पश्चिम एशिया की जंग और एयरस्पेस बंद होने का असर भारत की इंटरनेशनल उड़ानों पर भी पड़ा है. अप्रैल-जून में भारत आने-जाने वाले इंटरनेशनल यात्रियों की संख्या पिछले साल के मुकाबले 9.1 फीसदी कम रही. लेकिन इसका ज्यादा असर भारतीय एयरलाइंस पर पड़ा. उनकी इंटरनेशनल पैसेंजर संख्या 26.6 फीसदी घट गई, वहीं विदेशी एयरलाइंस के यात्रियों की संख्या 6 फीसदी बढ़ गई. आखिर ऐसा क्यों हुआ?
इंटरनेशनल ट्रैफिक कम हुआ तो कैसे हुआ फायदा
- डीजीसीए के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से जून के बीच भारत से आने-जाने वाले इंटरनेशनल यात्रियों की संख्या करीब 1.72 करोड़ रही. यह पिछले साल की इसी अवधि से 9.1 फीसदी कम है.
- अप्रैल से जून के बीच भारतीय एयरलाइंस ने करीब 64.2 लाख इंटरनेशनल यात्रियों को सफर कराया. इसमें सालाना आधार पर 26.6 फीसदी की गिरावट आई. दूसरी ओर इस दौरान विदेशी एयरलाइंस के यात्रियों की संख्या बढ़कर करीब 1.08 करोड़ हो गई, जो एक साल पहले से 6 फीसदी ज्यादा है.
- इसका सीधा असर बाजार हिस्सेदारी पर भी पड़ा. भारतीय एयरलाइंस की हिस्सेदारी 46.2 फीसदी से घटकर 37.3 फीसदी रह गई, जबकि विदेशी एयरलाइंस की हिस्सेदारी 53.8 फीसदी से बढ़कर 62.7 फीसदी हो गई.
- यानी कुल बाजार भले छोटा हुआ, लेकिन भारतीय एयरलाइंस का हिस्सा विदेशी कंपनियों के पास चला गया.
जानकारों के अनुसार ऐसा दो कारणों से हुआ. पहला कारण तो पश्चिम एशिया के युद्ध की परेशानी रही वहीं दूसरा कारण पाकिस्तान का एयरस्पेस बंद होना है.
भारतीय एयरलाइंस के लिए कितना महत्वपूर्ण है पाकिस्तान का एयरस्पेस
अप्रैल 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ने के बाद पाकिस्तान ने भारतीय विमानों के लिए अपना एयरस्पेस बंद कर दिया. भारत ने भी पाकिस्तानी विमानों के लिए अपना एयरस्पेस बंद कर दिया.
इसका सबसे ज्यादा असर भारत से पश्चिम दिशा में जाने वाली उड़ानों पर पड़ा.
- इसे आसान उदाहरण से समझिए. दिल्ली से लंदन जाने वाले विमान के लिए पाकिस्तान के ऊपर से जाना काफी सीधा रास्ता होता है. लेकिन जब पाकिस्तान का एयरस्पेस बंद हो गया तो भारतीय विमान को दूसरा, लंबा रास्ता लेना पड़ा.
- इससे न सिर्फ उड़ान का समय बढ़ा बल्कि ज्यादा ईंधन भी खर्च होने लगा.यानी एयरलाइंस को जहां जाने के लिए पहले कम खर्च करने पड़ रहे थे वहां अब उनका ज्यादा पैसा खर्च हो रहा है.
- पाकिस्तान का एयरस्पेस बंद होने से भारतीय एयरलाइंस की करीब 800 साप्ताहिक उड़ानें प्रभावित हुईं. इनमें पश्चिम एशिया, यूरोप, ब्रिटेन, कॉक्स और उत्तरी अमेरिका जाने वाली कई उड़ानें शामिल थीं.
- किसी फ्लाइट का रास्ता 15 मिनट लंबा हुआ तो किसी का कई घंटे तक बढ़ गया. सुनने में 15 मिनट ज्यादा नहीं लगते, लेकिन जब यह असर हर हफ्ते सैकड़ों उड़ानों पर पड़े तो एयरलाइन की लागत बहुत तेजी से बढ़ जाती है.
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पश्चिम एशिया की जंग ने ये मुश्किल और बढ़ा दी
- पाकिस्तान एयरस्पेस बंद होने से भारतीय एयरलाइंस पहले ही परेशान थीं. इसके बाद पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने से उनकी मुश्किलें और बढ़ गई.
- यूएई, सऊदी अरब और पश्चिम एशिया के दूसरे देश भारत के लिए बहुत बड़े एविएशन बाजार हैं. भारत से बड़ी संख्या में लोग इन देशों में नौकरी, कारोबार, पर्यटन या परिवार से मिलने के लिए जाते हैं.
- भारतीय एयरलाइंस भी इन रूट पर बड़ी संख्या में उड़ानें चलाती हैं. युद्ध के कारण इन इलाकों में फ्लाइट ऑपरेशन प्रभावित हुए और कुछ उड़ानों को कम या बंद करना पड़ा.
- इसके साथ ही जेट फ्यूल की कीमतों पर भी पर भी असर पड़ा . यानी एयरलाइंस की आमदनी कम हो रहा था लेकिन खर्च बढ़ता जा रहा था.
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फिर विदेशी एयरलाइंस को कैसे मिला फायदा?
- जब युद्ध का असर पूरे इलाके पर था तो विदेशी एयरलाइंस को फायदा कैसे हुआ? इसका जवाब है पाकिस्तान का एयरस्पेस.
- भारतीय एयरलाइंस पाकिस्तान के ऊपर से नहीं उड़ सकती थीं, जबकि कई विदेशी एयरलाइंस के लिए यह रास्ता खुला था. इसलिए भारत और यूरोप के बीच उड़ान भरने वाली कुछ विदेशी कैरियर्स को भारतीय एयरलाइंस के मुकाबले routing advantage मिला.
- दूसरी तरफ, जब भारतीय एयरलाइंस ने कुछ उड़ानें कम की तो बाजार में सीटों की कमी हुई.
- विदेशी एयरलाइंस ने इसी मौके का फायदा उठाया और अपनी उड़ानें बढ़ाकर उन यात्रियों को अपने साथ जोड़ लिया. यानी एक एयरलाइन की मजबूरी दूसरी एयरलाइन के लिए मौका बन गई.
इंडिगो और एयर इंडिया को झटका
- इंडिगो भारतीय एयरलाइंस में इंटरनेशनल यात्रियों के मामले में सबसे आगे रही, लेकिन अप्रैल-जून में उसके इंटरनेशनल यात्रियों की संख्या 15.4 फीसदी घटकर करीब 33.4 लाख रह गई. उसकी बाजार हिस्सेदारी भी 20.9 फीसदी से घटकर 19.4 फीसदी हो गई.
- एयर इंडिया के इंटरनेशनल यात्रियों की संख्या 27.2 फीसदी घटकर करीब 19.3 लाख रह गई. उसकी बाजार हिस्सेदारी 14 फीसदी से घटकर 11.2 फीसदी रह गई.
- एयर इंडिया एक्सप्रेस को और बड़ा झटका लगा. उसका नेटवर्क पश्चिम एशिया पर काफी निर्भर है. इसलिए युद्ध का सीधा असर पड़ा और उसके इंटरनेशनल यात्रियों की संख्या करीब आधी रह गई. उसकी बाजार हिस्सेदारी 8.9 फीसदी से गिरकर 4.8 फीसदी हो गई.
- स्पाइसजेट के इंटरनेशनल यात्रियों की संख्या भी करीब 56 फीसदी घट गई. हालांकि, कंपनी की अपनी वित्तीय परेशानियां भी इसके पीछे एक वजह थीं.
विदेशी एयरलाइंस का बढ़ा ट्रैफिक
डीजीसीए के आंकड़ों में शामिल 81 विदेशी एयरलाइंस में से 51 के यात्रियों की संख्या बढ़ी.
- सऊदिया के भारत से जुड़े यात्रियों की संख्या करीब 50 फीसदी बढ़ी.
- एमिरेट्स के यात्रियों की संख्या भी 7.3 फीसदी बढ़कर करीब 14.8 लाख हो गई.
- इसके अलावा लुफ्थांसा, केएलएम, स्विस, फिनएयर, इथियोपियन एयरलाइंस और कई दूसरी विदेशी कंपनियों को भी फायदा हुआ. एशिया की कुछ एयरलाइंस, जैसे सिंगापुर एयरलाइंस और जापान एयरलाइंस, ने भी भारत से जुड़ा ट्रैफिक बढ़ाया.
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