Kargil Vijay Diwas : वो चिट्ठी भेजे थे- मैं तुमसे मिलने आऊंगा, पर आई तिरंगे में लिपटी लाश; कारगिल शहीद बिरसा उरांव की पत्नी की आपबीती

Kargil Vijay Diwas : शहीद बिरसा उरांव 1998 के बाद घर नहीं आए थे, पूरे एक साल का समय बीत चुका था. पत्नी उन्हें एक बार देखने की बात बार-बार चिट्ठी में लिखती थीं. शहीद के पांच साल की बेटी और तीन साल के बेटे भी पापा से मिलना चाहते थे. लेकिन 1999 में…

Kargil Vijay Diwas : ये बात है 1999 की, जब भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध हुआ था. इस युद्ध में भारत के 527 वीर सैनिक शहीद हुए थे. युद्ध से दो महीने पहले झारखंड के गुमला जिले के सिसई प्रखंड के जतराटोली के रहने वाले बिहार रेजिमेंट के हवलदार बिरसा उरांव ने अपनी पत्नी मीला उरांव को पत्र लिखा था कि वे अगस्त या फिर सितंबर में घर आएंगे. यह चिट्ठी मीला उरांव को जून महीने में मिली थी. बिरसा उरांव 1998 के बाद घर नहीं आए थे, पूरे एक साल का समय बीत चुका था. पत्नी की आंखें भी पति की सूरत देखने के लिए तरस रही थी. वो ये चाहती थी कि पति जितनी जल्दी हो सके, उनसे मिलने घर आए. एक पांच-छह साल की बेटी और तीन साल के बेटे को भी अपने पिता का इंतजार था. 

कारगिल युद्ध में भाग लेने की जानकारी परिवार को नहीं थी

एक पत्नी और दो बच्चों का यह इंतजार मिलन की खुशी में बदलने की बजाय कभी ना खत्म होने वाले इंतजार में बदल गया, जब हवलदार बिरसा उरांव खुद नहीं आए और यह सूचना आई कि वे कारगिल युद��ध में शहीद हो गए हैं और उनकी बाॅडी घर लाई जा रही है. प्रभात खबर से बात करते हुए उनकी पत्नी मीला उरांव ने बताया कि उस समय वे गांव में रहती थीं, फोन की भी कोई सुविधा नहीं थी. किसी भी तरह की सूचना के लिए पत्र या फिर टेलीग्राम पर ही निर्भर रहना पड़ता था. जिस वक्त वे कारगिल युद्ध के लिए गए हमें कोई जानकारी नहीं थी. 

शहीद की पत्नी मीला उरांव

अचानक एक दिन खबर आई कि सिसई में उनका पार्थिव शरीर  लाया जा रहा है. जानकारी मिलने के बाद मैं सदमे में थी, समझ ही नहीं आया था कि क्या करूं, उन्होंने कहा था कि वो खुद आएंगे, लेकिन वो नहीं आए, आई तो तिरंगे में लिपटी उनकी लाश. आज जब इतने साल बीत गए और उनकी शहादत की बात होती है, तो गर्व महसूस होता है. उन्होंने अपना पूरा जीवन देश की सेवा में लगाया.

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बिहार रेजिमेंट में हवलदार थे कारगिल युद्ध के शहीद  बिरसा उरांव

शहीद बिरसा उरांव हवलदार के पद पर बिहार रेजिमेंट में सेवा दे रहे थे. पहले वे जवान थे फिर लांस नायक बने और फिर हलवदार. शहीद को छह पुरस्कार मिला है. जिसमें सामान्य सेवा मेडल नागालैंड, नाइन इयर लौंग सिर्वस मेडल भारत सरकार, सैनिक सुरक्षा मेडल, ओवरसीज मेडल संयुक्त राष्ट्र संघ, प्रथम बिहार रेजिमेंट की 50वीं वर्षगांठ पर स्वतंत्रता मेडल व विशिष्ट सेवा मेडल मरणोपरांत भारत सरकार द्वारा किया गया. 

शहीद बिरसा उरांव के मन में देशप्रेम इस कदर भरा था कि वे सिर्फ कारगिल युद्ध में ही नहीं लड़े बल्कि उन्होंने सेना के विभिन्न ऑपरेशन में अपनी वीरता दिखाई थी. ऑपरेशन ओचार्ड नागालैड, ऑपरेशन रक्षक पंजाब, यूएनओ सोमालिया टू दक्षिण अफ्रिका, ऑपरेशन राइनो असम जैसे ऑपरेशन में वे शामिल थे. उनके जीवन से प्रेरित होकर ही मेरी बेटी पूजा विभूति उरांव पुलिस सेवा में गई है और देश की सेवा कर रही है. शहीद के दो बच्चे हैं, एक बेटा और एक बेटी. बेटा भी पढ़ाई पूरी कर चुका है. (इनपुट दुर्जय पासवान)

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By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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