Iran : जोहार. आज 14 जुलाई है.
राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थें, वही बात हो गई...
हां, 1994 की फिल्म विजयपथ का यह गाना 32 साल बाद फिर से हर जगह सुना और गाया जा रहा है. यहां जिस 'राह' (path) की बात हो रही है, वह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) है, और इस घटनाक्रम में मुख्य भूमिका निभाने वाले देश ईरान और अमेरिका हैं!
आखिरकार, जिस हालात से पूरी दुनिया पिछले कुछ महीनों से बचने की कोशिश कर रही थी, वह एक बार फिर सिर पर मंडरा रहा है. वैश्विक अर्थव्यवस्था अभी तेल और गैस संकट, महंगाई और सप्लाई चेन में रुकावटों से उबरना शुरू ही हुई थी कि होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर दुनिया भर के लिए तनाव का केंद्र बन गया. इस बार संकट सिर्फ मिसाइलों या ड्रोनों तक ही सीमित नहीं है, यह समुद्री व्यापार और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के भविष्य पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है.
शहंशाह-ए-अमेरिका की घोषणा…
शहंशाह-ए-अमेरिका ने बिना किसी के कहे, बिना मांगे... एक अनोखी मुराद पूरी कर दी है.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि...
अमेरिका अब होर्मुज जलडमरूमध्य में ‘गार्डियन ऑफ द स्ट्रेट’ की भूमिका निभाएगा. और वहां से गुजरने वाले सभी कारो जहाजों से 20 प्रतिशत सुरक्षा शुल्क (Security Levy) वसूलेगा.
अंकल सैम का तर्क है कि यदि अमेरिका इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है, तो उसकी लागत भी वैश्विक व्यापार को वहन करनी चाहिए.
लेकिन यही घोषणा पूरे संकट की नई शुरुआत बन सकती है...
20 प्रतिशत शुल्क या नई समुद्री दबदबा?
ट्रंप के अनुसार, ‘होर्मुज खुला है और ईरान के साथ या उसके बिना भी खुला रहेगा. अमेरिका इस जलडमरूमध्य का संरक्षक होगा और सुरक्षा के बदले गुजरने वाले जहाजों से 20 प्रतिशत शुल्क लिया जाएगा.’
यही बयान ईरान के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है.
तेहरान लंबे समय से होर्मुज को अपनी स्ट्रेटेजिक ताकत का सबसे जरूरी जरिया मानता रहा है. अगर अमेरिका वहां आर्थिक और मिलिट्री कंट्रोल बनाने की कोशिश करता है, तो ईरान इसे सिर्फ सुरक्षा इंतजाम का मामला नहीं, बल्कि अपनी सॉवरेन स्ट्रेटेजिक स्थिति यानि खुद की सरहदी पहचान पर सीधा हमला मानेगा.
इससे यह डर पैदा होता है कि क्या ईरान एक बार फिर होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर सकता है या शिपिंग पर हमले तेज कर सकता है?
Iran : जंग फिर उसी मोड़ पर पहुंचती दिख रही है
पिछले एक सप्ताह में अमेरिका ने ईरान के 300 से अधिक सैन्य और सामरिक ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं. केवल 12 जुलाई की रात ही अमेरिकी सेंटकॉम ने बंदर अब्बास, सीरिक, जास्क और अन्य सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया. ईरान के अनुसार, खुज़ेस्तान प्रांत तक पर हमले हुए, जो देश के तेल और गैस उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है.
खुज़ेस्तान केवल एक सीमावर्ती प्रांत नहीं है. यही ईरान की ऊर्जा अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. प्रमुख तेल क्षेत्र, गैस पाइपलाइनें, रिफाइनरियां और निर्यात अवसंरचना इसी क्षेत्र में स्थित हैं. इसलिए यहां किसी भी सैन्य कार्रवाई का असर सीधे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है.
ईरान का पलटवार और खाड़ी में बढ़ता तनाव
अमेरिकी हमलों के जवाब में ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई तेज कर दी.
आईआरजीसी (Islamic Revolutionary Guard Corps) ने बहरीन के शेख ईसा एयरबेस, कुवैत के अली अल-सलीम एयरबेस, अहमद अल-जाबेर एयरबेस और जॉर्डन के प्रिंस हसन एयरबेस पर मिसाइल और ड्रोन हमलों का दावा किया. ईरान ने कहा कि अमेरिकी ड्रोन कमांड सेंटर, पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम, ईंधन टैंक और HIMARS लॉन्चर को निशाना बनाया गया.
हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन बहरीन, कतर, यूएई और अन्य खाड़ी देशों में लगातार बजते सायरन इस क्षेत्र में बढ़ते खतरे की पुष्टि अवश्य करते हैं.
विवाद की जड़: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज
तनाव की शुरुआत केवल हवाई हमलों से नहीं हुई.
कुछ दिन पहले आईआरजीसी ने ओमान तट के निकट एक व्यावसायिक जहाज GFS Galaxy पर हमला किया. साइप्रस के झंडे वाले इस जहाज पर 23 चालक दल के सदस्य थे, जिनमें 11 भारतीय भी शामिल थे. अधिकांश लोगों को बचा लिया गया, लेकिन एक भारतीय अब भी लापता बताया जा रहा है.
ईरान का दावा था कि जहाज ने उस समुद्री मार्ग का उपयोग किया, जिसकी अनुमति नहीं थी. अमेरिका ने इसे अंतरराष्ट्रीय नौवहन की स्वतंत्रता पर हमला बताया और इसके बाद ईरान पर बड़े पैमाने पर बमबारी शुरू कर दी.
समझौता टूटने की कगार पर
17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते (MOU) की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यही थी कि दोनों पक्ष एक-दूसरे पर हमले नहीं करेंगे और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करेंगे.
समझौते के तहत अमेरिका को अपना नौसैनिक अवरोध हटाना था जबकि ईरान को जहाजों के लिए सुरक्षित समुद्री मार्ग उपलब्ध कराना था. साथ ही 60 दिनों तक किसी भी जहाज से कोई शुल्क या टोल नहीं लिया जाना था.
लेकिन अब दोनों पक्ष एक-दूसरे पर समझौते के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं. ईरान का कहना है कि अमेरिका लगातार सैन्य हस्तक्षेप कर रहा है, जबकि अमेरिका का आरोप है कि ईरान ने जहाजों पर हमले कर समझौते की भावना को ही समाप्त कर दिया.
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विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
भू-राजनीतिक विशेषज्ञ मनीष राय का मानना है कि इस संघर्ष की वास्तविक शुरुआत होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा से हुई.
उनके अनुसार, आईआरजीसी ने खाड़ी के तेल टैंकरों पर हमले इसलिए किए क्योंकि तेहरान मानता है कि यदि जलडमरूमध्य पर उसका प्रभाव बना रहता है, तो वह दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाकर आर्थिक लाभ भी अर्जित कर सकता है. साथ ही भविष्य में अमेरिका के साथ किसी भी वार्ता में मजबूत स्थिति हासिल करने के लिए ईरान अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन करना चाहता है.
मनीष राय कहते हैं कि अमेरिका की रणनीति बिल्कुल विपरीत है. वाशिंगटन किसी भी कीमत पर यह संदेश देना चाहता है कि होर्मुज अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग है और उस पर किसी एक देश का नियंत्रण स्वीकार नहीं किया जाएगा. इसलिए अमेरिकी हवाई हमलों का मुख्य उद्देश्य आईआरजीसी की सैन्य क्षमता को कमजोर करना और तेहरान के कट्टरपंथी नेतृत्व पर दबाव बनाना है ताकि भविष्य की बातचीत में ईरान अधिक कठोर शर्तें न रख सके.
क्या यह दूसरा रूस-यूक्रेन बन सकता है?
यह सबसे बड़ा प्रश्न है.
विदेश नीति विश्लेषक और सामरिक मामलों की शोधकर्ता समांथा करमाकर मानती हैं कि पहली नजर में दोनों संघर्षों के बीच समानता दिखाई देती है; दोनों में सैन्य शक्ति का प्रयोग हो रहा है, वैश्विक तनाव बढ़ रहा है और ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो रही है.
लेकिन उनके अनुसार वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है.
रूस-यूक्रेन युद्ध मुख्यतः क्षेत्रीय संप्रभुता, यूरोपीय सुरक्षा व्यवस्था और रूस की सामरिक चिंताओं से जुड़ा संघर्ष है. इसके विपरीत अमेरिका-ईरान टकराव परमाणु कूटनीति, क्षेत्रीय शक्ति संतुलन, प्रॉक्सी नेटवर्क, समुद्री सुरक्षा और फारस की खाड़ी में प्रभाव बनाए रखने की प्रतिस्पर्धा पर आधारित है.
हालांकि समांथा चेतावनी देती हैं कि दोनों संघर्षों में एक समान प्रवृत्ति अवश्य दिखाई देती है, दुनिया तेजी से उस दौर में प्रवेश कर रही है जहां,
कूटनीति की जगह सैन्य दबाव लेता जा रहा है.
स्थानीय संघर्ष अब स्थानीय नहीं रह जाते. उनका प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार, बीमा लागत, तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन तक पहुंच जाता है.
क्या 20 प्रतिशत शुल्क दोहराएगा रूस-यूक्रेन जैसा आर्थिक संकट?
यही वह बिंदु है जहां ट्रंप की 20 प्रतिशत लेवी सबसे अधिक विवादास्पद बन जाती है.
रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान यूरोप ने ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान, गैस संकट और रिकॉर्ड महंगाई का सामना किया था. यदि होर्मुज से गुजरने वाले टैंकरों पर अतिरिक्त 20 प्रतिशत शुल्क लागू होता है या ईरान इसके जवाब में जहाजों पर हमले तेज करता है, तो तेल परिवहन की लागत कई गुना बढ़ सकती है.
समुद्री बीमा प्रीमियम पहले ही बढ़ रहे हैं. यदि इस पर सुरक्षा शुल्क भी जुड़ गया, तो उसका सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों, शिपिंग लागत, खाद्य महंगाई और औद्योगिक उत्पादन पर पड़ेगा. एशिया, विशेषकर भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे ऊर्जा आयातक देशों पर इसका प्रभाव सबसे अधिक दिखाई दे सकता है.
इस दृष्टि से यह संकट रूस-यूक्रेन युद्ध की हूबहू पुनरावृत्ति नहीं होगा, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसके समान व्यापक आर्थिक झटके अवश्य दे सकता है.
निर्णायक लड़ाई या लंबा गतिरोध?
मौजूदा हालात संकेत दे रहे हैं कि दोनों पक्ष पीछे हटने के मूड में नहीं हैं. अमेरिका अपनी समुद्री प्रभुसत्ता स्थापित करना चाहता है, जबकि ईरान होर्मुज को अपनी सबसे बड़ी सामरिक ताकत मानता है.
यदि ट्रंप वास्तव में 20 प्रतिशत शुल्क लागू करते हैं और ईरान इसे चुनौती देता है, तो यह केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रहेगा. यह वैश्विक समुद्री कानून, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन की परीक्षा बन जाएगा.
आज सवाल केवल यह नहीं है कि अगली मिसाइल कौन दागेगा. असली सवाल यह है कि क्या दुनिया एक और ऐसे लंबे संघर्ष की ओर बढ़ रही है, जिसमें बंदूकें मिडिल ईस्ट में चलेंगी, लेकिन उसकी कीमत पूरी दुनिया अपनी अर्थव्यवस्था, महंगाई और ऊर्जा सुरक्षा के रूप में चुकाएगी.
रूस-यूक्रेन की तरह यह युद्ध भी वैश्विक व्यवस्था को बदल सकता है, बस इस बार रणभूमि यूरोप नहीं, बल्कि होर्मुज का समुद्री गलियारा होगा.
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