गैर पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों का कुशल प्रबंधन ही समाधान

Energy Sources : आंकड़े बताते हैं कि भारत में आज भी लगभग 40 प्रतिशत ग्रामीण परिवार लकड़ी, गोबर और फसल अवशेष जैसे ठोस ईंधनों पर निर्भर हैं. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आइआए) के अनुसार, इन पारंपरिक ईंधनों से उत्पन्न घरेलू वायु प्रदूषण हर साल लाखों लोगों की असमय मृत्यु का कारण बनता है.

Energy Sources : भारत की ऊर्जा बहस अक्सर बड़े उद्योगों, बिजली उत्पादन और पेट्रोलियम आयात के इर्द-गिर्द घूमती है, लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि देश की ऊर्जा खपत का एक बड़ा हिस्सा चुपचाप हमारी रसोई में खर्च होता है. भोजन पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा न केवल घरेलू अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है, बल्कि पर्यावरण, स्वास्थ्य और सामाजिक संरचना पर भी गहरा असर डालती है. ऐसे में हमें अब ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों के कुशल प्रबंधन की ओर ध्यान देना चाहिए. इस कुशल प्रबंधन से हम अपने देशी ऊर्जा संसाधनों को विकसित कर ऊर्जा के घरेलू खपत के मामले में आत्मनिर्भर हो सकते हैं.


आंकड़े बताते हैं कि भारत में आज भी लगभग 40 प्रतिशत ग्रामीण परिवार लकड़ी, गोबर और फसल अवशेष जैसे ठोस ईंधनों पर निर्भर हैं. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आइआए) के अनुसार, इन पारंपरिक ईंधनों से उत्पन्न घरेलू वायु प्रदूषण हर साल लाखों लोगों की असमय मृत्यु का कारण बनता है. यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा है, जिसका सबसे अधिक असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है. ऐसे परिदृश्य में गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोत-विशेषकर रसोई के लिए-एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुके हैं. गैर पारंपरिक ऊर्जा स्रोत वे ऊर्जा स्रोत हैं, जो पारंपरिक स्रोतों (कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस) से अलग हैं और पर्यावरण पर कम प्रभाव डालते हैं. गोबर गैस या बायोगैस इसका सबसे सशक्त उदाहरण है.

ग्रामीण भारत में उपलब्ध जैविक संसाधनों-जैसे गोबर और रसोई अपशिष्ट-से तैयार यह गैस न केवल सस्ती और सुलभ है, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी है. इससे निकलने वाला अवशेष जैविक खाद के रूप में खेतों की उर्वरता बढ़ाता है, जिससे यह एक समग्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार बन सकता है. नवीन एवं नवीकरणीय उर्जा मंत्रालय के आंकड़े के अनुसार, फिलहाल भारत में लगभग 50 लाख परिवार ही गोबर गैस या बायोगैस का उपयोग कर रहे हैं, जबकि हमारे देश में कुल परिवारों की संख्या लगभग 25 करोड़ है. यदि क्षमता की बात की जाये, तो मंत्रालय द्वारा एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में 12 से 15 करोड़ परिवार को गोबर गैस या फिर बायोगैस से जोड़ा जा सकता है. इस मामले में सरकार का भी प्रयास थोड़ा लचर रहा है. एक ओर जहां उज्जवला आदि योजना के माध्यम से सरकार द्वारा एलपीजी को प्रोत्साहित किया गया, वहीं स्वदेशी तकनीक को प्रोत्साहित नहीं किया गया.

इसके अलावा गैर पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों में मुख्यतः सौर ऊर्जा-सूरज की रोशनी से बिजली बनाना (सोलर पैनल), पवन ऊर्जा-हवा की गति से टर्बाइन चलाकर बिजली बनाना, जल विद्युत- पानी की गतिज ऊर्जा से बिजली बनाना (हाइड्रोपावर), भूतापीय ऊर्जा- पृथ्वी की आंतरिक गर्मी से ऊर्जा प्राप्त करना, बायोमास ऊर्जा-जैविक पदार्थों (कृषि अवशेष, लकड़ी) से ऊर्जा बनाना आदि आते हैं. ये सभी गैर पारंपरिक स्रोत पर्यावरण अनुकूल हैं, हमारी प्रकृति में उपलब्ध हैं या प्रकृति प्रदत्त हैं एवं नवीकरणीय (ये स्रोत प्राकृतिक रूप से पुनःपूर्ति होते रहते हैं). इन स्रोतों को स्थानीय विकास के साथ जोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और ऊर्जा सुरक्षा प्रदान की जा सकती है.


सौर ऊर्जा भी इस दिशा में एक क्रांतिकारी विकल्प हो सकता है. सोलर कुकर और सामुदायिक सोलर किचन जैसे प्रयोग ये साबित कर रहे हैं कि सूरज की ऊर्जा से भोजन पकाना न केवल संभव है, बल्कि दीर्घकाल में यह अत्यंत किफायती भी है. हालांकि मौसम पर निर्भरता और धीमी प्रक्रिया जैसी सीमाएं हैं, फिर भी तकनीकी सुधारों के साथ यह विकल्प तेजी से व्यावहारिक होता जा रहा है. इसके अलावा बायोमास गैसीफायर और उन्नत चूल्हे जैसी तकनीकें पारंपरिक ईंधनों को अधिक दक्ष और कम प्रदूषणकारी बनाने का काम कर रही हैं. ये समाधान विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण हैं, जहां पूर्ण रूप से स्वच्छ ऊर्जा में संक्रमण अभी संभव नहीं है. वहीं, बायो एथेनॉल और बायो एलपीजी जैसे नये प्रयोग भविष्य के ऊर्जा विकल्पों की दिशा दिखाते हैं, जो कृषि अपशिष्ट को उपयोगी ईंधन में बदल सकते हैं.


इधर के दिनों में सरकार ने भी इस दिशा में थोड़ी पहल की है. नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा बायोगैस और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं. इसके बावजूद जमीनी स्तर पर चुनौतियां बनी हुई हैं-चाहे वह जागरूकता की कमी हो, प्रारंभिक लागत का बोझ हो या तकनीकी रखरखाव की समस्या हो. इस दिशा में प्रगति का अभाव साफ देखने को मिल रहा है. यह स्पष्ट है कि केवल योजनाएं और तकनीकें इस बदलाव को संभव नहीं बना सकतीं. इसके लिए सामाजिक स्वीकृति, स्थानीय भागीदारी और नीति के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है. जब तक ग्रामीण समुदाय इन विकल्पों को अपने जीवन का हिस्सा नहीं बनाते, तब तक यह परिवर्तन अधूरा रहेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Author: अशोक भगत

Published by: Rajneesh Anand

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.

Read More

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >