जल स्रोतों का संरक्षण आवश्यक

जलवायु परिवर्तन के महाविनाश से बचना है, तो नये जल स्रोत विकसित करने के साथ पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण का भी संकल्प लेना होगा.

पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया अप्रत्याशित तरीके से संवेदनशील हो रही है. विगत माह देश-विदेश में कई जगह आयी बाढ़ एवं तापमान वृद्धि का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन ही बताया जा रहा है. तीव्र आधुनिकीकरण एवं मशीनीकरण जलवायु परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार कर रही है. विकासशील देशों की तुलना में विकसित देश अधिक प्रभावित हो रहे हैं.

प्राकृतिक आपदाओं के लिए जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकी संतुलन में तालमेल का अभाव ही मूल कारण है और यह कहीं न कहीं हमारी जीवनशैली में सन्निहित है. इसलिए पर्यावरण मित्रता जैसे विकास की अवधारणा को शीघ्रातिशीघ्र अपनाना होगा. जलवायु परिवर्तन की चिंताओं के बीच जल स्रोतों के संरक्षण का मुद्दा भी उभरा है.

इस दिशा में हमारी सरकार भी तत्परता दिखा रही है और समाज को भी सक्रिय होना पड़ेगा. हाल ही में झारखंड उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में प्रशासन और सरकार को पारंपरिक एवं प्राकृतिक जल स्रोतों से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया है. न्यायालयों में पहले ऐसे मामलों को बहुत तवज्जो नहीं दी जाती थी, लेकिन जलवायु परिवर्तन से हो रही हानि को देखते हुए अब न्यायालयों को भी पहल करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है.

न्यायालय की सक्रियता सराहनीय है, लेकिन प्रशासन की खाना-पूर्ति पर्यावरण पर भारी पड़ने लगी है. छोटे स्तर पर या कमजोर लोगों के खिलाफ तो कार्रवाई हो रही है, पर प्रभावशाली लोगों की बात आने पर प्रशासन कोताही कर जाता है. झारखंड, बिहार, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश आदि प्रांतों में बालू माफिया ने अनेक नदियों को बर्बाद कर दिया है. वन माफिया बिना किसी डर के बड़े पैमाने पर पेड़ काट रहे हैं.

लाख सरकारी दावों के बाद भी उस अनुपात में वृक्ष नहीं लगाये जा रहे हैं, जिस अनुपात में पेड़ कट रहे हैं. ऐसे मामलों में गुजरात की तत्कालीन नरेंद्र मोदी सरकार ने जोरदार काम किया था. तब सरकार ने न केवल अहमदाबाद की जीवन-रेखा कही जानेवाली साबरमती नदी से अतिक्रमण हटाया था, अपितु सूख चुकी उस नदी को नर्मदा नहर से पानी लाकर पुनर्जीवित कर दिया था.

अहमदाबाद में साबरमती पर बना 15 किलोमीटर लंबा रिवरफ्रंट आज देश का गौरव बन गया है. सरकार ने अहमदाबाद, बड़ोदरा, राजकोट और सूरत जैसे बड़े शहरों में जल स्रोतों, जैसे- तालाब, नदी आदि से भी अतिक्रमणों को हटाया था. गुजरात की एक निजी संस्था ने गोंडल के पास कुछ नदियों को ऐसे जीवित कर दिया है कि वहां किसान खेत से तीन-तीन फसल उगाने लगे हैं.

पंजाब में सिख संत बलबीर सिंह सीचेवाल ने एक ऐतिहासिक नदी काली बेई जो नाले में बदल चुकी थी, को खुद के प्रयास से जीवंत बना दिया. आज नदी किनारे बसे सैकड़ों गांव हरे-भरे हो गये हैं और भूजल स्तर ऊपर उठ गया है. राजस्थान में भी ऐसे कई उदाहरण हैं. हाल में महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में कलाकार नाना पाटेकर की संस्था ‘नाम’ ने अभिनव प्रयोग कर करीब चार सौ से अधिक छोटी नदियों को जीवित किया है. इससे लगभग साढ़े चार सौ गांव लाभान्वित हो रहे हैं. ऐसे प्रयास झारखंड में भी हुए हैं.

लोहरदगा, गुमला, लातेहार, बिशुनपुर, बालूमाथ और पलामू में जल स्रोतों को बचाने और सुरक्षित करने के खूब प्रयास हुए. रांची के आरा केरम में भी जल स्रोतों को बचाने का उपाय किया गया है, लेकिन अभी भी इस दिशा में बहुत कुछ करने की जरूरत है. समाज जागृत होने लगा है, पर उसके पास पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाले माफिया से लड़ने की ताकत नहीं आ पायी है. इसके लिए सरकार और प्रशासन की ताकत समाज को चाहिए, जिसका सर्वथा अभाव है.

न्यायालय ने थोड़ा बल तो दिया है, परंतु यह नाकाफी है. झारखंड में सालाना 1300 से 1500 मिलीमीटर बारिश होती है. यहां पर्णपाती वनों का विशाल क्षेत्र है. वर्षाजल को संग्रहित करने के लिए जल स्रोतों को संरक्षित करने की जरूरत है. अपवाह तंत्र को समझकर उसकी वैज्ञानिक संरचना विकसित करने से झारखंड में बंजर भूमि से फसल लेने के साथ जलवायु परिवर्तन के आसन्न खतरों से भी बचा जा सकता है.

हम अभी वैश्विक महामारी से जूझ रहे हैं. ऐसी महामारी जलवायु में आ रहे परिवर्तन का द्योतक है. पर्यावरण में जल का संतुलन होना बेहद महत्वपूर्ण है. जल संरक्षण और संतुलन के लिए हमारे पूर्वजों ने नदियों की पवित्रता बनाये रखने का संदेश दिया है. सभी धर्मग्रंथों में भी ऐसी बातें लिखी गयी हैं. तालाब, कुओं के निर्माण को धार्मिक कार्य की श्रेणी में रखा गया है.

लेकिन हम उन संदेशों को भुलाकर विकास की अंधी दौड़ में अपने जीवन के संरक्षकों पर आघात करने लगे हैं. हमें सतर्क हो जाना चाहिए. यदि सरकार पहल नहीं करती है, तो समाज को इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए. हम पेड़ लगाने को अब उतावले हो रहे हैं, नये जल स्रातों का निर्माण भी कर रहे हैं, लेकिन पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण में कोताही बरत रहे हैं.

इसे आनेवाली पीढ़ी माफ नहीं करेगी. भूगोल का सिद्धांत कहता है कि प्रकृति में संतुलन ही मानव जीवन का आधार है. इस संतुलन में जल का विशेष महत्व है. जलवायु परिवर्तन के महाविनाश से बचना है, तो नये जल स्रोत विकसित करने के साथ पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण का भी संकल्प लेना होगा. निर्माणों के पावन युग में वसुधा का कल्याण न भूलें.

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लेखक के बारे में

Author: अशोक भगत

Published by: Prabhat Khabar

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