Kargil Vijay Diwas : दुश्मन पहाड़ी पर और भारतीय सैनिक पथरीले रास्ते में, उस रात बटालिक सेक्टर में क्या हुआ था?

Kargil Vijay Diwas : कारगिल युद्ध में पूरी लड़ाई रात के समय ही लड़ी जाती थी. दिन के वक्त पोस्ट से फायरिंग होती थी, लेकिन उसकी फ्रीक्वेंसी कम होती थी. रात को हमारी बटालिन ऊपर की ओर चढ़ाई करती थी. हम अपने इलाकों को उनसे मुक्त कराने के लिए ऊपर जा रहे थे. लेकिन उन्हें भी हमारे ऑपरेशन की जानकारी थी और वे भी बड़ी तैयारी से जमे बैठे थे. जब हम ऊपर की ओर जाते थे तो वे बहुत ज्यादा फायरिंग करते थे. हमारी ओर से भी फायरिंग बहुत हो रही थी. हमारी टीम के लीडर ओपी यादव थे.

Kargil Vijay Diwas : पाकिस्तानी सेना चोरों की तरह हमारे इलाके में घुसकर बैठी थी. हमारी बटालियन को जब वहां ऑपरेशन के लिए जाने का आदेश हुआ तो हम तैयारी के साथ चल पड़े. हमें बटालिक सेक्टर में मोर्चा संभालना था, बटालियन में 8-9 सौ लोग थे. इस इलाके की प्राकृतिक बनावट ऐसी है जो बहुत थकाने वाली है. पत्थरीले रास्ते और बर्फ की पहाड़ियां. परिस्थितियां बहुत विकट थीं, लेकिन हमारा हौसला बहुत बुलंद था. हमारे सामने लक्ष्य था अपनी जमीन से पाकिस्तानी घुसपैठिए को खदेड़ना. कारगिल युद्ध को याद करते हुए फर्स्ट बिहार रेजीमेंट के सूबेदार मंगल उरांव ने बताया कि हमारे सामने चुनौती यह थी कि दुश्मन पहाड़ की चोटी पर बैठा था और हमें उसे बाहर करने के लिए नीचे से ऊपर जाना था.

Kargil Vijay Diwas : कारगिल युद्ध में रात मे ही क्यों होती थी लड़ाई?

सूबेदार मंगल उरांव बताते हैं कि कारगिल युद्ध में पूरी लड़ाई रात के समय ही लड़ी जाती थी. दिन के वक्त पोस्ट से फायरिंग होती थी, लेकिन उसकी फ्रीक्वेंसी कम होती थी. रात को हमारी बटालिन ऊपर की ओर चढ़ाई करती थी. हम अपने इलाकों को उनसे मुक्त कराने के लिए ऊपर जा रहे थे. लेकिन उन्हें भी हमारे आॅपरेशन की जानकारी थी और वे भी बड़ी तैयारी से जमे बैठे थे. जब हम ऊपर की ओर जाते थे तो वे बहुत ज्यादा फायरिंग करते थे. हमारी ओर से भी फायरिंग बहुत हो रही थी. हमारी टीम के लीडर ओपी यादव थे. 

दबे पांव करते थे आक्रमण

पाकिस्तानी सेना के लोगों पर आक्रमण करने के लिए हमारे बटालिन के लोग चीते की चाल से चलते थे, जबतक उन्हें हमारी गतिविधि का पता चले, हम उन्हें दबोच लेते थे या फिर फायरिंग कर खत्म कर देते थे. हमारी आंखों के सामने गोलीबारी का दृश्य होता था और लक्ष्य एक ही था पाकिस्तानियों को उनकी किए की सजा देना और अपनी जमीन उनसे आजाद कराना. वे बंकर बनाकर बैठे थे, हम जैसे-जैसे उनसे जीतते जाते थे वे पीछे हटते जा रहे थे. 

Also Read : Kargil Vijay Diwas : पति की मौत एक महीना पहले ही हो चुकी थी, लेकिन पत्नी थी अनजान

कई बार हुई आमने-सामने की लड़ाई

युद्ध के दौरान कई बार ऐसा हुआ कि हम पाकिस्तानी सैनिकों के सामने थे. उस वक्त वे बौखलाकर फायरिंग करते थे. जवाब में हम भी फायरिंग करते थे, कितने मरे और कितने नहीं इसकी चिंता हम नहीं करते थे. जब वे फायरिंग करते थे, तब हम वहां की प्राकृतिक बनावट का फायदा उठाकर पहाड़ों के पीछे छिप जाते थे. हमारे साथ कई साथी शहीद भी हुए. उस वक्त हमारे अंदर बदले की भावना जागृत हो जाती थी और हम अपने एक के बदले उनके दस मारना चाहते थे. हमारा नारा जय बजरंग बली का था और आमने-सामने की लड़ाई में हमने इसका जयघोष किया भी.

पाकिस्तानी भागे और तिरंगा लहराया

ऑपरेशन विजय से पाकिस्तानी सैनिक यह समझ गए थे कि भारत उन्हें छोड़ने वाला नहीं है, हमारे कार्रवाइयों से उनकी हालत खराब हो गई थी, तब वे उन पोस्ट को छोड़कर भाग गए जहां वे जमकर बैठे थे. पाकिस्तानी सेना के कई सैनिक मारे भी गए. जब पाकिस्तान से हमने अपनी जमीन को मुक्त कराया और अपना तिरंगा वहां लहराया, तब जाकर हमें सुध आई, अन्यथा हम सिर्फ और सिर्फ युद्ध और गोलीबारी में ही व्यस्त थे.

दो-तीन दिन तक खाना नहीं मिलता था

युद्ध के दौरान स्थिति इस तरह की थी कि हम बहुत ऊपर थे और वहां तक खाना पहुंचाने में बहुत वक्त लगता था. इसकी वजह से हमें कई दिनों तक खाना नहीं मिलता था. खाने की तो बहुत चिंता भी नहीं रहती थी, लेकिन पानी की जरूरत होती थी, लेकिन वहां पानी भी उपलब्ध नहीं था. हम पहाड़ों के बर्फ को पिघलाकर ही पानी पीते थे और वही हमारे लिए जीवन रक्षक साबित हुआ था. 

Also Read : Kargil Vijay Diwas : वो चिट्ठी भेजे थे- मैं तुमसे मिलने आऊंगा, पर आई तिरंगे में लिपटी लाश; कारगिल शहीद बिरसा उरांव की पत्नी की आपबीती

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

और पढ़ें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >