पश्चिम एशिया की टेंशन खत्म होने की जगह बढ़ती ही जा रही है और अब इसका असर दुनिया की तेल सप्लाई पर भी दिखने लगा है. एक तरफ होर्मुज जलडमरूमध्य पहले से ही प्रभावित है तो दूसरी तरफ सऊदी अरब ने ड्रोन हमलों के बाद अपनी अहम ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन बंद कर दी है और अब यमन में हूती यों की बढ़त से बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर भी खतरा बढ़ गया है.
आसान भाषा में कहें तो दुनिया में तेल की सप्लाई के तीन बड़े रास्तों पर एक साथ संकट है और अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही रहे, तो तेल महंगा होने से पेट्रोल-डीजल और एलपीजी के दाम बढ़ सकते हैं. और इसका असर आम लोगों के जेब पर दिखाई देगा.
ऐसे में अहम सवाल ये है कि तेल की सप्लाई के लिए ये तीन रास्ते इतने खास क्यों हैं और भारत के लिए इन रास्तों का प्रभावित होना कितना बड़ा टेंशन है?
कच्चे तेल के सप्लाई के लिए होर्मुज क्यों है सबसे अहम?
- होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है. यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है.
- अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (U.S. Energy Information Administration - EIA) के मुताबिक, 2024 में इस रास्ते से औसतन करीब 2.07 करोड़ बैरल तेल और पेट्रोलियम तरल पदार्थ रोजाना गुजर रहे थे. यह उस साल दुनिया की पेट्रोलियम खपत के करीब 20 फीसदी के बराबर था. जिसका मतलब हुआ कि होर्मुज में थोड़ी सी भी रुकावट पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकती है.
- इसका असर सिर्फ खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन देशों तक भी पहुंचता है जो यहां से गुजरने वाले तेल पर निर्भर हैं. खास तौर पर एशियाई देश इस मामले में ज्यादा संवेदनशील हैं.
- 2025 की पहली छमाही में होर्मुज से गुजरने वाले कच्चे तेल और कंडेनसेट का करीब 89 फीसदी हिस्सा एशियाई बाजारों की ओर गया था. भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया इसके प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं.
- इसलिए अगर इस जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही लंबे समय तक बाधित होती है, तो इन देशों के लिए कच्चे तेल की उपलब्धता और उसकी कीमत, दोनों पर दबाव बढ़ सकता है.
सऊदी अरब की पाइप लाइन बंद होने से क्या बदला?
सऊदी अरब के पास होर्मुज को बायपास करने के लिए ईस्ट-वेस्ट पाइप लाइन है. यह देश के पूर्वी हिस्से में अबकैक क्षेत्र को लाल सागर के यान्बू बंदरगाह से जोड़ती है. इसकी स्थापित क्षमता करीब 50 लाख बैरल रोजाना रही है और इसे फारस की खाड़ी से तेल को लाल सागर तक पहुंचाने के लिए बनाया गया था.
10 सितंबर को कई हमलों के बाद सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने पाइपलाइन को एहतियातन बंद कर दिया. सऊदी अधिकारियों के अनुसार, पाइपलाइन की सुरक्षा और नुकसान का आकलन करने के लिए तकनीकी टीमें काम कर रही हैं. इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि होर्मुज के रास्ते में परेशानी के दौरान यही पाइपलाइन सऊदी तेल के लिए वैकल्पिक रास्ता बन सकती है.
बाब अल-मंदेब में हूतियों की बढ़त का तेल सप्लाई पर क्या असर होगा ?
- बाब अल-मंदेब लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच का संकरा समुद्री रास्ता है. इसके आगे स्वेज नहर के जरिए यूरोप तक पहुंच बनाई जाती है. इसलिए यह एशिया और यूरोप के बीच तेल, ईंधन और दूसरे सामान की आवाजाही के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
- सितंबर 2026 में हूतियों ने यमन के लाल सागर तट पर तेजी से बढ़त बनाई. मोक्का बंदरगाह पर कब्जे के बाद उनके लड़ाके पेरिम यानी मायून द्वीप तक पहुंचे, जो बाब अल-मंदेब के बीचों बीच स्थित है. हालांकि जमीन पर नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही पूरी तरह बंद होने में फर्क है, लेकिन इस बढ़त ने समुद्री सुरक्षा का जोखिम काफी बढ़ा दिया है.
- अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार, 2025 की पहली छमाही में बाब अल-मंदेब से करीब 42 लाख बैरल रोजाना तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरे थे. 2023 में यह आंकड़ा 93 लाख बैरल रोजाना तक था.
क्या तीनों रास्ते बंद होने से 30 फीसदी तेल सप्लाई बंद हो जाएगी?
होर्मुज से करीब 20 फीसदी और बाब अल-मंदेब से करीब 4-8 फीसदी के आसपास तेल प्रवाह के आंकड़े देखकर इन्हें सीधे जोड़ देना सही आकलन नहीं है. सऊदी पाइपलाइन का तेल भी अलग से पूरी तरह नई सप्लाई नहीं है, बल्कि यह सऊदी कच्चे तेल को समुद्र के दूसरे रास्ते से पहुंचाने का विकल्प है.
इसलिए यह कहना कि तीनों रास्ते बंद होते ही दुनिया की 30 फीसदी तेल सप्लाई सीधे गायब हो जाएगी, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है. असली खतरा यह है कि उपलब्ध तेल बाजार तक पहुंचने में देरी होगी, परिवहन महंगा होगा और कई देशों को लंबा वैकल्पिक समुद्री रास्ता अपनाना पड़ेगा.
भारत पर कितना असर पड़ेगा?
- भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में है और इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज उछाल का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. लेकिन भारत की स्थिति कुछ हद तक बदली भी है.
- 2026 में मध्य पूर्व से आने वाले तेल की हिस्सेदारी पहले की तुलना में घटी है, जबकि रूस और लैटिन अमेरिका जैसे स्रोतों से खरीद बढ़ी है. अप्रैल-जून 2026 में भारत के मध्य पूर्वी तेल आयात में करीब 27 फीसदी की गिरावट आई थी.
- फिर भी जोखिम खत्म नहीं हुआ है. अगर खाड़ी से सप्लाई लंबे समय तक बाधित रहती है तो भारत को रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से ज्यादा तेल खरीदना पड़ सकता है. इससे खरीद और जहाजरानी की लागत बढ़ सकती है.
- फिलहाल सबसे बड़ा खतरा तेल की तत्काल कमी से ज्यादा लंबे समय तक ऊंची कीमत और महंगी ढुलाई का है. ब्रेंट कच्चा तेल हाल में 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुका है.
- अगर होर्मुज और बाब अल-मंदेब दोनों लंबे समय तक असुरक्षित रहते हैं और सऊदी का वैकल्पिक पाइपलाइन मार्ग भी बाधित रहता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव और बढ़ सकता है.
