1971 में जब भारत ने पाकिस्तान के 5,795 वर्ग मील भूमि पर कर लिया था कब्जा, तो क्यों कर दिया वापस?

India-Pakistan Wars : पहलगाम हमले के बाद भारत, पाकिस्तान के खिलाफ कुछ बड़ा करने वाला है. यह विचार देश के नागरिकों के मन में इसलिए है, क्योंकि हमले के बाद प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट कहा था कि हमला करने वालों को उम्मीद से बड़ी सजा मिलेगी. प्रधानमंत्री ने बुधवार को सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की बैठक भी की है और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड में बड़े परिवर्तन भी किए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेना को यह खुली छूट दे दी है कि वे यह तय करें कि पहलगाम हमले की प्रतिक्रिया का तरीका, लक्ष्य और समय क्या हो. भारत की इतनी ही प्रतिक्रिया पर पाकिस्तान की हालत खराब है. वह बौखलाया हुआ है, अनाप-शनाप बयानबाजी कर रहा है. पाकिस्तान संभवत: 1971 का युद्ध भूल गया है.

India-Pakistan Wars: भारत-पाकिस्तान के बीच जब भी युद्ध हुए हैं, पाकिस्तान बुरी तरह पराजित हुआ है और उसने भारत के सामने आत्मसमर्पण भी किया है, बावजूद इसके वह गीदड़ भभकी देता रहता है. 1971 का युद्ध अगर पाकिस्तान ना भुला हो तो उसे यह याद रखना चाहिए कि इस युद्ध में पाकिस्तान ने भारत के सामने आत्मसमर्पण किया था. उसके 93 हजार से अधिक युद्धबंदी भारत के कब्जे में थे और पाकिस्तान की 5,795 वर्ग मील भूमि पर पाकिस्तान का कब्जा था. बावजूद इसके भारत ने ना सिर्फ पाकिस्तान की पूरी भूमि उसे वापस दी, बल्कि मानवता के आधार पर शिमला समझौते के बाद तमाम युद्धबंदियों को भी छोड़ दिया था. आज पाकिस्तान उसी शिमला समझौते से बाहर आने की बात कर रहा है. अगर पाकिस्तान ने यह गलती की, तो उसे पीओके से हाथ धोना पड़ सकता है.

भारतीय सेना पाकिस्तान के लाहौर तक पहुंच गई थी

1971 के युद्ध में पूर्वी पाकिस्तान में ढाका तक और पश्चिमी पाकिस्तान में लाहौर के करीब तक भारतीय सेना का कब्जा था. उस वक्त भारतीय सेना ने घुटनों पर आकार भारतीय सेना के सामने हथियार डाले थे.बावजूद इसके भारत ने पाकिस्तान की जमीन छोड़ दी और पूरे विश्व को यह संदेश दिया कि भारत कभी अपने क्षेत्र में अशांति नहीं चाहता और अपने पड़ोसियों को वह सम्मान करता है. भारत के इस रवैये से उसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला था. आज भी भारत की छवि वैश्विक मंच पर इसी तरह की है कि भारत एक शांतिप्रिय देश है.

क्या था शिमला समझौता

भारत और पाकिस्तान के बीच जब 1971 का युद्ध खत्म हुआ और पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश के रूप में आजाद हुआ, तो भारत और पाकिस्तान के संबंधों को सामान्य बनाने और भविष्य में युद्ध को टालने के लिए शिमला समझौता हुआ था. यह समझौता बहुत खास था, क्योंकि इसके बाद ही भारत ने पाकिस्तान की 5,795 वर्ग मील भूमि और 93 हजार युद्धबंदी को रिहा कर दिया था. इस समझौते के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच एलओसी का निर्धारण हुआ और यह सहमति बनी कि दोनों देश इसका सम्मान करेंगे. उससे पहले इस लाइन को सीजफायर लाइन के नाम से जाना जाता था. इस समझौते में यह सहमति भी बनी थी कि दोनों देश आपसी विवादों को दिपक्षीय बातचीत से हल करेंगे.

शिमला समझौता की खास बातें

मुख्य बातेंविवरण
1. द्विपक्षीय समाधानभारत और पाकिस्तान सभी विवादों को आपस में ही शांतिपूर्ण और द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाएंगे .
2. युद्ध विराम की पुष्टि1971 के युद्ध के सीज़फायर को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया.
3. नियंत्रण रेखा (LoC)पूर्व की सीजफायर लाइन” को “नियंत्रण रेखा (LoC)” नाम दिया गया. दोनों देश इस रेखा का सम्मान करने पर सहमत हुए.
युद्धबंदी और भूमि वापसीभारत ने 93,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा किया और पश्चिमी मोर्चे पर कब्जा की गई जमीन पाकिस्तान को लौटा दी.
शांतिपूर्ण सह-अस्तित्वभारत और पाकिस्तान एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करने पर सहमत हुए.

भारत ने पाकिस्तान की जीती हुई भूमि को क्यों छोड़ दिया था?

शिमला समझौता भारत की उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच हुआ था. उस वक्त भारत विजेता था और हमारे पास सबकुछ था. भारत अगर चाहता तो पाकिस्तान को ना तो जमीन वापस करता और ना ही युद्धबंदी.भारत ने यह युद्ध नैतिक आधार पर लड़ा था, जिसके पीछे वजह बांग्लादेश की मुक्ति थी. पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान की मुक्ति को मौन सहमति दे दी थी, जिसके बाद भारत ने विश्व को यह मैसेज दिया कि हम शांति चाहते हैं, युद्ध नहीं. यह भारतीय कूटनीति थी, जिसके विश्व जनमत को अपने पक्ष में किया. साथ ही उसने पाकिस्तान को द्विपक्षीय वार्ता के लिए भी तैयार किया. हालांकि पाकिस्तान ने इस समझौते की सभी शर्तों को पूरी तरह कभी नहीं माना, लेकिन उस वक्त के लिहाज से पाकिस्तान की जमीन और युद्धबंदियों की वापसी करके भारत ने अपनी कूटनीतिक जीत दर्ज की थी.

पीओके हो सकता है भारत का हिस्सा

पाकिस्तान ने अगर शिमला समझौते को तोड़ा, तो उसके लिए परिणाम बहुत गंभीर हो सकते हैं, क्योंकि तब भारत पीओके पर आसानी से सैन्य कार्रवाई कर सकता है. यह बात अलग है कि इसके लिए उसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना पड़ सकता है, लेकिन समझौता टूटने के बाद भारत पीओके पर सैन्य कार्रवाई करके उसे वापस भारत में मिला सकता है.

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By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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