सवालों के घेरे में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका

United Nations : संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का सबसे बड़ा कारण प्रथम विश्व युद्ध के बाद गठित लीग ऑफ नेशंस की असफलता रही. भले ही लीग ऑफ नेशंस को 20 अप्रैल, 1946 को आधिकारिक रूप से भंग किया गया, परंतु उसके पहले ही, 24 अक्तूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कर दी गयी.

United Nations : ईरान के खिलाफ अमेरिकी-इस्राइली कार्रवाई के बाद एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका और औचित्य दोनों पर सवाल उठे हैं. दिलचस्प यह है कि अमेरिका ने अतीत में जब भी ऐसी कार्रवाई की, उसने संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावों को लागू करने का बहाना बनाया. चूंकि मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अलबेले राजनेता हैं, उनके लिए नियम-कायदों से ज्यादा उनकी अपनी जुबान और सोच मायने रखती है. इसलिए, ईरान के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ की ओट लेने की औपचारिकता भी नहीं निभायी.

संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का सबसे बड़ा कारण प्रथम विश्व युद्ध के बाद गठित लीग ऑफ नेशंस की असफलता रही. भले ही लीग ऑफ नेशंस को 20 अप्रैल, 1946 को आधिकारिक रूप से भंग किया गया, परंतु उसके पहले ही, 24 अक्तूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कर दी गयी. इसकी स्थापना के लिए बड़ा आधार जापान पर हुए अमेरिकी परमाणु बम हमले के बाद उपजी मानवीय त्रासदी रही.
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का प्राथमिक उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाना और विश्व में शांति और सुरक्षा बनाये रखना था. पर प्रश्न यह है कि क्या वह अपने इस प्राथमिक उद्देश्य में सफल है? इस पर चर्चा से पहले संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर ध्यान देना जरूरी है, जिसके अनुसार संयुक्त राष्ट्र का मुख्य उद्देश्य, दुनियाभर में शांति बनाये रखना और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का शांतिपूर्ण समाधान करना है.

इसके साथ ही, उसका एक और मकसद राष्ट्रों के बीच समानता और आत्म निर्णय के सिद्धांतों के आधार पर दोस्ताना संबंधों का विकास करना भी रहा है. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में साफ लिखा है कि यह अंतरराष्ट्रीय संगठन बिना किसी जाति, लिंग, भाषा या धर्म के भेदभाव के पूरी दुनिया के मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देगा. उसका मकसद, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय समस्याओं को हल करने के लिए राष्ट्रों के बीच सहयोग स्थापित करने के साथ ही, गरीबी दूर करने, भूख, बीमारी और निरक्षरता से लड़ने तथा प्राकृतिक आपदाओं के समय सहायता प्रदान करने के लिए कार्य करना भी है.

इसके साथ ही, उसकी भूमिका अंतरराष्ट्रीय संधियों और कानूनों के प्रति सम्मान बनाये रखने के लिए प्रयास करने की भी है. कह सकते हैं कि संयुक्त राष्ट्र की भूमिका ऐसे समन्वय केंद्र के रूप में कार्य करने की सोची गयी, जिसके मंच पर विश्व के सभी राष्ट्र उसके साझा लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मिलकर काम कर सकें. पर प्रश्न यह है कि क्या संयुक्त राष्ट्र संघ ऐसा कर सका है? निश्चित तौर पर इसका जवाब न में है.
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य युद्धों को रोकना है. पर न तो यह शीत युद्ध को रोक सका, न ही मौजूदा दौर के संघर्षों को रोक पा रहा है. वर्ष 1991 के खाड़ी युद्ध के लिए तो अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव को ही बहाना बनाया था.

वर्ष 2001 में भी जॉर्ज बुश के बेटे जूनियर जॉर्ज बुश और तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने भी इराक और अफगानिस्तान पर हमले के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावों और उसकी सेना की ही ओट ली थी. वर्ष 1994 का रवांडा का नरसंहार हो, या फिर 2011 में दक्षिण सूडान में हुआ गृहयुद्ध, 1995 में सर्ब सेना द्वारा बोस्निया में किया गया नरसंहार हो या फिर 2010 के दौरान कथित अरब क्रांति की आड़ में हुई मध्य एशिया की हिंसा, किसी को भी रोकने में संयुक्त राष्ट्र अभियान सफल नहीं रहा. संयुक्त राष्ट्र का मंच राष्ट्रों के बीच संवाद बढ़ाने और विवादों को सुलझाने के बजाय उनके बीच गाली-गलौज और आपसी आलोचना का केंद्रभर बनकर रह गया है.

अभी संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख और ताकतवर अंग सुरक्षा परिषद है. इसका गठन ही गैर-बराबरी को बढ़ावा देने का बड़ा आधार बन गया है. इसमें तीन राष्ट्र ऐसे हैं, जो अक्सर अपने वीटो पावर का इस्तेमाल नकारात्मक तरीके से करते हैं. अमेरिका, चीन और रूस की ज्यादातर भूमिका नकारात्मक रहती है. रही बात ब्रिटेन और फ्रांस की, तो उनकी भूमिका मध्यमार्गी है. हालांकि, वे भी महत्वपूर्ण मामलों में सीधे हस्तक्षेप करने की भूमिका को प्रभावी ढंग से नहीं निभा सकते. इसका ही असर है कि ईरान पर इस्राइल और अमेरिका ने हमला कर रखा है तथा रूस एवं यूक्रेन के बीच चार वर्ष से युद्ध जारी है.


मानवाधिकार के मुद्दों पर भी संयुक्त राष्ट्र प्रभावी नजर नहीं आता. कोविड महामारी के दौरान जिस तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तीसरी दुनिया के कमजोर देशों के साथ पक्षपातपूर्ण भूमिका निभायी, वह भी संयुक्त राष्ट्र की नाकामी का प्रतीक है. जब से ट्रंप ने अमेरिका की दोबारा कमान संभाली है, तब से उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को और पंगु बनाने की कोशिश की है. विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत संयुक्त राष्ट्र के कई अंगों में उन्होंने अपनी आर्थिक भागीदारी और सहयोग घटाना शुरू कर दिया है. उनका मानना है कि संयुक्त राष्ट्र के मंचों के जरिये अमेरिकी करदाताओं की बड़ी रकम बेकार के कामों में खर्च हो रही है. ऐसे में, आने वाले दिनों में संयुक्त राष्ट्र की स्थिति और भी ज्यादा निरीह होने वाली है. ऐसे में यदि दुनिया के देश संयुक्त राष्ट्र के औचित्य पर ही सवाल उठाने लगें, तो दुनिया को हैरत नहीं होनी चाहिए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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By उमेश चतुर्वेदी

उमेश चतुर्वेदी is a contributor at Prabhat Khabar.

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