-आकांक्षा जैन-
Energy transition : भारत का एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम पिछले एक दशक में तेजी से विकसित हुआ है. जो प्रयास शुरू में पेट्रोल में सीमित मात्रा में एथेनॉल मिलाने तक सीमित था, वह अब देश की ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ गतिशीलता रणनीति के प्रमुख स्तंभों में एक बन चुका है. देश ने 2014 में 1.5 फीसदी मिश्रण से बढ़ते हुए निर्धारित समय से पहले ही इ20 मिश्रण यानी पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य हासिल कर लिया है. केंद्र सरकार अब इससे भी अधिक मिश्रण की तैयारी कर रही है. इस परिवर्तन का मुख्य उद्देश्य कच्चे तेल का आयात कम करना रहा है. सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, इस परिवर्तन ने विदेशी मुद्रा में 1.84 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत की है. इस प्रकार, एथेनॉल मिश्रण को पेट्रोल की खपत कम करने, विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह को घटाने, घरेलू ईंधन लचीलापन बढ़ाने और ग्रामीण आय में अतिरिक्त वृद्धि करने के रणनीतिक साधन के रूप में पेश किया गया है.
आज देश का एथेनॉल तंत्र मुख्य रूप से प्रथम पीढ़ी के फीडस्टॉक्स, खासकर गन्ना, मक्का और टूटे हुए चावल पर आधारित है. इस कार्यक्रम ने गन्ना और मक्का किसानों को लाभ पहुंचाये हैं. गन्ना मिलों के बकाये, जो किसानों की परेशानी का प्रमुख कारण रहे हैं, काफी कम हुए हैं, क्योंकि अन्नदाता अब ऊर्जा उत्पादक भी बन गये हैं और अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं. इस कार्यक्रम ने किसानों को करीब 1.58 लाख करोड़ रुपये कमाने में मदद की है. खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्सों में डिस्टिलरियों की बढ़ती औद्योगिक मांग के कारण मक्के की खेती का विस्तार हुआ है. एथेनॉल ऊर्जा सुरक्षा, ग्रामीण आय सृजन और कृषि बाजार स्थिरता का पर्याय बन गया है. इन लाभों के बावजूद वाहन उपयोगकर्ताओं द्वारा अक्सर ईंधन दक्षता और इंजन पर ईंधन मिश्रण के प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है. चूंकि एथेनॉल का ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से कम होता है, इसलिए अधिक एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन से वाहन की माइलेज कम होने की रिपोर्ट मिली है, खासकर उन वाहनों में, जो इ20 के अनुकूल नहीं हैं.
इस संदर्भ में हाल ही में जारी एफएफवी अधिसूचना एक महत्वपूर्ण नीतिगत कदम है. एफएफवी ऐसे वाहन हैं, जो इ20 से इ100 तक के एथेनॉल मिश्रण पर चल सकते हैं और उपभोक्ताओं को किसी एक मिश्रण तक सीमित नहीं करते. इलेक्ट्रिक वाहन शहरी परिवहन और कम दूरी की यात्रा के लिए महत्वपूर्ण हैं, पर इसका सभी क्षेत्रों में समान रूप से उपयुक्त होना संभव नहीं है. लंबी दूरी के माल परिवहन, ग्रामीण परिवहन, कृषि मशीनरी और कमजोर चार्जिंग अवसंरचना वाले क्षेत्रों में निकट भविष्य तक तरल ईंधनों की जरूरत बनी रह सकती है. बेशक इ20 से अधिक मिश्रण हमारे जीवाश्म तेल उपभोग और विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह को और कम कर सकता है, पर चर्चा को केवल मिश्रण लक्ष्यों तक सीमित नहीं रखना चाहिए. इसे इस बदलाव के व्यापक पर्यावरणीय और आर्थिक प्रभावों तक विस्तारित करना होगा. गन्ना देश में उगायी जाने वाली सबसे अधिक पानी की खपत वाली फसलों में एक है और इसे अक्सर उन क्षेत्रों में उगाया जाता है, जहां पहले से ही भूजल पर दबाव है. इसकी खेती में सिंचाई के लिए सब्सिडाइज्ड बिजली दी जाती है और उच्च उर्वरक उपयोग जरूरी है. मक्के की खेती में गन्ने की तुलना में पानी की खपत कम है, फिर भी एथेनॉल की मांग बढ़ने के साथ ईंधन अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है. बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत का एथेनॉल परिवर्तन आयातित जीवाश्म तेल पर निर्भरता को सब्सिडाइज्ड पानी, बिजली और आयातित उर्वरकों पर निर्भरता में बदल रहा है.
यद्यपि एथेनॉल वाहन के एग्जॉस्ट से निकलने वाले उत्सर्जन को कम कर सकता है, पर इसके जलवायु लाभों का मूल्यांकन केवल दहन चरण के आधार पर नहीं किया जा सकता. इसके संपूर्ण उत्पादन शृंखला पर ध्यान देने की जरूरत है. इसमें उर्वरक उपयोग, भूजल दोहन, सिंचाई के लिए बिजली की खपत, परिवहन, डिस्टिलेशन के लिए ऊर्जा, फीडस्टॉक उत्पादन से जुड़े भूमि उपयोग परिवर्तन तथा पूरी मूल्य शृंखला में होने वाले उत्सर्जन जैसे घटक शामिल होने चाहिए. एक बड़ी चिंता कृषि पैटर्न पर दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर भी है. यदि एथेनॉल की मांग गन्ना और मक्का की खेती को लगातार प्रोत्साहित करती रही, तो फसल विविधीकरण और मिट्टी की स्थिरता का क्या होगा?
एकल फसल प्रणाली का विस्तार अल्पकाल में किसानों की आय बढ़ा सकता है, पर समय के साथ यह पारिस्थितिक स्थिरता को कमजोर कर सकता है और संसाधनों पर दबाव बढ़ा सकता है, जिसका प्रभाव उन्हीं किसानों पर पड़ेगा जो इन ईंधन फसलों की खेती कर रहे हैं. इसमें खाद्य सुरक्षा का भी एक अंतर्निहित पहलू है. अभी ‘अधिशेष’ गन्ना या टूटे हुए चावल को एथेनॉल उत्पादन के लिए उपयोग किया जा रहा है. समय के साथ यह कृषि परिदृश्यों को इस प्रकार बदल सकता है कि खाद्य सुरक्षा, भूजल उपयोग और क्षेत्रीय पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है. ऐसे में, भारत को द्वितीय पीढ़ी के जैव ईंधनों को प्राथमिकता देनी चाहिए. भारत सालाना करीब 50 करोड़ टन कृषि अवशेष उत्पन्न करता है, जिसका बड़ा हिस्सा जला दिया जाता है और इससे गंभीर वायु प्रदूषण होता है. फसल अवशेषों, नगर निगम कचरे और गैर खाद्य जैव द्रव्य को एथेनॉल में परिवर्तित करना प्रथम पीढ़ी के फीडस्टॉक्स के अनिश्चित विस्तार की तुलना में अधिक टिकाऊ है.
वर्तमान नीतिगत समर्थन अब भी प्रथम पीढ़ी अवसंरचना के तेज विस्तार के पक्ष में है. इससे भारत मिश्रण लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है और विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह को कम कर सकता है, पर इससे देश एक ऐसे संसाधन गहन जैव ईंधन मार्ग में फंस सकता है, जिसका मिट्टी और भूजल पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा. उद्देश्य केवल पेट्रोल में एथेनॉल का प्रतिशत बढ़ाना नहीं होना चाहिए, देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए वास्तव में टिकाऊ और निम्न कार्बन ईंधन तंत्र का निर्माण होना चाहिए. हमारा एथेनॉल कार्यक्रम ग्रामीण आय बढ़ाने में सहायक रहा है, लेकिन यदि दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है, तो इस बदलाव का मूल्यांकन व्यापक ‘प्रणालीगत’ दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए. कार्बन उत्सर्जन में कमी के दावों को केवल मिश्रण लक्ष्यों के आधार पर नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन चक्र आकलनों द्वारा समर्थित होना चाहिए. सफलता का वास्तविक मापदंड यह नहीं होगा कि मिश्रण प्रतिशत कितनी तेजी से बढ़ते हैं, बल्कि यह होगा कि निर्मित किया जा रहा तंत्र आगे आर्थिक और पारिस्थितिक दृष्टि से कितना टिकाऊ होगा.
(ये लेखकद्वय के निजी विचार हैं.)
