क्या था बाटला हाउस एनकाउंटर, जिसपर बहे थे सोनिया गांधी के आंसू, अमित शाह ने संसद को दिलाई याद

Sonia Gandhi : बाटला हाउस एनकाउंटर, एक ऐसी घटना है जिसपर खूब राजनीति हुई है. इस एनकाउंटर की आग इतनी तेज थी कि उसकी तपिश आज भी गाहे-बगाहे महसूस की जाती है. बाटला हाउस एनकाउंटर को फर्जी बताकर इसपर वोट की खूब राजनीति हुई थी, वहीं जब यह खबर आई कि इस एनकाउंटर की तस्वीर देख कर सोनिया गांधी रो पड़ी, तो मामला और गरमाया था. ऑपरेशन सिंदूर पर संसद में बहस के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने बाटला हाउस एनकाउंटर के मुद्दे को फिर से उठाया.

Sonia Gandhi : ऑपरेशन सिंदूर पर संसद में बहस के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर हमला किया और कहा कि कांग्रेस वाले वर्षों से आतंकियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं. उन्होंने बाटला हाउस एनकाउंटर की चर्चा करते हुए कहा कि मैंने टीवी पर सुना था कि कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद यह कह रहे थे कि मैंने जब बाटला हाउस एनकाउंटर की तस्वीर सोनिया गांधी को दिखाई, तो वे रो पड़ीं थीं. अमित शाह ने कहा कि मैं इनसे पूछना चाहता हूं कि आपको आतंकियों के लिए क्यों रोना आता है शहीद मोहन शर्मा के लिए क्यों नहीं रोना आता है. अमित शाह की इस टिप्पणी पर कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी ने जवाब दिया और कहा कि मेरी मां के आंसुओं की बात हुई है, मैं यह बताना चाहती हूं कि मेरी मां के आंसू तब गिरे थे जब मेरे पिता आतंकवादी घटना में मारे गए थे. प्रियंका गांधी ने सोनिया गांधी के आंसुओं पर तो बात की, लेकिन उन्होंने इस बात से इनकार नहीं किया कि उनकी मां बाटला हाउस एनकाउंटर पर रोईं थीं.

क्या था बाटला हाउस एनकाउंटर

बाटला हाउस एनकाउंटर 19 सितंबर 2008 को हुआ था. इस घटना में दिल्ली पुलिस और कुछ संदिग्ध आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ हुई थी. इस मुठभेड़ में दो आतंकी मारे गए थे और एक पुलिस अधिकारी शहीद हुआ था. यह घटना दिल्ली के जामिया नगर स्थित बाटला हाउस में हुई थी. यह घटना सुबह के वक्त हुई थी, जिसकी वजह यह थी कि 13 सितंबर को दिल्ली में कई बम धमाके हुए थे. इन धमाकों में 30 लोग मारे गए थे, पुलिस को यह सूचना मिली थी कि इन बम धमाकों से संबंधित इंडियन मुजाहिदीन के कुछ आतंकी बाटला हाउस में छिपे हुए हैं. पुलिस ने वहां दबिश थी जिसकी वजह से आतंकियों ने पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी. इस एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के अधिकारी मोहन शर्मा शहीद हो गए थे. इस मुठभेड़ में दो आतंकी आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद मारे गए थे, जबकि जीशान को गिरफ्तार किया गया था. इस एनकाउंटर में दो आतंकी सैफ मोहम्मद और आरिज खान भागने में सफल रहा था. इस मुठभेड़ के दौरान स्थानीय लोगों की गिरफ्तारी हुई थी, जिसका विरोध राजनीतिक दलों और जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों ने किया था.

बाटला हाउस एनकाउंटर को बताया गया फर्जी

बाटला एनकाउंटर पर देश में राजनीति शुरू हो गई थी और इस एनकाउंटर को फर्जी बताया गया था. राम विलास पासवान, दिग्विजय सिंह और लालू यादव जैसे बड़े नेताओं ने इस एनकाउंटर को फर्जी बताया और इसकी जांच की मांग शुरू की थी. इसे फर्जी बताए जाने के पीछे वजह थी कि 13 सितंबर को दिल्ली में बम धमाके हुए और 19 को ही आतंकियों की पहचान करके बता दी गई और एनकाउंटर हुआ. साथ ही यह भी कहा जाता है कि जो आतंकी मारे गए उनके पीठ पर गोली लगी थी, जबकि एकाउंटर हुआ था तो आमने-सामने से गोली मारी गई होगी. इंस्पेक्टर मोहन शर्मा के बारे में भी यह कहा जाता है कि वे बिना बुलेटप्रूफ जैकेट के वहां क्यों गए थे, जबकि उन्हें पता था कि उनका सामना आतंकियों से होने वाला था. इंस्पेक्टर मोहन शर्मा को एनकाउंटर स्पेशलिस्ट भी कहा जाता है और उनके नेतृत्व में ही सात सदस्यीय स्पेशल टीम बाटला हाउस गई थी.

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सोनिया गांधी की क्या थी प्रतिक्रिया

बाटला हाउस एनकाउंटर के वक्त केंद्र और दिल्ली में कांग्रेस की सरकार थी. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थी और सोनिया गांधी यूपीए की चेयरपर्सन थीं. बाटला हाउस एनकाउंटर पर उनके रोने की खबरें सामने आईं थीं, लेकिन उन्होंने खुद सामने आकर कभी भी इस बारे में बात नहीं की है. कुछ कांग्रेसी नेताओं ने इस बारे में जरूर कहा, लेकिन सोनिया गांधी ने ना तो इस बात को स्वीकार किया और ना ही इससे इनकार किया है.

बीजेपी का कैसा था रुख

बीजेपी खुद को राष्ट्रवादी पार्टी बताती है, इसलिए जब बाटला हाउस एनकाउंटर की खबर आई, तो उसने इसे सही बताया था और इसके समर्थन में आ गई थी. बीजेपी ने इस एनकाउंटर को दिल्ली पुलिस की साहसिक कार्रवाई बताया था. बीजेपी ने कांग्रेस की इस बात को लेकर आलोचना की थी कि वो मुस्लिम तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति के लिए बाटला हाउस एनकाउंटर और पुलिस के बलिदान को सवालों के घेरे में ला रही है.

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By Rajneesh anand

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राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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