दुनिया के समुद्री व्यापार का पुराना गणित बदल रहा है. अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जहाज को सबसे छोटे और सस्ते रास्ते से कैसे पहुंचाया जाए. दरअसल, पश्चिम एशिया में युद्ध ने होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही को प्रभावित किया है, तो दूसरी तरफ पनामा नहर में पानी की कमी के कारण जहाजों की आवाजाही सीमित है. नतीजा जहाजों को वैकल्पिक रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं, सफर लंबा और महंगा हो रहा है.
ऐसे में युद्ध, पानी की कमी और बढ़ती शिपिंग लागत के कारण शिपिंग कंपनियों के सामने नया सवाल है कि व्यापार के लिए कौन सा ट्रेड रूट सही है और वो कितना सुरक्षित है.
होर्मुज में तनाव से शिपिंग पर कितना असर?
होर्मुज दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है. यहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई होती है. इसलिए इस रास्ते में कोई बड़ी रुकावट आती है तो उसका असर सिर्फ जहाजों तक नहीं रहता, बल्कि तेल की कीमत, माल ढुलाई, खाने-पीने की चीजों और दूसरी चीजों की लागत पर भी पड़ सकता है. UNCTAD के अनुसार होर्मुज दुनिया के अहम समुद्री चेकपॉइंट में शामिल है.
यूएन ट्रेड एंड डेवलपमेंट (UN Trade and Development), जिसे पहले यूएनसीटीएडी (UNCTAD) के नाम से जाना जाता था, संयुक्त राष्ट्र की एक प्रमुख अंतर-सरकारी संस्था है. इसकी स्थापना 1964 में हुई थी. यह वैश्विक व्यापार, निवेश और विकास से जुड़े मुद्दों पर रिसर्च, आंकड़े और नीतिगत विश्लेषण उपलब्ध कराती है.
- होर्मुज में तनाव के कारण मौजूदा स्थिति देखें तो बाजार और जहाजों की ट्रैकिंग के आंकड़े काफी कुछ बताते हैं. रॉयटर्स के मुताबिक, बुधवार को होर्मुज से सिर्फ 7 कमोडिटी जहाज गुजरे. एक दिन पहले यह संख्या 12 थी, जबकि पिछले 10 दिनों का औसत करीब 14 था.
- होर्मुज में तनाव का तेल की कीमतों पर भी असर दिख रहा है. 10 सितंबर को ब्रेंट क्रूड करीब 101.10 डॉलर प्रति बैरल था. रॉयटर्स के मुताबिक, अगस्त की शुरुआत के मुकाबले इसकी कीमत करीब 30 फीसदी बढ़ी है. हालांकि यह बाजार का आंकड़ा है, आईएमओ या यूएनसीटीएडी का आधिकारिक आंकड़ा नहीं.
- जहाजों का किराया भी बढ़ा है. एसएंडपी ग्लोबल के बाजार आंकड़ों के मुताबिक, 9 सितंबर को अरब गल्फ से सुदूर पूर्व जाने वाले बड़े वीएलसीसी टैंकर का किराया रिकॉर्ड 161.93 डॉलर प्रति मीट्रिक टन तक था.
पनामा नहर में पानी की कमी क्यों बनी चिंता?
- होर्मुज में समस्या युद्ध की वजह से है, लेकिन पनामा नहर एक दूसरी तरह के खतरे का संकेत कर रही है. यहां सवाल है कि जहाज चलाने के लिए नहर में पानी कितना उपलब्ध है.
- पनामा नहर प्राधिकरण के मुताबिक, 3 सितंबर से रोजाना 9 नियोपनामैक्स और 25 पैनामैक्स, यानी कुल 34 जहाजों के लिए स्लॉट हैं. 15 सितंबर से यह संख्या घटकर 32 जहाज रोजाना हो जाएगी. पानी की कमी के कारण क्षमता घटने से जहाजों का इंतजार और शिपिंग लागत बढ़ सकती है.
पनामा नहर में जहाजों की आवाजाही लॉक सिस्टम और पानी की उपलब्धता पर निर्भर करती है. अलग-अलग आकार के जहाजों के लिए अलग लॉक हैं और हर दिन सीमित संख्या में जहाजों को गुजरने की अनुमति मिलती है. पैनामैक्स लॉक अपेक्षाकृत छोटे जहाजों के लिए होता है, जबकि नियोपनामैक्स लॉक बड़े जहाजों के लिए बनाए जाते हैं.
- प्राधिकरण के मुताबिक, नहर के आसपास के इलाके में उम्मीद से कम बारिश हुई है. एल नीनो का असर भी रहा है. पानी बचाने के लिए कई कदम उठाए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद जहाजों की संख्या सीमित करनी पड़ी है।
- पनामा नहर इसलिए अहम है क्योंकि यह अटलांटिक और प्रशांत महासागर के बीच जहाजों का रास्ता काफी छोटा कर देती है. अगर यहां जहाजों की संख्या कम होती है तो उन्हें इंतजार करना पड़ सकता है या फिर लंबा रास्ता चुनना पड़ सकता है.
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क्या केप ऑफ गुड होप फिर बन रहा है अहम रास्ता?
- जब कोई छोटा समुद्री रास्ता ज्यादा जोखिम वाला हो जाता है तो कंपनियां लंबा रास्ता चुनने लगती हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण लाल सागर और स्वेज नहर के मामले में केप ऑफ गुड होप का रास्ता है.
- रॉटरडैम पोर्ट के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, सिंगापुर से रॉटरडैम तक स्वेज नहर के रास्ते की दूरी करीब 8,288 नॉटिकल मील है. वहीं केप ऑफ गुड होप से होकर जाने पर यह दूरी करीब 11,755 नॉटिकल मील हो जाती है. यानी करीब 3,467 नॉटिकल मील ज्यादा.
- जाहिर है, ज्यादा दूरी का मतलब ज्यादा ईंधन, ज्यादा समय और ज्यादा खर्च. लेकिन अगर छोटे रास्ते पर युद्ध, हमले या बीमा का खतरा बहुत ज्यादा हो जाए तो कंपनियों के लिए लंबा रास्ता भी ज्यादा सुरक्षित और व्यावहारिक विकल्प हो सकता है.
समुद्री ट्रेड रूट चेंज होने पर भारत पर क्या असर होगा ?
- भारत के लिए यह मुद्दा और भी अहम है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है. रॉयटर्स के मुताबिक जनवरी में भारत के करीब 55 फीसदी कच्चे तेल का आयात मध्य पूर्व से आया था.
- भारत अपनी एलएनजी जरूरत का करीब दो-तिहाई हिस्सा भी मध्य पूर्व से लेता है. लेकिन संकट बढ़ने के बाद भारत ने दूसरे देशों से तेल और गैस लेने की कोशिश तेज कर दी है.
- रॉयटर्स के मुताबिक, अप्रैल-जुलाई 2026 के बीच भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की औसत हिस्सेदारी 43.25 फीसदी रही और मध्य पूर्व की हिस्सेदारी करीब 30 फीसदी रह गई. जबकि जुलाई में अकेले रूस की हिस्सेदारी 50.83 फीसदी तक पहुंची.
- एलएनजी में भी भारत दूसरे विकल्प तलाश रहा है. पेट्रोनेट एलएनजी ने कतर से सितंबर की सप्लाई को लेकर अनिश्चितता जताई थी. इसके बाद भारत ने ओमान, अमेरिका, नाइजीरिया और अंगोला जैसे देशों से सप्लाई बढ़ाने की कोशिश की.
- यानी भारत के लिए बात सिर्फ इतनी नहीं है कि तेल और गैस कहां से खरीदना है. सवाल यह भी है कि वह तेल और गैस भारत तक किस रास्ते से आएगा और वह रास्ता कितना सुरक्षित है.
क्या यह अस्थायी संकट है या समुद्री ट्रेड रूट का नया नक्शा?
- अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि दुनिया का व्यापार पूरी तरह नए रास्तों पर जा चुका है. अगर होर्मुज में तनाव कम होता है तो जहाजों की आवाजाही फिर बढ़ सकती है. इसी तरह पनामा नहर में बारिश और पानी की स्थिति बेहतर होने पर वहां की पाबंदियां भी कम हो सकती हैं.
- लेकिन इन घटनाओं ने एक बड़ी बात जरूर साफ कर दी है कि दुनिया का समुद्री व्यापार कुछ बेहद अहम रास्तों पर बहुत ज्यादा निर्भर है. इनमें से किसी एक रास्ते पर भी संकट आया तो उसका असर तेल की कीमत से लेकर माल ढुलाई और सप्लाई चेन तक पहुंच सकता है.
- इसी वजह से कंपनियां अब सिर्फ सबसे छोटा रास्ता खोजने पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं. वे दूसरे रास्ते, अलग-अलग देशों से सामान लेने के विकल्प और अतिरिक्त जहाजों की व्यवस्था पर भी ध्यान दे रही हैं.
- यानी बदलाव सिर्फ यह नहीं है कि जहाज किस रास्ते से जाएंगे. असली बदलाव यह है कि कंपनियां अब अपनी सप्लाई चेन को इस तरह तैयार करना चाहती हैं कि एक रास्ता बंद हो जाए तो कारोबार पूरी तरह न रुके.
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