महामारी में भी नस्लीय भेदभाव

गरीब घरों में जगह की कमी है, तोबीमारी फैल भी रही है और लोग मर रहे हैं.दो-तीन और वाकये जो हाल के दिनों के हैं, उससे भी अंदाजा लग सकता है किएक समुदाय विशेष के प्रति समाज का खराब रवैया कैसे उन्हें खतरे में डालदेता है.

जे सुशील, अमेरिका में स्वतंत्र शोधार्थी

jey.sushil@gmail.com

करीब ढाई साल पहले जब मैं अमेरिका आया था, तो सबसे पहले बने दोस्तों मेंएक काला अमेरिकी था. मैं अश्वेत की जगह काला इसलिए कह रहा हूं कि वो खुदको ब्लैक कहते हैं नॉन व्हाइट यानी कि अश्वेत नहीं. पहचान की यह भाषागतलड़ाई भी कही जा सकती है. मेरी पत्नी प्रेगनेंट थी और उस मित्र ने जोसबसे पहली सलाह दी, वह यह कि बच्चे को फ्लू शॉट्स न लगवाऊं. फ्लू यानी किमौसमी बुखार, जिसके लिए यहां हर छह महीने पर इंजेक्शन लगता है. कालेदोस्त की यह सलाह तो ठीक थी, लेकिन बाद में उसने कई सारी कांस्पिरेसीथ्योरी जैसी बातें करनी शुरू की कि जो विमान से धुआं निकलता दिखता है, वहअसल में जहरीला है काले लोगों के लिए आदि आदि. मैंने उसकी बातें काटीनहीं, लेकिन मुझे यह समझ में आया कि अमेरिका में काले लोगों की एक बड़ीआबादी गोरे डॉक्टरों पर भरोसा नहीं करती है और न ही पूरे सिस्टम में उनकाभरोसा है.

कोरोना के दौरान ये बातें दिमाग में घूम ही रही थीं कि कई आंकड़ों मेंबताया गया कि मरनेवालों में काले लोगों का प्रतिशत बहुत अधिक है. मेरेशहर सेंट लुइस में अब तक 14 या 15 लोग मरे हैं, जिसमें सभी काले लोग हैं,जबकि यहां की जनसंख्या करीब आधी गोरे और आधी काले लोगों की है. मिशिगन,शिकागो, लुइसियाना और न्यूयॉर्क का डेटा भी कमोबेश ऐसा ही है, काले लोगोंकी मौतें अधिक हो रही हैं.अमेरिका के संक्रामक रोग मामलों के प्रमुख एंथनी फाउची ने भी इस मामलेमें टिप्पणी करते हुए कहा है कि स्वास्थ्य को लेकर अफ्रीकी अमेरिकीसमुदाय के साथ भेदभाव रहा ही है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता है.भेदभाव से फाउची का अभिप्राय यही था कि काले या अफ्रीकी-अमेरिकी समुदायगरीब है, जिनकी वजह से उनके घरों की हालत ठीक नहीं है, स्वास्थ्य बीमालेने में वे कई बार सक्षम नहीं होते और समुदाय में गलत सूचनाएं भीबहुतायत हैं. इसके पीछे कारण भी हैं.

तीस के दशक में एक टस्कीगी एक्सपेरिमेंट कियागया था, जिसमें पब्लिक हेल्थ सर्विस ने टस्कीगी संस्थान के साथ मिलकर यहजानने की कोशिश की कि अगर काले लोगों में किसी बीमारी का इलाज न कियाजाये, तो क्या होता है. इस प्रयोग के तहत 40 साल तक काले लोगों मेंसिफिलिस का इलाज नहीं किया गया, ताकि देखा जा सके कि यह बीमारी एक मनुष्यको लंबी अवधि में कैसे प्रभावित करती है. यानी कि अगर किसी और समुदाय केआदमी को यह बीमारी थी, तो इलाज किया जाता था, लेकिन अफ्रीकी अमेरिकियोंका नहीं. यह प्रयोग 40 साल तक किया गया, जबकि इस प्रयोग के शुरू होने के10 साल बाद ही सिफिलिस की दवा के रूप में पेनिसिलिन का इस्तेमाल होने लगाथा.

जाहिर था कि जब लोगों को इस भेदभाव का पता चला, तो स्वास्थ्य सेवाओं परसे काले लोगों का भरोसा उठ गया. अब अमेरिका के इस समुदाय को किसी भी तरहकी नयी बीमारी या हेल्थ के मामले में भरोसे में लेना एक मुश्किल काम है.यह तो अविश्वास का मामला है, लेकिन फिर काले लोगों में कोरोना अधिक क्योंफैल रहा है, यह जानने के लिए देखा जा सकता है कि जो जरूरी सेवाएं हैं,जिन्हें बंद नहीं किया गया है, उनमें कितने अफ्रीकी अमेरिकी काम करतेहैं.बंद नहीं होनेवाली सेवाओं में अमेजन के स्टोर हाउस या वे तमाम गोदाम हैं,जो ई-बिजनेस करते हैं तथा ग्रॉसरी स्टोर, मेडिकल स्टोर, बस, स्थानीयट्रेनें, सफाई करनेवाले और सड़क साफ करनेवाले आदि हैं. अब इन सारे कामोंको करनेवाले ज्यादातर लोग आपको काले ही मिलेंगे. बसों के ड्राइवर,ग्रॉसरी स्टोर में काम करनेवाले, गोदामों में कठिन परिश्रम करनेवालेलोगों में कालों की संख्या ज्यादा है.

जाहिर है कि वे बाहर निकल रहे हैं,तो उनमें वायरस ज्यादा फैल रहा है.गरीबी भी इस समुदाय में बहुत है और इस कारण भी इलाज नहीं हो पा रहा है.कोरोना के टेस्ट सरकार ने फ्री कर दिये हैं, जिसका चार्ज करीब तेरह सौडॉलर था. टेस्ट फ्री होने के बावजूद लोग टेस्ट करा नहीं रहे, क्योंकिटेस्ट फ्री है मगर इलाज के पैसे लग रहे हैं. ऐसे में लोग बीमारी होने परघर में ही खुद को क्वारंटीन कर रहे हैं. गरीब घरों में जगह की कमी है, तोबीमारी फैल भी रही है और लोग मर रहे हैं.दो-तीन और वाकये जो हाल के दिनों के हैं, उससे भी अंदाजा लग सकता है किएक समुदाय विशेष के प्रति समाज का खराब रवैया कैसे उन्हें खतरे में डालदेता है.

बीते 23 मार्च के आसपास डेट्रॉयट में एक बस ड्राइवर ने फेसबुकलाइव किया और कहा कि लोगों को बस में छींकते समय मुंह ढंकना चाहिए. वेबहुत नाराज थे, क्योंकि उनकी बस में कोई महिला लगातार खांस रही थी. इसघटना के छह से सात दिन बाद इस ड्राइवर की कोरोना से मौत हो गयी. इसी तरहपिछले सप्ताह एक शहर में ट्रेन से पुलिस ने एक व्यक्ति को खींच कर जबरनबाहर निकाला, क्योंकि उसने मास्क नहीं पहना था. वह व्यक्ति काला था.पुलिस की ऐसी घृणित कार्रवाई किसी गोरे के साथ नहीं देखी गयी.तीसरी घटना में एक काले डॉक्टर को सड़क पर पुलिस ने गिरफ्तार किया. जबउनकी पत्नी ने आइ-कार्ड दिखाया, तब उन्हें छोड़ा गया. काले डॉक्टर का दोषकुछ नहीं था.

वे सड़क पर अपनी वैन लगाकर उसमें से कोरोना की जांच किटनिकालकर सड़क पर रख रहे थे, जो बिना घर के सड़कों पर रह रहे लोगों कीजांच में काम आने थे. पुलिस का कहना था कि उन्हें लगा कि ये आदमी अपनाकूड़ा सड़क पर छोड़ रहा है.ये नस्लीय घटनाएं एक तस्वीर खींचती है कि एक समुदाय को उनके रंग के कारणकैसी परिस्थितियां अमेरिका में देखनी पड़ती हैं ऐसी बीमारी के दौरान भी.इस लिहाज से देखा जाये, तो महामारियों जैसी स्थितियों का सामाजिक दृष्टिसे भी विश्लेषण किया जाना चाहिए ताकि भविष्य में समाधान निकालने में मददमिल सके. (यह लेखक का निजी विचार है.)

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Author: जे सुशील

Published by: Prabhat Khabar

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