क्या राघव चड्डा ने मर्जर नहीं दल-बदल किया है, संसद की सदस्यता रहेगी या जाएगी; क्या कहता है कानून?

Raghav Chadha : आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्डा ने दो तिहाई सांसदों के साथ आम आदमी पार्टी छोड़ दी है, ऐसे में उनकी सदस्यता पर तत्काल कोई प्रभाव होता नहीं दिख रहा है. आम आदमी पार्टी का कहना है कि यह मर्जर यानी विलय नहीं बल्कि सीधे तौर पर दल-बदल है और इन सांसदों की सदस्यता रद्द होनी चाहिए.

Raghav Chadha : आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता और पंजाब से राज्यसभा सांसद राघव चड्डा ने शुक्रवार को यह घोषणा कर दी कि वे आप के 7 सांसदों के साथ पार्टी छोड़ रहे हैं और वे बीजेपी में शामिल होंगे. आम आदमी पार्टी का गठन जिस तरह हुआ था, उस लिहाज से देखें तो यह फैसला चौंकाने वाला लगता जरूर है, लेकिन जिन लोगों ने आप को छोड़ा है, उनके साथ पिछले कुछ सालों में जो कुछ हुआ, उसे अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता है. सभी घटनाओं से जुड़े तार यह साबित करते हैं कि अभी जो हुआ, उसे लेकर हैरान होने की जरूरत नहीं है. ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि राघव चड्डा और उनके साथ 7 सांसदों ने जो कुछ किया, क्या वह देश के दल-बदल कानून के हिसाब से सही है? आइए समझते हैं.

क्या है दल-बदल (Anti-Defection Law) कानून?

एंटी डिफेक्शन कानून जिसे दल-बदल कानून भी कहा जाता है, इसका उद्देश्य गलत तरीके से दल-बदल को रोकना है. यह कानून संविधान की 10वीं अनुसूची में वर्णित है. जिसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए जोड़ा गया है. कानून के अनुसार अगर कोई सांसद अपनी पार्टी छोड़ देता है या दूसरी पार्टी जॉइन करता है, उसकी सदस्यता समाप्त कर दी जाती है. लेकिन इस कानून में अपवाद यानी एक्सेप्शन की भी बात कही गई है. इस अपवाद में यह कहा गया है कि अगर कुछ सांसद मर्जर करते हैं, तो उसपर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा. कानून कहता है कि अगर किसी पार्टी के 2/3 सदस्य एक साथ दूसरी पार्टी में जाते हैं, तो इसे मर्जर यानी विलय माना जाएगा और इसे दल-बदल नहीं माना जाएगा. इस स्थिति में किसी भी सांसद की सदस्यता समाप्त नहीं होगी.

क्या राघव चड्डा ने मर्जर किया है?

राघव चड्डा ने शुक्रवार को जब आम आदमी पार्टी छोड़ने की घोषणा की, तो उन्होंने 7 अन्य सांसदों की सूची भी उपलब्ध कराई, जो उनके साथ पार्टी छोड़ रहे थे. आप के कुल 10 सांसद राज्यसभा में हैं, उनमें से 7 ने पार्टी छोड़ दी, इसका मतलब यह है कि दो तिहाई से अधिक सांसदों ने पार्टी छोड़ी. इस लिहाज से यह कहा जा सकता है कि राघव चड्डा ने विलय यानी मर्जर किया है, इसलिए उनपर दल-बदल कानून लागू नहीं होता है.

मर्जर में जो पेच है, उसमें फंस सकते हैं राघव चड्डा?

सुप्रीम कोर्ट ने दल-बदल के कई मामलों में सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया है कि दल-बदल कानून यह कहता है कि विलय यानी मर्जर तब ही लागू होता है जब किसी पार्टी का विलय होता है. जैसे कि अगर आम आदमी पार्टी का विलय हो जाए, लेकिन राघव चड्डा के केस में आम आदमी पार्टी का विलय नहीं हो रहा है. पार्टी का अस्तित्व कायम है. यानी जिन दो तिहाई लोगों ने विलय किया है वे पार्टी नहीं सांसद हैं. ऐसे में इसे वैध मर्जर नहीं माना जाएगा और राघव चड्डा और उनके साथियों की सदस्यता समाप्त हो सकती है.

कौन करेगा फैसला?

राघव चड्डा के साथ दो तिहाई सांसदों ने पार्टी छोड़ी है, इस लिहाज से वे प्रथम दृष्टया तो बच गए हैं, लेकिन अगर विवाद बढ़ा तो अंतिम फैसला राज्यसभा के सभापति करेंगे. दल-बदल कानून यह कहता है कि राज्यसभा के सभापति या लोकसभा अध्यक्ष ही यह तय कर सकते हैं कि किसी सांसद पर दल-बदल कानून लागू होता है या नहीं. उनका फैसला ही अंतिम माना जाता है, तबतक, जबतक कि यह मामला कोर्ट में ना जाए. अगर मामला सुप्रीम कोर्ट के पास जाता है, तो वह न्यायिक समीक्षा कर सकता है और उसके बाद कोर्ट ही यह तय करता है कि किसी सांसद और उसके ग्रुप का पार्टी छोड़ना कितना संवैधानिक है.

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

राजनीति,सामाजिक, इतिहास, खेल और महिला संबंधी विषयों पर गहन लेखन किया है. तथ्यपरक रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक लेखन में रुचि. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक. IM4Change, झारखंड सरकार तथा सेव द चिल्ड्रन के फेलो के रूप में कार्य किया है. पत्रकारिता के प्रति जुनून है. प्रिंट एवं डिजिटल मीडिया में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव.

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