जलवायु परिवर्तन के खतरे

बदलते प्राकृतिक स्वरूप में ‘जीवन एवं जीविका’ को बचाना बहुत बड़ी चुनौती है, जिसे हमें स्वीकारते हुए नवाचार पर विशेष जोर देना चाहिए.

कोरोना महामारी से बचने के लिए वैज्ञानिकों एवं चिकित्सकों ने तोड़ तो निकाल लिया है, लेकिन आनेवाले समय में इस प्रकार की और कई महामारियां हमारे जीवन को प्रभावित करेंगी. दूसरी लहर के विषाणु पहले वाली महामारी के विषाणु से भिन्न थे. कोविड के विषाणु लगातार अपने प्रारूप में परिवर्तन कर रहे हैं. दुनियाभर के वैज्ञानिक नये-नये वैरिएंट के सामने किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे हैं. यह प्रश्न मुंह बाये खड़ा है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?

विज्ञान में गहरी रूचि रखनेवाले और खोजों पर नजर रखनेवालों का दावा है कि हमारी पृथ्वी की जलवायु बदल रही है. जानकार तो यह भी दावा कर रहे हैं कि वर्तमान महामारी का जलवायु परिवर्तन के साथ कोई संबंध जरूर है. यदि ऐसा है, तो मानवता के सामने और कई चुनौतियां उत्पन्न होंगी.

जलवायु बदलाव पर दुनियाभर में बहस हो रही है. जलवायु परिवर्तन पर चिंतन करनेवाले समूह के देशों के प्रमुख इस बात पर एकमत हैं कि यह परिवर्तन हमारे विकास की अवधारणा से उत्पन्न हुआ है और इस अवधारणा को बदलकर इसे ठीक किया जा सकता है. इस समूह का एक महत्वपूर्ण घटक देश भारत है. भारत इस बात को पहले से कहता रहा है कि दुनिया के प्रभावशाली राष्ट्र अपने विकास की अवधारणा में परिवर्तन करें,

इसके कारण प्रकृति को क्षति पहुंच रही है और आनेवाले समय में इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी. सच पूछिए, तो हम जिस विकास मॉडल पर चल रहे हैं, वह प्रकृति के अनुकूल नहीं, अपितु प्रकृति पर विजय की रणनीति का हिस्सा है. जिस वातावरण में हम निवास करते हैं, उसके हित में तो यह कदापि नहीं है. इसलिए अब विकास के उस मॉडल की खोज पर माथापच्ची हो रही है, जो प्रकृति को कम-से-कम क्षति पहुंचाए.

बदलते प्राकृतिक स्वरूप में ‘जीवन एवं जीविका’ को बचाना बहुत बड़ी चुनौती है, जिसे हमें स्वीकारते हुए नवाचार पर विशेष जोर देना चाहिए. यह नवाचार न सिर्फ अनुसंधान, मूलभूत भौतिक एवं संगठनात्मक संरचना के निर्माण पर आधारित हो, बल्कि किसान नवाचार, सहभागी ज्ञान निर्माण के साथ-साथ जीवन कौशल और आजीविका को केंद्र में रखकर भी हो.

पिछले वर्ष अपने देश में कोविड संकट की स्थिति में भी हमारी सरकार ने किसी को खाद्यान्न की कमी नहीं होने दी. यह तभी संभव हो पाया, जब हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हैं. परंतु यहीं हमें नहीं रुकना चाहिए क्योंकि जलवायु परिवर्तन की परिस्थिति से उबरने के लिए हमें ग्रामीण क्षेत्र एवं किसानों को प्राथमिकता देनी होगी. केंद्र सरकार इस दिशा में पूर्व से ही काम कर रही है. भारतीय कृषि एवं अनुसंधान परिषद कृषि की आधुनिकतम प्रविधि पर तेजी से आगे बढ़ रही है और इसका प्रभाव भी दिख रहा है. राज्य सरकार भी इस दिशा में काम कर रही है.

संभावित जलवायु परिवर्तन के खतरे से भारतीय खेती को बचाने के लिए 2011 में क्लाइमेट इंट्रीग्रेटेड एग्रीकल्चर की योजना बनी थी और इसके क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर 125 कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से नवाचार प्रारंभ किया गया. इसके तहत किसानों को नवाचार का अभ्यास कराना, आधुनिक कृषि पद्धति का समायोजन करना, उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों को प्रभावशाली तरीके से प्रबंधन करना, फसल विविधिकरण को बढ़ावा देना, पशुधन का सरल प्रबंधन, कृषि उत्पादों का मूल्यवर्द्धन, कृषि एवं कृषक दोनों को बाजारोन्मुख बनाना आदि काम किये जा रहे हैं.

इस योजना में जल स्रोतों के रख-रखाव पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है. गांव-गांव में बीज बैंकों का निर्माण किया जा रहा है. साथ ही, परंपरागत एवं स्थानीय फसलों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है. जैविक और कम लागत वाली खेती के लिए व्यापक पैमाने पर काम किया जा रहा है.

इन प्रयासों को महामारी से उत्पन्न परिस्थिति में और गति देने की जरूरत है. वर्तमान दौर में हमारे सामने जीवन का तो संकट है ही, जीविका पर भी संकट के बादल छाये हुए हैं. ऐसे में एक निश्चित दिशा तय करनी होगी. ग्रामीण भारत को मजबूत बनाना होगा. भारत का यही एक ऐसा क्षेत्र है, जो पूरे देश की सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान निकाल सकता है. जहां उद्योग राष्ट्रीय विकास मानक में पिछड़ता जा रहा है, वहीं खेती का क्षेत्र हमें उत्साह प्रदान कर रहा है.

भारत सदा से प्रकृति पूजक रहा है. आद्य ग्रंथ वेद से लेकर आधुनिक और उत्तर आधुनिक रचनाओं में प्रकृति की आराधना सहजता से मिल जाती है. ओडिशा, छत्तीसगढ़ और झारखंड के अधिकतर क्षेत्र भगवान जगन्नाथ के प्रभाव वाला माना जाता है. वर्ष ऋतु में बड़े पैमाने पर इन क्षेत्रों में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का प्रचलन है. इन क्षेत्रों में इसी समय वृक्षारोपण की परिपाटी भी है. इसे धर्म के साथ जोड़ दिया गया है. धार्मिक मान्यता है कि रथयात्रा के दिन यदि पौधे लगाये जाते हैं, तो वे दीर्घजीवी होते हैं. वैसे पूरे भारत वर्ष में बारिश के दिनों में पौधे लगाने के साथ ही साथ फसलों के लिए बीज लगाने की परंपरा है.

इस परंपरा को धार्मिक अनुष्ठान के द्वारा प्रारंभ किया जाता है. पश्चिमी सोच पर आधारित विश्व पर्यावरण दिवस भारतीय प्रकृति के अनुकूल नहीं है. इसलिए यदि भारत में पर्यावरण संरक्षण अभियान को भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के साथ जोड़ा जाए, तो इसके परिणाम बेहतर साबित होंगे.

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लेखक के बारे में

Author: अशोक भगत

Published by: Prabhat Khabar

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