आर्कटिक यानी उत्तरी ध्रुव के आसपास का इलाका भारत से हजारों किलोमीटर दूर है, लेकिन वहां तेजी से बदल रही परिस्थितियों का असर भारत के मौसम, मानसून, समुद्र-स्तर, व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि कभी केवल वैज्ञानिक शोध और पर्यावरण के नजरिए से देखा जाने वाला यह इलाका अब वैश्विक भू-राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है. नतीजन रूस, अमेरिका और चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच भारत के लिए भी इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत बढ़ रही है.
संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति की रिपोर्ट भारत की आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में भूमिका और उपस्थिति की इसी बदलती तस्वीर की ओर संकेत करती है. समिति का कहना है कि भारत के पास ध्रुवीय नीति और वैज्ञानिक मौजूदगी तो है, लेकिन उसे प्रभावी क्षमता, बेहतर संस्थागत समन्वय और अधिक सक्रिय कूटनीति में बदलने की जरूरत है.
आर्कटिक इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
- आर्कटिक कोई एक देश नहीं, बल्कि उत्तरी ध्रुव के आसपास फैला विशाल क्षेत्र है. यहां कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे, रूस, स्वीडन और अमेरिका सहित आठ आर्कटिक देश हैं.
- अंटार्कटिका से आर्कटिक की एक बुनियादी भौगोलिक भिन्नता है. अंटार्कटिका एक महाद्वीप है, जिसके ऊपर बर्फ की विशाल चादर है, जबकि आर्कटिक मुख्य रूप से समुद्री क्षेत्र है.
- जलवायु परिवर्तन ने आर्कटिक की अहमियत और बढ़ा दी है. समुद्री बर्फ में कमी से समुद्री मार्गों के खुलने की संभावनाएं बढ़ी हैं.
- साथ ही ऊर्जा संसाधनों और महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर भी इस क्षेत्र में दिलचस्पी बढ़ रही है. लेकिन आर्कटिक की अहमियत सिर्फ जलवायु और संसाधनों तक सीमित नहीं है. रूस और अमेरिका दोनों आर्कटिक शक्तियां हैं.
- चीन आर्कटिक देश नहीं होने के बावजूद खुद को नजदीकी आर्कटिक देश बताता है और इस क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान, बुनियादी ढांचे और समुद्री गतिविधियों में निवेश कर रहा है.
इसलिए आर्कटिक जलवायु परिवर्तन और महाशक्तियों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन रहा है.
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भारत का आर्कटिक से कैसा है रिश्ता?
- भारत की आर्कटिक मौजूदगी हाल की शुरुआत नहीं है. 1920 की स्वालबार्ड संधि से भारत का ऐतिहासिक जुड़ाव रहा है. स्वालबार्ड नॉर्वे के उत्तर में स्थित द्वीपसमूह है.
- भारत ने 2007 में अपना पहला आर्कटिक वैज्ञानिक अभियान शुरू किया और 2008 में स्वालबार्ड के न्य-ऑलेसंड में हिमाद्री अनुसंधान केंद्र स्थापित किया. यहां भारत के वैज्ञानिक जलवायु, वायुमंडल, हिमनद, समुद्री विज्ञान और जैव-विविधता जैसे विषयों पर शोध करते हैं.
- भारत 2013 से आर्कटिक परिषद में पर्यवेक्षक देश है. इसके अलावा 2022 में भारत ने अपनी आर्कटिक नीति भी जारी की. इसका मकसद वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन, आर्थिक सहयोग, परिवहन और संपर्क, आर्कटिक शासन तथा राष्ट्रीय क्षमता निर्माण में भारत की भूमिका मजबूत करना है.
आर्कटिक और भारत का मानसून कनेक्शन
- भारत के लिए आर्कटिक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू जलवायु सुरक्षा है.
- आर्कटिक में तेजी से बढ़ता तापमान और समुद्री बर्फ में बदलाव वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित कर सकता है. वैज्ञानिकों ने आर्कटिक समुद्री बर्फ में बदलाव और दक्षिण एशियाई मानसून के बीच संभावित संबंधों का अध्ययन किया है.
- इसका मतलब यह नहीं है कि आर्कटिक की बर्फ कम होने पर भारत में हर साल मानसून निश्चित रूप से कमजोर या मजबूत होगा. लेकिन आर्कटिक और मानसून के बीच संभावित संबंधों को समझना मौसम पूर्वानुमान और जलवायु मॉडल को बेहतर बनाने के लिए महत्वपूर्ण है.
- भारत की कृषि, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मानसून की बड़ी भूमिका है. इसलिए आर्कटिक में होने वाला वैज्ञानिक शोध अप्रत्यक्ष रूप से भारत की अपनी जलवायु सुरक्षा से जुड़ जाता है.
समुद्र का जल स्तर बढ़ने का भारत पर क्या होगा असर?
- आर्कटिक और अंटार्कटिका में बर्फ और समुद्री बदलाव वैश्विक समुद्र-स्तर को प्रभावित करते हैं. भारत की लंबी तटरेखा और बड़े तटीय शहरों को देखते हुए समुद्र-स्तर बढ़ना भविष्य की बड़ी चुनौती बन सकता है.
- तटीय बाढ़, बंदरगाहों और औद्योगिक ढांचे को नुकसान, कृषि भूमि पर असर, पेयजल स्रोतों में खारे पानी का प्रवेश और लोगों का विस्थापन आम लोगों पर आर्थिक और सामाजिक प्रभाव डाल सकता है.
- यही कारण है कि ध्रुवीय क्षेत्रों को केवल पर्यावरण के नजरिए से देखने के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा और जलवायु सुरक्षा से जोड़कर देखने की जरूरत है.
आर्कटिक का व्यापार और भारत के लिए उत्तरी समुद्री मार्ग
- आर्कटिक में समुद्री बर्फ घटने के साथ उत्तरी समुद्री मार्ग को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय दिलचस्पी बढ़ी है. यह मार्ग रूस के उत्तरी तट के साथ आर्कटिक महासागर से होकर गुजरता है.
- भारत के लिए इसकी संभावित अहमियत यूरोप और एशिया के बीच समुद्री संपर्क, रूस के ऊर्जा संसाधनों और भविष्य के वैकल्पिक व्यापार मार्गों से जुड़ी है.
- लेकिन इसे तुरंत स्वेज नहर के विकल्प के रूप में देखना जल्दबाजी होगी. बर्फ, मौसम, जहाजों की क्षमता, बीमा, बंदरगाह सुविधाएं और भू-राजनीतिक परिस्थितियां इसकी व्यवहारिकता तय करेंगी.
- यानी आर्कटिक भारत के लिए सिर्फ जलवायु का मुद्दा नहीं है. आने वाले समय में यह व्यापार, ऊर्जा और समुद्री संपर्क से जुड़ा रणनीतिक मुद्दा भी बन सकता है.
आर्कटिक में क्या हो सकती है भारत की कमजोरी?
- आर्कटिक को लेकर संसदीय समिति की रिपोर्ट में सबसे अहम पहलू है भारत की महत्वाकांक्षा और उसकी क्षमता के बीच अंतर.
- रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास नीति है, हिमाद्री जैसा अनुसंधान केंद्र है और वैज्ञानिकों का अनुभव भी है. लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. क्योंकि आर्कटिक के बड़े समुद्री क्षेत्र में लगातार शोध करने, वहां कूटनीतिक प्रभाव बढ़ाने और बदलती परिस्थितियों पर तेजी से प्रतिक्रिया देने के लिए ज्यादा मजबूत संस्थागत ढांचे की जरूरत है.
- यानी सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि भारत आर्कटिक में मौजूद है या नहीं. सवाल यह है कि क्या भारत अपनी मौजूदगी को प्रभाव में बदल पा रहा है?
इसी जरूरत को समझते हुए समिति ने ध्रुवीय राजदूत नियुक्त करने की सिफारिश की है.
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आर्कटिक परिषद में क्या है भारत की भूमिका?
- भारत आर्कटिक परिषद का पर्यवेक्षक है. इसका अर्थ है कि भारत परिषद की गतिविधियों में भाग ले सकता है, लेकिन आठ आर्कटिक देशों के समान निर्णय लेने की भूमिका उसके पास नहीं है.
- समिति चाहती है कि भारत अपनी भूमिका और प्रभाव को बढ़ाए. इसके लिए आर्कटिक देशों के साथ द्विपक्षीय संबंध मजबूत करने, वैज्ञानिक सहयोग बढ़ाने और स्थानीय तथा आदिवासी समुदायों के साथ संवाद बढ़ाने की जरूरत बताई गई है.
- भारत, जापान, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया के साथ आर्कटिक सहयोग का एक चतुष्कोणीय ढांचा यानी Quadrangular Framework विकसित करने की संभावना पर भी जोर दिया गया है.
तो भारत की तैयारी कैसी है?
- आर्कटिक तेजी से बदल रहा है. इसका असर जलवायु से लेकर समुद्री व्यापार और भू-राजनीति तक दिखाई दे रहा है. भारत के पास वहां वैज्ञानिक मौजूदगी है, नीति है और आर्कटिक परिषद में पर्यवेक्षक का दर्जा भी है.
- लेकिन बदलते आर्कटिक में केवल मौजूदगी पर्याप्त नहीं होगी. भारत को वैज्ञानिक क्षमता, संस्थागत समन्वय, ध्रुवीय बुनियादी ढांचे और सक्रिय कूटनीति के जरिए अपनी भूमिका को मजबूत करना होगा.
- क्योंकि सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि भारत आर्कटिक में मौजूद है या नहीं. असली सवाल यह है कि तेजी से बदलते आर्कटिक में भारत अपनी इस मौजूदगी को कितनी रणनीतिक ताकत में बदल पाता है. और यही सवाल आगे बढ़कर आर्कटिक में रूस, अमेरिका और चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच भारत की रणनीतिक जगह को समझने की जरूरत पैदा करता है.
इस स्टोरी के अगले कड़ी में समझेगें कि आर्कटिक में रूस, अमेरिका और चीन की होड़ क्यों बढ़ रही है और इस पूरे समीकरण में भारत कहां खड़ा है
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