इस वजह से वे शर्म और मजाक बनने की स्थिति से बचने के लिए स्कूल नहीं जाती हैं. कई आंकड़े यह भी बताते हैं कि कई लड़कियां पीरियड्स के उन 4–5 दिनों में स्कूल जाती ही नहीं हैं, जिसकी वजह से उनकी पढ़ाई का नुकसान होता है और कहीं ना कहीं यह ड्राॅपआउट की वजह भी बनता है. इतना ही नहीं
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