लगता है, हम अतीत के अनुभवों से कुछ भी सीखने को तैयार नहीं हैं, तभी दुनिया की सबसे युवा और कच्ची पर्वतमाला के मर्म को समझे बगैर उसमें सुरंगें बना रहे हैं. बात अभी 13 अगस्त, 2026 की है. उत्तराखंड के चमोली जिले के मायापुर-पीपलकोटी क्षेत्र में टीएचडीएस इंडिया लिमिटेड की विष्णुगाड़-पीपलकोटी हाइड्रो प्रोजेक्ट की तीन किलोमीटर लंबी टेल रेस टनल (सुरंग) के भीतर काम चल रहा था. सरिया वेल्डिंग/निर्माण कार्य के दौरान टनल के अंदर अचानक भारी भूस्खलन हुआ, जिससे पत्थर, मलबा और पानी टनल में घुस गया तथा मजदूर फंस गये. इस दुर्घटना में कोई आठ मजदूर तो उसी समय मारे गये और बहुत से अभी फंसे हुए हैं.
बीते कुछ वर्षों में देश के पहाड़ी राज्यों- विशेषकर उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और सिक्किम- में सुरंगों के धंसने, पहाड़ दरकने और त्रासदियों की घटनाओं में खतरनाक तेजी आयी है. उत्तरकाशी की सिलक्यारा सुरंग हो, जम्मू-कश्मीर का रामबन क्षेत्र हो, हिमाचल प्रदेश में मंडी हो या फिर सिक्किम की परियोजनाएं, हर तरफ से एक ही दर्दनाक कहानी सामने आ रही है. पहाड़ों के भीतर चल रहे इन विशाल निर्माण कार्यों के दौरान अचानक चट्टानें खिसक जाती हैं, भारी मलबा भर जाता है और दर्जनों मजदूर भीतर फंसकर अपनी जान गंवा बैठते हैं. इन हादसों ने देश की सबसे युवा और संवेदनशील पर्वतमाला की सुरक्षा और यहां चल रहे अंधाधुंध निर्माण कार्यों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं.
दुर्भाग्यपूर्ण है कि विभिन्न भारतीय संस्थानों की शोध आधारित चेतावनियां भी कथित विकास के हिमायती नजरअंदाज करते रहते हैं. अभी जून में ही आइआइटी, मद्रास के शोधकर्ताओं की एक रिपोर्ट ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है कि केदारनाथ क्षेत्र में बार-बार आने वाली आपदाएं और चारधाम मार्ग पर लगातार हो रहे भूस्खलन हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती संवेदनशीलता का संकेत हैं.
अध्ययन के अनुसार, भारतीय हिमालयी क्षेत्र के जिलों में पश्चिमी हिमालय, जिसमें उत्तराखंड भी शामिल है, पूर्वी हिमालय की तुलना में जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले खतरों के प्रति अधिक संकटग्रस्त पाया गया है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, 2025 में धराली गांव में आयी आकस्मिक बाढ़ का कारण बर्फ के टुकड़ों वाले खुले क्षेत्र का अचानक ढहना था. बर्फ की यह परत श्रीकंठ हिमनद के ‘हिम-अपरदन क्षेत्र’, यानी निवेशन जोन में स्थित थी.
इसरो ने बताया कि हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं में वृद्धि का सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है, जिसके चलते हिमनदों के तेजी से पिघलकर पतले होने, वर्षा पैटर्न में बदलाव आने और बढ़ते तापमान मौसमी बर्फ की उस परत को कम कर देते हैं, जो सामान्यतः नीचे की बर्फ को सुरक्षित रखती है. इसके साथ ही, हिमालय के राज्यों में तापीय एवं यांत्रिक अस्थिरता के चलते बर्फ के खुले व स्वतंत्र क्षेत्र तापमान में उतार-चढ़ाव और आंशिक हलचल के प्रति तेजी से प्रतिक्रिया करते हैं. इससे उनके तेजी से पिघलने, टूटने और गुरुत्वाकर्षण के कारण अचानक ढहने का खतरा बढ़ जाता है. शोध और अध्ययन यह भी बताते हैं कि हिमालय दुनिया की सबसे नयी और कच्ची पर्वत शृंखला है. भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच लगातार हो रही टक्कर के कारण यह पहाड़ लगातार ऊपर उठ रहा है और इसके भीतर भारी आंतरिक तनाव बना रहता है. इन पहाड़ों के भीतर कई ऐसी कमजोर जगहें होती हैं, जहां चट्टानें पूरी तरह से जुड़ी नहीं होतीं.
जब इन बेहद नाजुक, कच्ची और टूटी-फूटी चट्टानों के बीच सुरंगें खोदी जाती हैं, तो पहाड़ों का नाजुक प्राकृतिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है. इसके अतिरिक्त, सुरंगों के निर्माण के लिए पहाड़ों के भीतर बड़े पैमाने पर किये जाने वाले बारूद के शक्तिशाली विस्फोटों से धरती कांप उठती है. इन लगातार होने वाले विस्फोटों से भीतर की कच्ची चट्टानें और दरारें अपनी जगह से खिसक जाती हैं, जिससे पहाड़ भीतर से खोखले और अस्थिर हो जाते हैं. इतना ही नहीं, पहाड़ों के पेट में पानी के छिपे हुए भंडार होते हैं. सुरंग खोदते समय जब इन गुप्त जल स्रोतों से अचानक पानी और दलदल का रिसाव शुरू होता है, या फिर चट्टानों के भीतर दबी जहरीली और विस्फोटक गैसों के भंडार फट जाते हैं, तो अंदर का पूरा ढांचा तबाह हो जाता है.
उत्तरकाशी, चमोली और सिक्किम जैसी जगहों पर हादसों के दौरान यही देखा गया कि पानी और मलबे के अचानक आ जाने या गैस रिसाव के कारण भयानक विस्फोट होने से बड़ी तबाही मची. ऊपर से जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का चक्र पूरी तरह बदल चुका है, और पहाड़ों पर बिना मौसम के अत्यधिक वर्षा तथा बादल फटने से ऊपरी सतह की मिट्टी ढीली होकर सुरंगों के मुहानों को बहा ले जाती है. ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए सुरंग खोदने से पहले आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से पूरी जमीन की गहराई तक जांच होनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि अंदर चट्टानें कितनी कमजोर हैं या कहां विस्फोटक गैसें छिपी हैं.
निर्माण के दौरान पहाड़ों के भीतर बारूदों के भारी इस्तेमाल पर रोक लगनी चाहिए और ऐसी उन्नत तकनीकें अपनायी जानी चाहिए, जो चट्टानों के खिसकने की चेतावनी पहले ही दे दें. इसके अतिरिक्त, पहाड़ों पर पेड़ों की कटाई रोककर बड़े पैमाने पर हरियाली लौटाना और हर बड़ी सुरंग के साथ एक समानांतर निकास मार्ग का होना अनिवार्य करना चाहिए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
