रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी क्या है, जो बना 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी को खत्म करने का जरिया?

Reproductive Autonomy : सुप्रीम कोर्ट ने एक 18 साल की लड़की को अपने 30 हफ्ते के गर्भ को समाप्त करने की इजाजत इसलिए दे दी है, क्योंकि वह गर्भ उसके साथी के साथ बनाए गए संबंध से ठहर गया था और उसे लेकर वह युवती बहुत मानसिक दबाव में थी. कोर्ट ने यह कहा है कि एक महिला अगर अपने बच्चे को जन्म नहीं देना चाहे, तो उसे इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह उसकी रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी है.

Reproductive Autonomy : सुप्रीम कोर्ट ने रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी का हवाला देते हुए यह कहा है कि किसी भी महिला को इस बात के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है कि वो अपनी मर्जी के बिना अपनी प्रेग्नेंसी को जारी रखे. इसी तर्क के साथ सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला को 30 सप्ताह की प्रेग्नेंसी को खत्म करने का आदेश दिया है. मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने कहा कि एक महिला की रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी, किसी भी अजन्मे बच्चे के अधिकार से ज्यादा महत्वपूर्ण है. 

किसे कहा जाता है रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी?

रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी एक महिला को स्वतंत्रता का अधिकार देता है. यह अधिकार महिला को संविधान के अनुच्छेद 21 से मिलता है. इस अनुच्छेद ने जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार दिया है. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में यह दोहराया है कि किसी भी व्यक्ति को अपने शरीर, यौन जीवन और प्रजनन से जुड़े फैसले लेने का अधिकार है. जिस रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी की चर्चा यहां हम कर रहे हैं, उसका अधिकार  MTP Act, 1971 (Medical Termination of Pregnancy Act) और उसके संशोधन जो कि 2021 में हुआ था, उसकी के तहत मिलता है.

चिकित्सीय गर्भपात अधिनियम( MTP Act, 1971 ) के तहत क्या है व्यवस्था?

चिकित्सीय गर्भपात अधिनियम एक महिला को इस बात की इजाजत देता है कि वह अपना गर्भपात कानूनी तरीके से करा ले. यहां गौर करने वाली बात यह है कि यह एक्ट 1971 में लाया गया था और 2021 के संशोधन के बाद इसमें बड़ा बदलाव किया गया है, जिसकी मदद से विशेष परिस्थितियों में एक महिला अपने 24 हफ्ते या उससे अधिक के गर्भस्थ भ्रूण का भी गर्भपात करा सकती है.

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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