तेल की दोहरी मार का सामना करता देश

Oil Crisis : भारत अपने खाद्य तेलों का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है- इंडोनेशिया और मलेशिया से पाम ऑयल, अर्जेंटीना और ब्राजील से सोयाबीन तथा रूस और यूक्रेन से सूरजमुखी तेल. पश्चिम एशिया संकट ने वैश्विक कमोडिटी बाजारों को हिला दिया है और कच्चे तेल के साथ वनस्पति तेल की कीमतों में भी उछाल ला दिया है.

Oil Crisis : मार्च में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा परिवारों के बीच किये गये द्विमासिक ‘मुद्रास्फीति प्रत्याशा सर्वेक्षण’ से पता चलता है कि आम जनता के बीच महंगाई 7.2 प्रतिशत है. यह फरवरी में 3.2 प्रतिशत की आधिकारिक सीपीआइ (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) रीडिंग के दोगुने से भी अधिक है. रिजर्व बैंक का सर्वेक्षण यह भी दिखाता है कि परिवारों को अगले तीन महीनों में कीमतों में 8.5 प्रतिशत और साल भर में 8.8 फीसदी की वृद्धि की उम्मीद है. यह कोई सांख्यिकीय विसंगति नहीं, जिया हुआ अनुभव है. आधिकारिक आंकड़ों और धरातल पर व्याप्त वास्तविकता के बीच का यह अंतर शायद ही कभी राजनीतिक रूप से इतना संवेदनशील रहा हो.


इस बीच भारत तेल की दोहरी मार में फंसा हुआ है. पहला है ईंधन. पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण मार्च में कच्चे तेल की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचने से परिवहन और बिजली की लागत, तथा लगभग सभी निर्मित वस्तुओं की कीमत बढ़ रही है. रिजर्व बैंक खुद स्वीकार करता है कि यदि पश्चिम एशिया में हमले फिर से शुरू होते हैं, तो इस वर्ष के लिए उसका 85 डॉलर प्रति बैरल का आधारभूत अनुमान आसानी से ध्वस्त हो जायेगा. अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम जारी है. पहले दौर की शांति वार्ता सफल नहीं रही और संघर्ष की बहाली तेल की कीमत और मुद्रास्फीति को ऊपर ले जायेगी. दूसरा तेल खाद्य तेल है.

भारत अपने खाद्य तेलों का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है- इंडोनेशिया और मलेशिया से पाम ऑयल, अर्जेंटीना और ब्राजील से सोयाबीन तथा रूस और यूक्रेन से सूरजमुखी तेल. पश्चिम एशिया संकट ने वैश्विक कमोडिटी बाजारों को हिला दिया है और कच्चे तेल के साथ वनस्पति तेल की कीमतों में भी उछाल ला दिया है. खुदरा खाद्य तेल की कीमत एक सप्ताह में एक से चार रुपये प्रति किलोग्राम तक बढ़ गयी है. मार्च में भारत का पाम ऑयल आयात 19 फीसदी गिरकर तीन महीने के निचले स्तर पर आ गया. इससे आने वाले महीनों में घरेलू उपलब्धता और कम होगी.

कच्चा तेल और खाद्य तेल घरेलू बजट को झुलसा रहे हैं. स्वास्थ्य सेवा, दवाओं, शिक्षा, परिवहन और मकान किराये में महंगाई का अनुभव कई वर्षों से उच्च बना हुआ है. हाल ही में संशोधित सीपीआइ बास्केट में अब भी एक संरचनात्मक दोष है. यह उन पुराने किरायेदारों द्वारा दिये गये किराये को दर्ज करता है, जिनके लीज में सालाना पांच-दस प्रतिशत की निश्चित वृद्धि होती है, न कि उन बाजार किरायों को, जो नये आने वालों को भुगतने पड़ते हैं. भारतीय शहरों में ब्रोकर और किरायेदार नियमित रूप से किराये में दोहरे अंकों की वृद्धि की रिपोर्ट करते हैं, जबकि आधिकारिक आवास मुद्रास्फीति कम बनी हुई है. यह सब वास्तविक मजदूरी में ठहराव की पृष्ठभूमि में हो रहा है, खासकर ग्रामीण भारत में. जब हर चीज की कीमत बढ़ती है और मजदूरी उस गति से नहीं बढ़ती, तब परिवार पोषण में कटौती करते हैं, चिकित्सा देखभाल टालते हैं और बच्चों को निजी स्कूलों से निकाल लेते हैं.

हरियाणा के मानेसर और उत्तर प्रदेश के नोएडा में वेतन वृद्धि के लिए हुए विरोध प्रदर्शन केवल श्रम विवाद नहीं, मुद्रास्फीति की सामाजिक अभिव्यक्ति हैं. हालांकि, विरोध प्रदर्शन के बाद मजदूरों के न्यूनतम वेतन में वृद्धि की गयी, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है. भारत में लगभग 40 करोड़ आंतरिक प्रवासी श्रमिक हैं, जो भोजन और ईंधन की लागत के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं. भोजन की कीमत दोगुनी होने और एलपीजी के दुर्लभ हो जाने पर अनेक श्रमिक अपने गांव लौट गये. ‘इंडिया एसएमइ फोरम’ का कहना है कि एक बार मजदूर वापस चले जाते हैं, तो उन्हें वापस लाना बहुत कठिन होता है. वैश्विक आपूर्ति शृंखला व्यवधानों का दबाव झेल रहे देश की विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए यह खतरा वास्तविक है.


व्यापक आर्थिक मोर्चे पर पिछले वित्त वर्ष में डॉलर के मुकाबले रुपया 10 प्रतिशत गिर गया. मार्च में गिरावट तेज थी और विनिमय दर 95 के पार चली गयी. रिजर्व बैंक ने एक नाटकीय कार्रवाई के साथ हस्तक्षेप किया. इसने घरेलू बैंकों की रुपया-डॉलर दर में ‘ऑफशोर सट्टेबाजी’ में भागीदारी पर लगभग प्रतिबंध लगा दिया है. इसे नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड मार्केट कहा जाता है, जो तकनीकी रूप से रिजर्व बैंक के नियामक दायरे से बाहर है और सिंगापुर, लंदन या न्यूयॉर्क में संचालित होता है. करीब 149 बिलियन डॉलर प्रतिदिन का यह ऑफशोर मार्केट गिरते रुपये के खिलाफ हेजिंग का अवसर देता है. ऑनशोर (घरेलू) लोगों के लिए यह भांपने का संकेत भी है कि रुपया किस ओर जायेगा.

रिजर्व बैंक की इस अचानक कार्रवाई से रुपया उछला, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान में युद्ध जारी रहने पर क्या यह टिक पायेगा. रुपये को संभालने के हस्तक्षेप में मार्च में ही भारत को 30.5 अरब डॉलर के कीमती विदेशी मुद्रा भंडार का नुकसान हुआ है. रिजर्व बैंक ने रुपये की कमजोरी से लाभ कमाने के लिए ऑफशोर-ऑनशोर अंतर का उपयोग करने वाले बैंकों पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है. लेकिन कोई भी सतर्क पर्यवेक्षक यह पायेगा कि ऑफशोर एनडीएफ मार्केट केवल एक लक्षण है, बीमारी नहीं. देश की बीमारी तो चालू खाते का वह घाटा है, जो उच्च तेल आयात बिलों के कारण बढ़ गया है. यह दो वर्षों में 26 अरब डॉलर के बाहर जाने और शुद्ध एफडीआइ के शून्य या नकारात्मक होने का नतीजा है. ये हमारी अर्थव्यवस्था की कमजोरियां हैं.


आइएमएफ और विश्व बैंक ने अपनी वसंतकालीन बैठक में वैश्विक विकास अनुमान घटाये हैं. दूसरी तरफ, हमारे यहां रिजर्व बैंक ने रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर रखा है और 2026-27 में मुद्रास्फीति को औसतन 4.6 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है. ये सावधानीपूर्वक की गयी गणना से जुड़े अनुमान हैं. लेकिन अगर तेल की कीमत ऊंची बनी रहती है, पश्चिम एशिया में युद्धविराम टूट जाता है और मॉनसून निराश करता है, जिनमें से किसी को भी असंभव नहीं माना जा सकता, तो इन अनुमानों का बचाव करना कठिन होगा. भारतीय परिवार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से जुड़ी प्रेस विज्ञप्तियां नहीं पढ़ता. वह खाद्य तेल के डिब्बे पर लिखी कीमत, गैस सिलेंडर के बिल, स्कूल फीस के नोटिस और मेडिकल चालान पढ़ता है. और इससे जुड़ी हकीकत रिजर्व बैंक के सर्वेक्षण में दिख रही है कि कीमतें आधिकारिक दर के दोगुने से भी अधिक गति से बढ़ रही हैं. इन दिनों यही चीज मायने रखती है. यह स्पष्ट रूप से कह रही है कि परेशानियों का यह दौर अभी खत्म नहीं हुआ है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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