मक्का समझौते पर भारत रखे पैनी नजर

वैश्विक युद्धों के बीच भारत के रणनीतिक साझेदारियों का समीकरण तेजी से बदल रहा है. अमेरिका-ईरान और रूस-यूक्रेन युद्ध के साथ-साथ मक्का समझौते जैसी नई कूटनीतिक चालें भारत के हितों के लिए नई चुनौतियां पेश कर रही हैं.

भारत के सभी रणनीतिक साझेदार युद्धों में उलझे हुए हैं, जिनका भारत के हितों पर प्रभाव पड़ रहा है. अमेरिका-ईरान-इस्राइल युद्ध ने जहां नयी परिस्थितियां पैदा की हैं, वहीं रूस-यूक्रेन-नाटो युद्ध ने भी अलग गतिशीलता विकसित की है. पिछले वर्ष हमारे एक रणनीतिक साझेदार इस्राइल ने दूसरे रणनीतिक साझेदार कतर पर हमला किया था, और हमारे व्यापक रणनीतिक साझेदार सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किये. अब इसे ‘मक्का समझौते’ के जरिये तुर्किये तक विस्तृत किया गया है.

तुर्किये खुद भी भारत का प्रतिद्वंद्वी रहा है. मक्का समझौते को रावलपिंडी अपने ‘इस्लामी बम’ के सहारे ‘इस्लामी नाटो’ के रूप में पेश करने में खुश है. इसकी वास्तविक प्रभावशीलता पर सवाल उठ सकते हैं, पर इसके राजनीतिक प्रभाव की अनदेखी नहीं की जा सकती. समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देशों ने इसे ‘आस्था, मित्रता और शांति तथा सुरक्षा के साझा संकल्प से एकजुट तीन भाईचारे वाले राष्ट्र’ के रूप में रेखांकित किया है. इसका उद्देश्य ऐसा बहुस्तरीय प्रतिरोधक तंत्र तैयार करना है, जिसमें तुर्किये के ड्रोन और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता से पैदा होने वाली रणनीतिक छाया का इस्तेमाल किया जा सके.

नाटो और गैर-नाटो सहयोगी तथा साझेदार सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता का प्रदर्शन करने के लिए एकजुट होने की कोशिश में हैं. दरअसल, पाकिस्तान द्वारा सऊदी अरब और तुर्किये के साथ मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद पाक रक्षा मंत्री ने व्यापक ‘इस्लामी नाटो’ के गठन की मांग तेज करते हुए मुस्लिम देशों से भारत और इस्राइल द्वारा पेश की जाने वाली सुरक्षा चुनौतियों के खिलाफ एकजुट होने का आग्रह किया. जाने-माने टिप्पणीकार हुसैन हक्कानी के मुताबिक, पश्चिम एशिया की प्रतिद्वंद्विताओं के बीच पाकिस्तान रणनीतिक प्रभाव हासिल करने के लिए सऊदी अरब और तुर्किये के साथ अपने सैन्य संबंधों का लाभ उठा रहा है.

हालांकि, उनका कहना है कि क्षेत्र में पाकिस्तान की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि वह जटिल प्रतिद्वंद्विताओं को किस तरह संभालता है और पश्चिम एशिया के देश सुरक्षा साझेदारियों के लिए पाकिस्तान का साथ देने के लिए भारत के साथ अपने बढ़ते आर्थिक संबंधों को जोखिम में डालने के लिए कितने तैयार हैं. बेशक हूती समस्या और ईरान के साथ रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता रियाद के लिए चिंताजनक हैं. संयुक्त अमेरिकी-इस्राइली सैन्य शक्ति के बावजूद ईरान को पराजित करने की अमेरिकी क्षमता और उसकी सुरक्षा छतरी पर घटते भरोसे के साथ चीन-पाकिस्तान धुरी और उसे अमेरिका के अप्रत्यक्ष समर्थन ने मक्का समझौते को कुछ अतिरिक्त लाभकारी तत्व दिये हो सकते हैं.

भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता बनाये रखते हुए संवाद और कूटनीति का रास्ता अपनाने का आह्वान किया है. प्रधानमंत्री मोदी ने सभी संबंधित नेताओं से बात की और शुरुआत से ही तनाव कम करने के प्रयास किये, साथ ही, संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान का आह्वान किया. विडंबना यह है कि अमेरिका-ईरान युद्ध में ऐसे क्षेत्रीय और क्षेत्र से बाहर के पक्ष भी शामिल हैं, जो भारत के रणनीतिक साझेदार हैं, चाहे वह अमेरिका, इस्राइल, ईरान हो या इस संघर्ष से प्रभावित खाड़ी देश. इससे स्थिति और जटिल हो जाती है तथा आपूर्ति शृंखला में व्यवधान बढ़ता है. ऐसे में भारत के विकल्प सीमित हो जाते हैं तथा ऊर्जा सुरक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण जरूरी हो जाता है. यहां भी भारत के लिए चुनौती है.

रूस से होने वाले भारत के 40 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा आयात पर अमेरिका द्वारा 100 फीसदी शुल्क का दबाव पड़ सकता है. यह अपेक्षित था कि एक ओर अमेरिका और इस्राइल तथा दूसरी ओर ईरान व उसके सहयोगियों के बीच लंबे समय से टाला जा रहा प्रत्यक्ष संघर्ष अंततः नये समीकरणों और नयी गतिशीलता को जन्म देता. यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब महाशक्तियां अपने सहयोगियों और साझेदारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की क्षमता खो रही हैं. पाकिस्तान, जो एक आश्रित अर्थव्यवस्था वाले देश के रूप में अपने रणनीतिक महत्व को भुनाने में माहिर है, फिर जोखिम उठाने के लिए आगे बढ़ गया है. हालांकि, मौजूदा क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताओं के बीच आगे बढ़ना उसके लिए आसान नहीं. पर घरेलू सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक और वित्तीय संकट को देखते हुए उसे अपनी निरंतर प्रासंगिकता का दावा बनाये रखना जरूरी है.

पर ईरान और हूती संगठन पाकिस्तान को सऊदी अरब की कड़ी निगरानी में रखेंगे. बेशक उसे अल्पकालिक लाभ मिलेंगे और कतर जैसे कुछ अन्य देश भी इस त्रिपक्षीय गठबंधन में शामिल होने वाले अगले देशों में हो सकते हैं. कतर में अमेरिकी और तुर्किये के सैन्य अड्डे हैं और वह सऊदी खेमे में है. कुवैत पहले ही पाकिस्तान के साथ समझौते की ओर अपना झुकाव दिखा चुका है और मिस्र भी संभावित रूप से इसमें शामिल हो सकता है. नाटो जैसी शर्त के बारे में कि ‘एक पर हमला सभी पर हमला माना जायेगा’, तो सच्चाई समय पर ही सामने आयेगी. इस गठजोड़ के बीच सऊदी अरब का रुख भारत के लिए महत्वपूर्ण और चिंताजनक हो सकता है. लेकिन इस संबंध में मुझे एक सेवानिवृत्त पाकिस्तानी जनरल से हुई बातचीत याद आती है. उन्होंने मजाकिया अंदाज में पूछा था, ‘क्या आपको लगता है कि भारत-पाकिस्तान युद्ध की स्थिति में सऊदी हमारी मदद के लिए आयेगा?’ पर रावलपिंडी को उन्नत अमेरिकी और पश्चिमी हथियारों, उपकरणों और सैन्य प्लेटफॉर्म की उपलब्धता तथा उनके साथ संचालन की क्षमता से लाभ मिल सकता है.

इसके अलावा, वह पहले से ही चीनी हथियारों और सैन्य प्रणालियों के मामले में प्रशिक्षण और समर्थन हासिल कर रहा है. भारत को अपनी जवाबी रणनीति तैयार करते समय इस पहलू को भी ध्यान में रखना होगा. कई विश्लेषकों का अनुमान है कि इन बढ़ते घटनाक्रमों और सैन्य स्तर पर बढ़ती साझेदारी से इस्राइल, संयुक्त अरब अमीरात और व्यापक अब्राहम समझौता ढांचे के साथ भारत की नजदीकी साझेदारी बढ़ सकती है. यह इतना आसान नहीं भी हो सकता है, पर कुछ भी संभव है. भारत को अपनी सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हर संभावित परिस्थिति, समीकरण और संयोजन की तैयारी करनी होगी. हालांकि, खुद को दो ध्रुवों वाले विकल्पों में उलझा लेना वांछित परिणाम नहीं दे सकता. फिलहाल, सभी इस उम्मीद में सांस रोके हुए हैं कि युद्ध तथा उन्माद एक और तनाव बढ़ने के जाल में न फंस जायें. पर उम्मीद रणनीति नहीं है, तैयारी ही रणनीति है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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लेखक के बारे में

By अनिल त्रिगुणायत

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