Menstrual Hygiene :  सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा– मेंस्ट्रुअल हाइजीन लड़कियों का संवैधानिक अधिकार?

Menstrual hygiene : मेंस्ट्रुअल हाइजीन की कमी की वजह से अगर लड़कियां स्कूल नहीं जाती हैं, तो यह उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है. यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को की है और कहा है कि यह राज्य सरकारों का दायित्व है कि वह लड़कियों को सम्मान पूर्वक जीने का अधिकार दे और इसके लिए उन्हें स्कूलों में मुफ्त सेनेटरी पैड उपलब्ध कराया जाए. लड़कियों के लिए लड़कों से अलग टाॅयलेट की व्यवस्था की जाए. कोर्ट ने कहा है कि पीरियड्‌स के दौरान प्राकृतिक रूप से लड़कियों को अलग स्थिति का सामना करना पड़ता है, उस परिस्थिति में अगर उसके साथ समानता के लिए लड़कों के समान ही व्यवहार होगा, तो यह उनके अधिकारों का उल्लंघन होगा.

Menstrual hygiene : पीरियड्‌स या माहवारी के दौरान साफ–सफाई की कमी से आज भी देश में लड़कियां संघर्ष कर रही हैं. पीरियड्‌स के दौरान होने वाले शारीरिक कष्ट को तो छोड़ दें, लड़कियों को स्कूलों, काॅलेजों यहां तक की वर्कप्लेस में भी सही सुविधा नहीं मिलती है, जिसकी वजह से उन्हें साफ–सफाई या कहें कि हाइजीन से समस्या से जूझना पड़ता है. कई बार उन्हें खतरनाक संक्रमण का भी शिकार होना पड़ता है, अगर संक्रमण का उचित इलाज ना हो, तो उन्हें बांझपन का शिकार भी होता है.

सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच जिसमें जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन शामिल थे, उन्होंने खासकर लड़कियों की माहवारी के दौरान साफ–सफाई पर विशेष टिप्पणी की है और कहा है कि लड़कियों को पीरियड्‌स के दौरान साफ–सफाई उपलब्ध कराना ना सिर्फ सोसाइटी की जिम्मेदारी है, बल्कि यह उन लड़कियों का संवैधानिक अधिकार भी है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा है?

मेंस्ट्रुअल हाइजीन

मेंस्ट्रुअल हाइजीन के मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पीरिड्‌यस के दौरान स्कूलों में चालू हालत में शौचालय का अभाव होना बहुत ही चिंताजनक है, क्योंकि इसकी वजह से लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं. सेनेटरी पैड की कमी की वजह से उन्हें लीकेज का भय सताता है, पैड बदलने और उसे डिस्पोज करने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने की वजह से मजाक का पात्र बनने का खौफ भी उन्हें स्कूल जाने से रोकता है. कोर्ट ने कहा है कि पीरियड्‌स की वजह से अगर कोई लड़की पढ़ाई छोड़ती है, तो यह उसकी गलती नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था की गलती है.

कोर्ट ने इस मामले को बहुत ही गंभीरता से लिया है और एक सतत परमादेश यानी Continuing Mandamus जारी किया है, जिसके तहत कोर्ट सिर्फ निर्णय ही नहीं सुनाता, बल्कि इस बात पर नजर भी रखता है कि उसके द्वारा दिए गए आदेशों का पालन हुआ है अथवा नहीं. अगर कोर्ट के आदेशों का पालन करने में कोताही बरती जाती है, तो कोर्ट अपना अगला आदेश भी जारी कर सकता है.

मेंस्ट्रुअल हाइजीन को कोर्ट ने क्यों बताया संवैधानिक अधिकार?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मेंस्ट्रुअल हाइजीन सिर्फ स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है. यह लड़कियों का संवैधानिक अधिकार भी है. कोर्ट ने कहा है कि समानता का अधिकार सबको प्राप्त है, लेकिन बाॅयोलाॅजिकल जरूरत के अनुसार अगर किसी को समानता के लिए विशेष सुविधा की जरूरत है, तो उसे वह उपलब्ध कराया जाना चाहिए, अन्यथा उसके साथ भेदभाव होगा. स्कूल में लड़कों के समान रहने के लिए लड़कियों को सेनेटरी पैड की जरूरत होती है, ताकि वे लीकेज की वजह से परेशान ना हो. उन्हें पक्के शौचालय की भी जरूरत होगी, ताकि वो अपना पैड बदल सकें और उसे डिस्पोज कर सकें. अगर यह सुविधाएं नहीं होंगी, तो वो लड़कों के बराबर में खड़ी नहीं हो पाएंगी.

यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है, इसलिए कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया है कि वे स्कूलों में मुफ्त सेनेटरी पैड और पक्के शौचालयों की व्यवस्था करवाए. कोर्ट ने पीरियड्स के स्वास्थ्य को संविधान के आर्टिकल 21 में दिए गए जीवन और निजी आजादी के अधिकार के अंदर रखा है. कोर्ट ने कहा कि जीवन के अधिकार में सम्मानपूर्वक जीवन भी शामिल है.

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पीरियड्‌स की वजह से देश में ड्राॅपआउट

पीरियड्‌स बन रहा ड्राॅपआउट की वजह

NGO Dasra के अनुमान के अनुसार देश में लगभग दो करोड़ लड़कियां हर साल स्कूल जाना छोड़ देती हैं. इसकी वजह है शौचालयों और सेनेटरी पैड का अभाव. उनके पास ना तो सेनेटरी पैड होता है और ना ही उसे बदलने और डिस्पोज करने के लिए उचित व्यवस्था. इस वजह से वे शर्म और मजाक बनने की स्थिति से बचने के लिए स्कूल नहीं जाती हैं. कई आंकड़े यह भी बताते हैं कि कई लड़कियां पीरियड्‌स के उन 4–5 दिनों में स्कूल जाती ही नहीं हैं, जिसकी वजह से उनकी पढ़ाई का नुकसान होता है और कहीं ना कहीं यह ड्राॅपआउट की वजह भी बनता है. इतना ही नहीं

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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